नई दिल्ली में 6 अक्टूबर 2026 को रक्षा मंत्रालय ने ब्रह्मोस एयरोस्पेस प्राइवेट लिमिटेड के साथ महत्वपूर्ण डील पर हस्ताक्षर किए. इस डील के तहत भारतीय नौसेना के जहाजों के लिए ब्रह्मोस फायर कंट्रोल सिस्टम और लॉन्चर खरीदे जाएंगे. डील 661.50 करोड़ रुपये की है.
रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह की मौजूदगी में यह समझौता हुआ. यह खरीद भारतीय-आईडीडीएम श्रेणी के की गई है जिसमें न्यूनतम 68 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री शामिल होगी. यह कदम भारतीय रक्षा उद्योग को मजबूत बनाने और नौसेना की समुद्री सुरक्षा बढ़ाने की दिशा में बड़ा महत्व रखता है.
रक्षा मंत्रालय ने ब्रह्मोस एयरोस्पेस प्राइवेट लिमिटेड के साथ यह डील इसलिए किया ताकि भारतीय नौसेना के विभिन्न युद्धपोतों पर ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम को और प्रभावी बनाया जा सके. ब्रह्मोस सिस्टम नौसेना का प्रमुख सतह से सतह पर मार करने वाला मिसाइल सिस्टम है.
यह समुद्री हमले के अभियानों के लिए इस्तेमाल होता है. यह मिसाइल जमीन और समुद्र दोनों तरह के लक्ष्यों को दूर की दूरी से सुपरसोनिक गति के साथ सटीक निशाना बना सकती है. फायर कंट्रोल सिस्टम और लॉन्चर इसी सिस्टम के महत्वपूर्ण हिस्से हैं जो मिसाइल को सही तरीके से निशाना लगाने और दागने में मदद करते हैं.
इस परियोजना में कम से कम 68 प्रतिशत सामग्री भारत में ही बनेगी. इससे कई भारतीय उद्योगों खासकर MSME को सक्रिय भागीदारी का मौका मिलेगा. अनुमान है कि अगले तीन सालों में इस परियोजना से रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे.
यह सिर्फ एक खरीद का सौदा नहीं बल्कि आत्मनर्भर भारत अभियान को मजबूत करने वाला कदम है. भारत लंबे समय से रक्षा उपकरणों में विदेशी निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहा है. ब्रह्मोस जैसी उन्नत तकनीक को स्वदेशी बनाना इस दिशा में महत्वपूर्ण मील का पत्थर है.
ब्रह्मोस सिस्टम की क्षमता और नौसेना के लिए फायदे
ब्रह्मोस मिसाइल भारत और रूस के संयुक्त उद्यम से बनी है. यह दुनिया की सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में से एक मानी जाती है. इसकी गति ध्वनि की गति से कई गुना ज्यादा होती है जिससे दुश्मन के पास प्रतिक्रिया का समय बहुत कम बचता है.
यह जहाजों से दागी जा सकती है और लंबी दूरी तक लक्ष्य को भेदने में सक्षम है. फायर कंट्रोल सिस्टम मिसाइल को लक्ष्य की जानकारी देने, मार्गदर्शन करने और सटीक हमला सुनिश्चित करने का काम करता है. लॉन्चर मिसाइल को जहाज से सुरक्षित और प्रभावी तरीके से दागने की व्यवस्था करते हैं.
भारतीय नौसेना के कई प्रमुख युद्धपोतों पर पहले से ब्रह्मोस सिस्टम लगा हुआ है. नए फायर कंट्रोल सिस्टम और लॉन्चर लगाने से इन जहाजों की क्षमता और बढ़ेगी. समुद्री सुरक्षा के लिहाज से यह बेहद जरूरी है क्योंकि हिंद महासागर क्षेत्र में सुरक्षा चुनौतियां बढ़ रही हैं.
पड़ोसी देशों के साथ समुद्री सीमा विवाद, समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा और क्षेत्रीय तनाव जैसी स्थितियों में मजबूत मिसाइल सिस्टम नौसेना को बेहतर स्थिति में लाता है. यह डील नौसेना की समुद्री हमला करने की क्षमता को और मजबूत करेगा.
आर्थिक और औद्योगिक प्रभाव
661.50 करोड़ रुपये का यह डील सिर्फ रक्षा खरीद नहीं बल्कि अर्थव्यवस्था के लिए भी फायदेमंद है. स्वदेशी सामग्री का ऊंचा प्रतिशत होने से घरेलू कंपनियों को ऑर्डर मिलेंगे. एमएसएमई पुर्जे बनाने, असेंबली और अन्य सहायक कामों में शामिल होंगी.
इससे स्थानीय स्तर पर कौशल विकास और तकनीकी जानकारी का प्रसार होगा. तीन साल की अवधि में रोजगार पैदा होने से युवाओं को अवसर मिलेंगे. रक्षा क्षेत्र में स्वदेशीकरण से विदेशी मुद्रा की बचत भी होती है क्योंकि आयात पर निर्भरता कम होती है.
ब्रह्मोस एयरोस्पेस पहले से ही भारत में मिसाइल उत्पादन कर रहा है. इस नए डील से कंपनी की उत्पादन क्षमता और मजबूत होगी. यह दिखाता है कि सरकार उन्नत सैन्य तकनीक को भारत में ही विकसित और उत्पादित करने को प्राथमिकता दे रही है. आईडीडीएम श्रेणी का मतलब है कि उत्पाद भारतीय डिजाइन, विकास और विनिर्माण पर आधारित है. इससे न सिर्फ आत्मनिर्भरता बढ़ती है बल्कि भविष्य में निर्यात की संभावनाएं भी खुलती हैं.
भारत की सुरक्षा में आगे और क्या होगा?
आज के समय में समुद्री सुरक्षा किसी भी देश के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है. व्यापार का बड़ा हिस्सा समुद्री मार्गों से गुजरता है. भारतीय नौसेना हिंद महासागर में सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी निभाती है. ब्रह्मोस जैसे सिस्टम से नौसेना दुश्मन के जहाजों या तटीय ठिकानों पर तेजी से और सटीक हमला कर सकती है. सुपरसोनिक गति के कारण इसे रोकना दुश्मन के लिए मुश्किल होता है.
यह डील रक्षा मंत्रालय की उस नीति का हिस्सा है जिसमें स्वदेशी हथियार प्रणालियों को प्राथमिकता दी जा रही है. पिछले कुछ वर्षों में कई बड़े डील इसी दिशा में हुए हैं. ब्रह्मोस की सफलता ने दिखाया है कि भारत-रूस सहयोग से उच्च स्तरीय तकनीक विकसित की जा सकती है और फिर उसे और अधिक स्वदेशी बनाया जा सकता है. आगे चलकर ऐसे और सिस्टम नौसेना के नए जहाजों पर भी लगाए जा सकते हैं.
कुल मिलाकर यह सौदा भारतीय नौसेना की मारक क्षमता बढ़ाने, घरेलू उद्योग को बढ़ावा देने और आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन को मजबूत करने वाला है. रक्षा सचिव की मौजूदगी में हुए इस डील से साफ है कि सरकार इसे उच्च प्राथमिकता दे रही है. आने वाले वर्षों में जब ये सिस्टम जहाजों पर लग जाएंगे तब नौसेना की ताकत और दिखाई देगी. यह कदम न सिर्फ सैन्य दृष्टि से बल्कि आर्थिक और औद्योगिक दृष्टि से भी देश के लिए लाभकारी साबित होगा.
शिवानी शर्मा