चीन की नई JL-3 मिसाइल के सफल परीक्षण के बाद अमेरिका में पहली बार खुलकर चिंता और खौफ जताया जा रहा है. चीन की जुलांग मिसाइल (Type 094 और Type 096) न्यूक्लियर सबमरीन से लॉन्च की जा सकती है. इससे चीन को अमेरिका की मुख्य भूमि तक पहुंचने की क्षमता मिल गई है.
JL-3 (Ju Lang-3) चीन की तीसरी पीढ़ी की सबमरीन लॉन्च्ड बैलिस्टिक मिसाइल (SLBM) है. इसकी अनुमानित रेंज 10,000 से 14,000 किलोमीटर तक बताई जा रही है. मतलब चीन की सबमरीन अगर प्रशांत महासागर में कहीं भी छिपी रहे तो वह अमेरिका के किसी भी हिस्से को निशाना बना सकती है.
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यह मिसाइल मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टारगेटेबल री-एंट्री व्हीकल (MIRV) तकनीक से लैस हो सकती है. एक मिसाइल में कई न्यूक्लियर वॉरहेड लगाए जा सकते हैं जो अलग-अलग टारगेट को नष्ट कर सकते हैं.
चीन ने हाल के वर्षों में JL-3 का कई बार सफल परीक्षण किया है. इन परीक्षणों में मिसाइल ने अपनी सटीकता और रेंज साबित की. अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के अनुसार, JL-3 अब चीनी नौसेना (PLA Navy) की रणनीतिक हमले की क्षमता को कई गुना बढ़ा रही है.
पहले चीन की JL-2 मिसाइल की रेंज सीमित थी और उसे अमेरिका तक पहुंचने के लिए चीन के पास वाली समुद्री सीमा से ही लॉन्च करना पड़ता था. JL-3 ने इस सीमा को तोड़ दिया है. अब चीनी सबमरीन समुद्र के गहरे इलाकों में छिपकर भी अमेरिका पर हमला कर सकती हैं.
अमेरिका में क्यों दिख रहा है खौफ?
अमेरिका को पहली बार यह एहसास हो रहा है कि उसकी मुख्य भूमि अब सुरक्षित नहीं रही. पिछले कई दशकों से अमेरिका दुनिया का सबसे मजबूत देश रहा है. उसकी नौसेना और मिसाइल डिफेंस सिस्टम को अजेय माना जाता था. लेकिन JL-3 जैसी मिसाइल ने अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञों को सोचने पर मजबूर कर दिया है.
अमेरिकी पेंटागन और कांग्रेस की रिपोर्ट्स में साफ कहा गया है कि चीन की न्यूक्लियर क्षमता तेजी से बढ़ रही है. JL-3 इस रणनीति का हिस्सा है. अगर चीन अपनी सबमरीन को प्रशांत महासागर या अटलांटिक में भेज दे तो अमेरिका के पास चेतावनी का समय बहुत कम रह जाएगा.
JL-3 में हाई स्पीड, बेहतर स्टियरिंग सिस्टम और मिसाइल डिफेंस को चकमा देने वाली तकनीक शामिल है. कुछ रिपोर्ट्स में इसे हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल के साथ जोड़कर देखा जा रहा है. इससे अमेरिका की मौजूदा मिसाइल डिफेंस शील्ड (जैसे THAAD और GMD) के जवाब के रूप में देखा जा रहा है.
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चीनी नौसेना की बढ़ती ताकत
चीन दुनिया की सबसे बड़ी नौसेना रखता है. उसके पास 60 से ज्यादा न्यूक्लियर सबमरीन हैं और यह संख्या तेजी से बढ़ रही है. Type 096 सबमरीन JL-3 को ले जाने में सक्षम है. ये सबमरीन बेहद चुपके से चल सकती हैं जिससे उन्हें डिटेक्ट करना मुश्किल है.
अमेरिका ने JL-3 के जवाब में अपनी क्षमताओं को बढ़ाने की योजना बनाई है. वह AUKUS समझौते के तहत ऑस्ट्रेलिया को न्यूक्लियर सबमरीन दे रहा है. अपनी कोलंबिया क्लास सबमरीन प्रोजेक्ट को तेज कर रहा है. साथ ही इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया के साथ सैन्य सहयोग बढ़ाया जा रहा है.
JL-3 मिसाइल सिर्फ अमेरिका-चीन के बीच कॉम्पीटिशन नहीं है. यह पूरे एशिया-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा को प्रभावित करेगी. ताइवान, जापान, दक्षिण कोरिया और फिलीपींस जैसे देश चिंतित हैं. यह मिसाइल न्यूक्लियर आर्म्स रेस को बढ़ावा दे सकती है. चीन की बढ़ती क्षमता देखकर भारत भी अपनी मिसाइल और सबमरीन क्षमता को मजबूत कर रहा है.
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क्या JL-3 युद्ध को आसान बनाएगी?
विशेषज्ञों का कहना है कि JL-3 रक्षा संतुलन बदल रही है लेकिन युद्ध को आसान नहीं बनाती. न्यूक्लियर मिसाइलों का मतलब है म्यूचुअल एश्योर्ड डिस्ट्रक्शन (MAD). दोनों देश जानते हैं कि पूर्ण युद्ध में कोई विजेता नहीं होगा. फिर भी यह मिसाइल चीन को रणनीतिक लाभ देती है.
भारत के लिए भी यह चिंता का विषय है. चीन की बढ़ती नौसेना हिंद महासागर में भी सक्रिय हो रही है. भारत अपनी INS अरिहंत क्लास और भविष्य की सबमरीन में K-4 और K-5 मिसाइलों को मजबूत कर रहा है.
चीन की JL-3 मिसाइल ने अमेरिका में पहली बार खौफ पैदा कर दिया है. यह मिसाइल सिर्फ एक हथियार नहीं बल्कि चीन की बढ़ती वैश्विक महत्वाकांक्षा का प्रतीक है. अमेरिका अब अपनी रणनीति में बदलाव कर रहा है.
दुनिया दो ध्रुवीय शक्ति संतुलन की ओर बढ़ रही है. JL-3 जैसे हथियार इस बदलाव को तेज करेंगे. फिलहाल JL-3 ने वैश्विक सुरक्षा समीकरण को हमेशा के लिए बदल दिया है.
ऋचीक मिश्रा