DU के दो कॉलेजों में 12वीं के नंबरों से एडमिशन, क्या CUET उतना कामयाब नहीं? उठे सवाल

शिक्षाविदों और मीडिया एनालिसिस का साफ मानना है कि भारत जैसी विविधता वाले देश में एक ही कसौटी पर हर कॉलेज और हर छात्र को नहीं कसा जा सकता. यहां आउटर और ऑफ-कैंपस कॉलेजों की अस्तित्व रक्षा के लिए आने वाले दिनों में CUET स्कोर के साथ-साथ 12वीं के बोर्ड अंकों के लिए भी एक निश्चित कोटा तय करना ही पड़ेगा.

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दिल्ली व‍िश्वव‍िद्यालय ने दो ऑफ कैंपस कॉलेजों के ल‍िए ढील क्यों दी? दिल्ली व‍िश्वव‍िद्यालय ने दो ऑफ कैंपस कॉलेजों के ल‍िए ढील क्यों दी?

मानसी मिश्रा

  • नई दिल्ली,
  • 07 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 10:53 AM IST

दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) ने सिर्फ दो कॉलेजों में सीयूईटी के बगैर दाखिले की बात खबर भर नहीं है, बल्कि यह नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) और यूजीसी (UGC) के पूरे 'सेंट्रलाइज्ड एंट्रेंस सिस्टम' पर लगा बहुत बड़ा सवालिया निशान है.

बता दें कि डीयू प्रशासन ने अपने दो महिला कॉलेजों अदिति महाविद्यालय (बवाना) और भगिनी निवेदिता कॉलेज (नजफगढ़) में खाली पड़ी स्नातक (UG) सीटों को भरने के लिए 12वीं बोर्ड के अंकों के आधार पर ऑफलाइन प्रवेश देने की 'विशेष छूट' दी है.

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जहां एक तरफ पूरे देश के केंद्रीय विश्वविद्यालयों में 'कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट' (CUET) को दाखिले की एकमात्र 'संजीवनी' बनाकर पेश किया गया था, वहीं काउंसलिंग के तमाम राउंड बीत जाने के बाद भी इन कॉलेजों में 40% तक सीटें खाली रह गईं. मजबूरी में डीयू को अपने ही बनाए नियम तोड़ने पड़े. इस फैसले के सामने आते ही अब देश के शिक्षा गलियारों में यह गूंज सुनाई दे रही है कि क्या 'वन-साइज़-फिट्स-ऑल' वाले CUET मॉडल में वो बात नहीं है जो सोची गई थी?

जब सिस्टम फेल हुआ, तो याद आईं '12वीं की मेरिट'
डीयू की मुख्य दाखिला प्रक्रिया 'कॉमन सीट एलोकेशन सिस्टम' (CSAS) और CUET स्कोर पर ही टिकी है. लेकिन बवाना और नजफगढ़ के इन दो कॉलेजों की हकीकत ने केंद्रीयकृत परीक्षा की व्यावहारिक कमियों की पोल खोलकर रख दी है. 

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अब जैसे बवाना, नजफगढ़, नरेला और आसपास की ग्रामीण पृष्ठभूमि की बेटियां 12वीं बोर्ड में 85% से 95% तक अंक लाती हैं. लेकिन कंप्यूटर-बेस्ड 'CUET' के जटिल ऑनलाइन फॉर्म, नॉर्मलाइजेशन का पेच और दूर-दराज बने टेस्ट सेंटरों के चक्कर में वे इस राष्ट्रीय परीक्षा से ही छिटक गईं.

दूसरी बात अदिति महाविद्यालय और भगिनी निवेदिता कॉलेज सुदूर ग्रामीण इलाकों में स्थित हैं. नजदीकी मेट्रो स्टेशन से 12-15 किलोमीटर की दूरी, सीधी बस सर्विस का न होना और इन-कैंपस हॉस्टल की अनुपस्थिति... इन वजहों से दूर-दराज के राज्यों से CUET के जरिए सीट अलॉट होने के बावजूद छात्राएं यहां आने से कतराती हैं.

उस पर CUET की अनिवार्यता ने कहीं न कहीं उन लोकल ग्रामीण छात्राओं का रास्ता रोक दिया, जो 12वीं के नंबरों के दम पर अपने घर के पास स्थित इन कॉलेजों में आसानी से पढ़ सकती थीं. नतीजा? न स्थानीय बेटियों को पढ़ाई मिल पाती, न कॉलेजों को छात्र.

'क्या बाकी ऑफ-कैंपस कॉलेज सौतेले हैं? श‍िक्षक संघ का सवाल 
विश्वविद्यालय द्वारा केवल इन दो कॉलेजों को मिली 'विशेष राहत' के बाद शिक्षक संगठनों ने नीतिगत पक्षपात और पारदर्शिता पर सीधे सवाल दाग दिए हैं. 

भारतीय राष्ट्रीय शिक्षक कांग्रेस (INTEC) ने कुलपति को पत्र लिखकर पूछा है कि अगर खाली सीटें भरने का एकमात्र इलाज 12वीं की मेरिट ही है, तो यह मेहरबानी सिर्फ दो महिला कॉलेजों पर ही क्यों? डीयू के अन्य ऑफ-कैंपस और इवनिंग कॉलेजों (जैसे स्वामी श्रद्धानंद, सत्यवती इवनिंग आदि) में भी हर साल दर्जनों सीटें खाली रह जाती हैं. अगर CUET मॉडल ऑफ-कैंपस कॉलेजों की जमीनी जरूरतों को पूरा करने में पस्त हो रहा है, तो सभी के लिए एक समान, पारदर्शी और स्थायी नीति बनाई जाए.

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बड़ा सवाल- क्यों अब 'हाइब्रिड मॉडल' ही एकमात्र रास्ता है?
शिक्षाविदों और मीडिया एनालिसिस का साफ मानना है कि भारत जैसी विविधता वाले देश में एक ही कसौटी पर हर कॉलेज और हर छात्र को नहीं कसा जा सकता. यहां आउटर और ऑफ-कैंपस कॉलेजों की अस्तित्व रक्षा के लिए आने वाले दिनों में CUET स्कोर के साथ-साथ 12वीं के बोर्ड अंकों के लिए भी एक निश्चित कोटा तय करना ही पड़ेगा.

अगर स्थानीय छात्राओं को उनके घर के पास स्थित कॉलेजों में आसानी से दाखिला नहीं मिलेगा, तो खासकर ग्रामीण और निम्न-मध्यम वर्गीय परिवारों में लड़कियों का ड्रॉपआउट रेट तेज़ी से बढ़ेगा. वहीं सेंट्रलाइज्ड सिस्टम जमीनी समस्याओं और इंफ्रास्ट्रक्चर की कमियों को अनदेखा करता है. दाखिला प्रक्रिया में लचीलापन लाना अब कोई पसंद नहीं, बल्कि समय की मांग बन चुका है.

फोरम ऑफ एकेडेमिक्स फॉर सोशल जस्टिस के अध्यक्ष प्रो हंसराज सुमन का कहना है कि अगर ये कहा जाए तो अतिश्योक्त‍ि नहीं होगी कि डीयू का यह फैसला केवल दो कॉलेजों में सीटें भरने का तात्कालिक 'जुगाड़' नहीं, बल्कि CUET की व्यावहारिक विफलताओं पर खुद विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा लगाई गई पहली आधिकारिक मुहर है. यदि वक्त रहते इस राष्ट्रीय प्रवेश परीक्षा के पैटर्न, नियमों और केंद्रीयकृत व्यवस्था पर दोबारा विचार नहीं किया गया, तो आने वाले समय में देश के अनगिनत ऑफ-कैंपस कॉलेज खाली क्लासरूम्स और नीतिगत पक्षाघात के शिकार होते रहेंगे.

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