बिहार के सहरसा नगर निगम में कथित टेंडर घोटाले के मामले में आखिरकार सरकार ने बड़ी कार्रवाई की है. नगर निगम के कमिश्नर प्रभात कुमार झा को मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने सस्पेंड कर दिया है. खास बात यह है कि मंगलवार रात 8 बजे आज तक के कार्यक्रम 'खबरदार' में सहरसा नगर निगम में कथित गड़बड़ियों और कमिश्नर के कामकाज को लेकर विशेष रिपोर्ट दिखाई गई थी. इसके महज 24 घंटे के भीतर सरकार ने निलंबन की कार्रवाई की है. नगर निगम में करीब 8.44 करोड़ रुपये की चार बड़ी परियोजनाओं को 68 छोटी योजनाओं में बांटकर काम कराने का आरोप है.
दरअसल, सहरसा नगर निगम में विकास कार्यों के नाम पर टेंडर प्रक्रिया में गड़बड़ी किए जाने की शिकायत सामने आई थी. नगर विकास एवं आवास विभाग की पांच सदस्यीय जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट में कई गंभीर अनियमितताओं का जिक्र किया था. जांच में सामने आया कि करीब 8.44 करोड़ रुपये की चार बड़ी परियोजनाओं को 68 छोटे-छोटे कामों में बांट दिया गया. आरोप है कि प्रत्येक काम की लागत 15 लाख रुपये से कम रखी गई, ताकि टेंडर की निर्धारित प्रक्रिया से बचा जा सके. जांच समिति ने नगर आयुक्त प्रभात कुमार झा और अन्य संबंधित लोगों के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की थी.
जांच रिपोर्ट के मुताबिक, सहरसा नगर निगम में चार प्रमुख परियोजनाओं की कुल लागत करीब 8.44 करोड़ रुपये थी. इन परियोजनाओं को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटकर कुल 68 योजनाओं के रूप में काम कराया गया. समिति ने इस तरीके पर सवाल उठाते हुए कहा कि एक ही प्रकृति के कार्यों को अलग-अलग योजनाओं में बांटने से टेंडर प्रक्रिया के नियमों का उल्लंघन होने की आशंका है. जांच में निर्माण स्थलों पर काम की स्थिति, भुगतान और सरकारी दस्तावेजों का मिलान भी किया गया. इस दौरान कई जगह कागजों और मौके पर हुए निर्माण कार्य में अंतर मिलने की बात सामने आई.
पहली परियोजना सहरसा के वार्ड नंबर 13 स्थित न्यू कॉलोनी की है. यहां करीब 1.80 करोड़ रुपये की लागत से पोखर का निर्माण कराया गया था. जांच समिति के मुताबिक, इस पूरी परियोजना को 14 छोटी योजनाओं में बांट दिया गया. नियमों के अनुसार, प्रत्येक योजना के बारे में जानकारी देने वाला शिलापट्ट लगाया जाना जरूरी है, जिस पर योजना की लागत और निर्माण से जुड़ी दूसरी जानकारियां दर्ज होती हैं. लेकिन जांच टीम को मौके पर एक भी शिलापट्ट नहीं मिला.
स्थानीय लोगों ने जांच टीम को बताया कि पोखर में पहले से सीढ़ियां बनी हुई थीं. मौके पर कुछ ईंट, टाइल्स और ग्रिल लगाने का काम दिखाई दिया. आज तक की टीम जब इस मामले की ग्राउंड रिपोर्टिंग कर रही थी, उसी दौरान नगर आयुक्त प्रभात कुमार झा भी अपने लोगों के साथ वहां पहुंचे थे. इस दौरान स्थानीय लोगों ने उनका विरोध किया. जांच रिपोर्ट में भुगतान की गई राशि और मौके पर हुए काम के बीच अंतर मिलने की बात कही गई है. समिति ने इस मामले में अधिक भुगतान की गई रकम वसूलने की सिफारिश की है.
दूसरी परियोजना नगर निगम के वार्ड नंबर 7 स्थित शाहपुर की है. यहां करीब 2.90 करोड़ रुपये की लागत से पोखर और पार्क का निर्माण कराया गया. जांच रिपोर्ट के मुताबिक, इस परियोजना को भी एक साथ कराने के बजाय 24 छोटी-छोटी योजनाओं में बांट दिया गया. जांच समिति ने मौके पर निरीक्षण के दौरान किसी भी योजना का शिलापट्ट नहीं पाया. इससे निर्माण कार्यों की लागत और दूसरी जरूरी जानकारियों की मौके पर पुष्टि नहीं हो सकी.
समिति ने अपनी रिपोर्ट में एक ही तरह के काम को कई छोटी योजनाओं में बांटने पर गंभीर सवाल उठाए हैं. जांच के मुताबिक, प्रत्येक योजना की लागत कम रखने का मकसद टेंडर की निर्धारित प्रक्रिया से बचना हो सकता है. समिति ने इस पूरी प्रक्रिया को नियमों के लिहाज से संदिग्ध माना है. इस परियोजना में भी दस्तावेजों और निर्माण कार्यों की जांच के दौरान अनियमितताओं की आशंका जताई गई है.
तीसरी परियोजना पटेल मैदान के हवाई अड्डा परिसर में पार्क निर्माण से जुड़ी है. इस काम पर करीब 2.31 करोड़ रुपये खर्च किए जाने का उल्लेख है. जांच समिति के अनुसार, इस परियोजना को 19 छोटी योजनाओं में बांटकर काम कराया गया. मौके पर जांच के दौरान यहां भी किसी योजना का शिलापट्ट नहीं मिला. इसके अलावा, पार्क निर्माण के लिए पथ निर्माण विभाग से जरूरी NOC यानी अनापत्ति प्रमाणपत्र लेने का कोई रिकॉर्ड भी जांच समिति को नहीं मिला.
इस परियोजना में निर्माण कार्य से जुड़े दस्तावेजों और मौके की स्थिति में भी अंतर पाया गया. रिपोर्ट के मुताबिक, कागजों में पाइप को छह फीट की गहराई में लगाने की बात दर्ज थी, जबकि मौके पर कई जगह पाइप करीब तीन फीट की गहराई में मिले. जांच समिति ने निर्माण सामग्री की गुणवत्ता और काम की माप से जुड़े दस्तावेजों पर भी सवाल उठाए हैं. आशंका जताई गई कि वास्तविकता में जितना काम हुआ, उससे ज्यादा काम कागजों में दिखाकर भुगतान किया गया हो सकता है.
चौथी परियोजना सहरसा के व्यवहार न्यायालय परिसर में कराए गए निर्माण कार्य से संबंधित है. इस परियोजना की लागत करीब 1.42 करोड़ रुपये बताई गई है. जांच रिपोर्ट के मुताबिक, इस काम को भी 11 छोटी-छोटी योजनाओं में बांटकर कराया गया. जांच समिति को यहां भी किसी योजना का शिलापट्ट नहीं मिला. इससे योजनाओं के बारे में मौके पर जरूरी जानकारी उपलब्ध नहीं हो सकी.
समिति ने इस परियोजना में भी एक ही तरह के निर्माण कार्य को कई छोटे हिस्सों में बांटने पर सवाल उठाए हैं. जांच के दायरे में टेंडर प्रक्रिया और काम कराने के तरीके को रखा गया था. इन चारों परियोजनाओं को मिलाकर कुल 68 छोटी योजनाएं बनाई गई थीं. इनकी कुल लागत करीब 8.44 करोड़ रुपये है. हालांकि, यह चारों परियोजनाओं की कुल लागत है, इसे सरकारी खजाने को हुए नुकसान की अंतिम राशि नहीं माना जा सकता.
पांच सदस्यीय जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट में PWD Code और टेंडर की शर्तों के उल्लंघन का भी जिक्र किया है. रिपोर्ट के मुताबिक, कई योजनाओं में निविदा आमंत्रण सूचना यानी NIT की शर्तों का पालन नहीं किए जाने के सवाल उठे हैं. इसके अलावा, नगर निगम के कर्मचारियों को तीन से अधिक योजनाओं का काम सौंपे जाने पर भी आपत्ति जताई गई है. समिति ने योजनाओं को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटने के तरीके और काम आवंटित करने की प्रक्रिया को जांच के दौरान परखा था.
जांच रिपोर्ट में नगर निगम के पांच कर्मचारियों को बड़ी संख्या में निर्माण कार्य सौंपे जाने का भी जिक्र है. रिपोर्ट के अनुसार, नगर आयुक्त प्रभात कुमार झा ने 21 जून 2025 को पदभार संभाला था. इसके बाद जुलाई 2025 से फरवरी 2026 के बीच करीब आठ महीने में 421 विभागीय कार्य कराए गए. इन सभी कामों के लिए नगर निगम के पांच कर्मचारियों को अभिकर्ता यानी एजेंट बनाया गया था. समिति ने इतने कम कर्मचारियों को बड़ी संख्या में काम सौंपे जाने पर सवाल उठाए हैं.
इन पांच कर्मचारियों में टैक्स दरोगा रंजन कुमार रजक, सिटी मैनेजर अभिसार कश्यप, नाजिर संतोष कुमार, संविदा पर कार्यरत कनीय अभियंता दिलीप कुमार और कनीय अभियंता अजय कुमार रमण शामिल हैं. रिपोर्ट में दर्ज अनुमान के मुताबिक, रंजन कुमार रजक और अभिसार कश्यप को 150 से 200 योजनाओं की जिम्मेदारी दी गई. संतोष कुमार को 50 से 60, दिलीप कुमार को करीब 50 और अजय कुमार रमण को लगभग 15 योजनाएं सौंपी गईं. समिति ने काम के इस बंटवारे को लेकर सवाल उठाए हैं.
रिपोर्ट में सिटी मैनेजर अभिसार कश्यप के संविदा विस्तार से जुड़े दस्तावेजों का भी जिक्र किया गया है. जांच समिति के मुताबिक, उनके संविदा विस्तार से संबंधित दस्तावेज 30 अक्टूबर 2025 के बाद उपलब्ध नहीं हैं. ऐसे में उनके कार्यकाल और जिम्मेदारियों से जुड़े रिकॉर्ड पर भी सवाल उठे हैं. समिति ने जांच के दौरान कर्मचारियों को काम सौंपने की प्रक्रिया और संबंधित दस्तावेजों की पड़ताल की थी.
इस पूरे मामले की जांच पूर्व मंत्री और बीजेपी नेता आलोक रंजन की शिकायत के बाद शुरू हुई थी. उनकी शिकायत पर नगर विकास एवं आवास विभाग ने जांच के आदेश दिए थे. इसके बाद पांच सदस्यीय जांच समिति ने 20 से 22 अगस्त 2026 तक सहरसा में निर्माण स्थलों का निरीक्षण किया. समिति ने अलग-अलग परियोजनाओं से जुड़े दस्तावेजों और मौके पर हुए काम का मिलान किया. जांच पूरी करने के बाद 21 सितंबर 2026 को विभाग को अपनी रिपोर्ट सौंप दी गई.
जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट में नगर आयुक्त प्रभात कुमार झा और अन्य संबंधित लोगों के खिलाफ विभागीय और कानूनी कार्रवाई करने की सिफारिश की थी. इसके साथ ही जहां अधिक भुगतान किए जाने की बात सामने आई, वहां संबंधित रकम की वसूली करने की भी सिफारिश की गई थी. हालांकि, रिपोर्ट सौंपे जाने के बाद भी नगर आयुक्त के खिलाफ कार्रवाई नहीं होने को लेकर सवाल उठ रहे थे. वह अपने पद पर बने हुए थे.
इस मामले में आज तक ने मंगलवार रात 8 बजे अपने कार्यक्रम 'खबरदार' में विशेष रिपोर्ट दिखाई थी. रिपोर्ट में सहरसा नगर निगम की चार परियोजनाओं, 68 छोटी योजनाओं और जांच समिति की रिपोर्ट में सामने आई कथित अनियमितताओं को विस्तार से दिखाया गया था. रिपोर्ट में यह सवाल भी उठाया गया था कि 21 सितंबर को जांच रिपोर्ट सौंपे जाने के बाद भी कार्रवाई क्यों नहीं हुई. अब इस खबर के प्रसारण के 24 घंटे के भीतर बिहार सरकार ने नगर आयुक्त प्रभात कुमार झा को सस्पेंड कर दिया है.
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के निर्देश पर हुई इस कार्रवाई के बाद सहरसा नगर निगम के कथित टेंडर घोटाले का मामला एक बार फिर चर्चा में है. जांच समिति ने विभागीय और कानूनी कार्रवाई के साथ अधिक भुगतान की राशि वसूलने की सिफारिश की थी. अब नगर आयुक्त के निलंबन के बाद यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि मामले में आगे किन अधिकारियों और कर्मचारियों की जिम्मेदारी तय होती है. साथ ही, जांच में सामने आई कथित अनियमितताओं के आधार पर कितनी राशि की वसूली की जाती है.
रोहित कुमार सिंह