गला घोंटकर कत्ल, फ्रिज में लाश के टुकड़े और अब लंबा इंतजार... कब होगा श्रद्धा वाल्कर का अंतिम संस्कार?

श्रद्धा वाल्कर मर्डर केस को तीन साल से ज्यादा वक्त हो चुका है, लेकिन ट्रायल अब तक पूरा नहीं हुआ. श्रद्धा की बची हड्डियां अभी भी केस प्रॉपर्टी के तौर पर मालखाने में हैं, जबकि आरोपी आफताब जेल में रहकर MA की पढ़ाई कर रहा है. पढ़ें इंसाफ के लंबे इंतजार की कहानी.

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श्रद्धा का कत्ल 18 मई 2022 को दिल्ली में हुआ था (फोटो-ITG) श्रद्धा का कत्ल 18 मई 2022 को दिल्ली में हुआ था (फोटो-ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 16 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 1:48 PM IST

श्रद्धा वाल्कर याद है आपको? वही श्रद्धा जिसे 18 मई 2022 को दिल्ली में बेरहमी के साथ कत्ल कर दिया गया था. ये कत्ल किसी और ने नहीं, बल्कि उसके लिव-इन पार्टनर आफताब अमीन पूनावाला ने उसका गला घोंटकर किया था और फिर उसकी लाश के 35 टुकड़े करके उन्हें एक फ्रिज में रखकर महरौली के जंगल में अलग-अलग जगहों पर फेंका था. उसी श्रद्धा वाल्कर को करीब तीन साल बीत जाने के बाद भी अंतिम संस्कार का इंतजार है. जबकि उसका कातिल तिहाड़ जेल रहते हुए ही अब एमए का एग्जाम देने की तैयारी कर रहा है.

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दिल्ली का महरौली थाना. थाने के अंदर मालखाना है. पिछले साढ़े तीन साल से उसी मालखाने में एक छोटे से बक्से में बंद है श्रद्धा वाल्कर. महरौली थाने से लगभग 4 किलोमीटर दूरी मौजूद है साकेत कोर्ट. 1 जून 2023 यानी लगभग पिछले तीन साल से इसी कोर्ट में श्रद्धा केस की सुनवाई हो रही है. इस सुनवाई के दौरान ऐसा लगभग 30 बार से ज्यादा हुआ जब प्लास्टिक के छोटे-छोटे बक्से में बंद श्रद्धा को महरौली थाने के मालखाने से निकाल कर कोर्ट में पेश किया गया. 

श्रद्धा के पिता विकास वाल्कर को नवंबर 2022 में पहली बार पता चला था कि उनकी बेटी अब इस दुनिया में नहीं है. उनकी बेटी श्रद्धा के दोस्त यानी आफताब पूनावाला ने श्रद्धा का कत्ल करने के बाद लाश के टुकड़ों को महरौली के जंगलों में किस्तों में ठिकाने लगा दिया था. ये जानते हुए कि उनकी बेटी श्रद्धा अब इस दुनिया में नहीं है. श्रद्धा के नाम पर कुछ है तो छोटे छोटे से बक्से में बंद उसकी चंद हड्डियां. 

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मगर बदकिस्मत बाप की बदनसीबी देखिए कि श्रद्धा तो छोड़िए उसकी लाश के बचे खुचे टुकड़े तक उन्हें अंतिम संस्कार के लिए नहीं सौंपे गए. विकास वाल्कर बेटी की अंतिम संस्कार की ख्वाहिश दिल में लिए ही पिछले साल फरवरी में इस दुनिया से चले गए. हालांकि मौत से पहले विकास वाल्कर ने जो आखिरी इंटरव्यू दिया था तब भी उन्होंने ये कहा था कि वो अपनी बेटी की अस्थियां तभी देख पाते हैं, जब उन्हें कोर्ट में पेश किया जाता है. सबूत और केस प्रॉपर्टी के तौर पर.

पिता की मौत के बाद अब श्रद्धा के भाई श्रीजे विकास ने केस लड़ने की जिम्मेदारी संभाल रखी है. पिता की जगह अब वो मुंबई से दिल्ली के चक्कर काट रहा है. विकास ने पिछले महीने दिल्ली हाई कोर्ट में अर्जी लगा कर ये गुजारिश की थी कि फास्ट ट्रैक को मुकदमे का निपटारा जल्दी करने का आदेश दिया जाए. हालांकि दिल्ली हाई कोर्ट ने ऐसा कोई आदेश देने से मना कर दिया था. असल में पिता की तरह अब बेटा यानी श्रद्धा का बाई भी चाहता है कि कम से कम उसे उसकी बहन का आस्थियां तो सौंप दी जाएं ताकि वो उनका अंतिम संस्कार कर सके.

न जाने ये कैसा मजाक है, जो कानून के नाम पर एक बेबस बाप के साथ किया गया और अब भाई के साथ किया जा रहा है. जिस बाप की जवान बेटी को पहले ही उससे छीन लिया गया हो, जिसके कत्ल और कत्ल के तरीके की कहानी को सुन कर श्रद्धा को न जानने वाले भी गमजदा हो जाते हों, उसी श्रद्धा के अंतिम संस्कार का इंतजार करते करते वो दुनिया से चले गए.

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ऊपर से सितम देखिए कि महरौली थाने के मालखाने से चार किलोमीटर दूर साकेत कोर्ट के रास्ते 12 सौ किलोमीटर दूर मुंबई तक श्रद्धा कब पहुंचेगी ये अब भी कोई बताने वाला नहीं है. श्रद्धा केस की सुनवाई करने वाला फास्ट ट्रैक कोर्ट कितना फास्ट है, ये इसी से समझ लीजिए कि तीन साल हो चुके हैं लेकिन अब भी ना ट्रायल पूरा हुआ है ना सारे गवाहों की गवाहियां अब तक पूरी हो पाई हैं. श्रद्धा के भाई के लिए सबसे तकलीफदेह घड़ी वो होती है, जब अदालत में सुनवाई के दौरान उसके सामने प्लास्टिक के बक्से में उसकी बहन की हड्डियां लाई जाती हैं.

कायदे से हमारे देश का ज्यूडिशियल सिस्टम एक है. फास्ट ट्रैक कोर्ट के काम करने का तरीका भी एक है. फिर क्या वजह है कि कोलकाता आरजी कर अस्पताल की जूनियर डॉक्टर के रेप और मर्डर केस का फैसला वही दो महीने में सुना देता है. मगर कोलकाता से दूर दिल्ली में एक दूसरा फास्ट ट्रैक कोर्ट श्रद्धा केस की सुनवाई में ही तीन साल ले लेता है. फिर भी फैसले का पता नहीं कब आएगा. 

ये वही श्रद्धा केस था जो जब खुला, तो पूरा देश श्रद्धा की कहानी सुन कर सन्न रह गया था. न्यूज चैनल और अखबारों में लगातार ये खबर सुर्खियों पर टंगी थी। नेता पुलिस सब बढ़ चढ़ कर दावे कर रहे थे. फिर सभी ने इस केस को भी फास्ट ट्रैक से उतार कर शायद मालगाड़ी के ट्रैक पर डाल दिया. कैसे आईए आपको बताते हैं-

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श्रद्धा मर्डर केस का खुलासा 12 नवंबर 2022 को हुआ था, जब दिल्ली के महरौली इलाके से आफताब पूनावाला पकड़ा गया. आफताब की गिरफ्तारी के बाद पता चला कि श्रद्धा का क़त्ल 18 मई 2022 को ही कर दिया था. मगर श्रद्धा की लाश नहीं मिली थी, क्योंकि आफताब ने श्रद्धा की लाश के टुकड़े कर उन्हें महरौली के किराये के घर में फ्रिज में रख दिया था. फिर अगले तीन महीनों तक वो किस्तों में उन टुकड़ों को फ्रिज से निकाल कर महरौली के जंगलों में फेंकता रहा. चूंकि वक्त बहुत ज्यादा बीत चुका था, लिहाजा पुलिस को लाश के नाम पर श्रद्धा की चंद हड्डियां ही मिली थीं. डीएनए टेस्ट से ये साबित हो गया था कि हड्डियां श्रद्धा की ही हैं. 

मीडिया की सुर्खियों के चलते श्रद्धा केस को फास्ट ट्रैक कोर्ट में भेज दिया गया. एफआईआर दर्ज होने के 75 दिन बाद 24 जनवरी 2023 को दिल्ली पुलिस ने इस मामले में चार्जशीट दाखिल की. चार्जशीट दाखिल होने के बाद लगभग 3 महीने फास्ट ट्रैक कोर्ट ने चार्ज फ्रेम करने में ही लगा दिए. 9 मई 2023 को चार्जफ्रेम हुआ. मगर चार्ज फ्रेम होने के बाद भी ट्रायल शुरू करने के लिए अदालत ने लगभग 1 महीना और ले लिया. 

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1 जून 2023 से श्रद्धा केस के मुकदमे की सुनवाई दिल्ली की साकेत कोर्ट में शुरू हुई. उम्मीद थी कि 6-9 महीने में फैसला आ ही जाएगा. निर्भया केस में भी फास्ट ट्रैक कोर्ट ने 9 महीने में अपना फैसला सुना दिया था. लेकिन अफसोस ऐसा हुआ नहीं. मुकदमे की कार्रवाई बीते तीन साल से जारी है. और आलम ये है कि अभी भी केस से जुड़ों तमाम गवाहों की गवाहियां ही खत्म नहीं हुई हैं. क्रॉस एग्जामिनेशन तो बाद की बात है. 

अब सवाल ये है कि फास्ट ट्रैक कोर्ट में मुकदमा होने के बावजूद इतना वक्त क्यों लग रहा है? तो इसकी एक बड़ी सीधी सी वजह है. शुरुआत में श्रद्धा का केस जिस फास्ट ट्रैक कोर्ट में था उस कोर्ट को कहीं ये डायरेक्शन ही नहीं था कि इस मुकदमे की सुनवाई डे टू डे होगी या आम केस की तरह. शुरुआत के क़रीब दो साल बीत जाने के बाद ये तय हुआ कि सुनवाई डे टू डे होगी. लेकिन डे टू डे सुनवाई में भी एक खेल हो गया. 

कहने को सुनवाई डे टू डे थी लेकिन सुनवाई के लिए रोज़ाना सिर्फ 2 घंटे का वक्त दिया गया. दोपहर 2 से 4 बजे. आरोपी आफताब के वकील ने इसका भी भरपूर फ़ायदा उठाया. उन्हें पता था कि सुनवाई दो घंटे ही चलेगी इसीलिए वो ज्यादातर कोर्ट में जानबूझ कर 15 मिनट, आधा घंटा, कई बार तो 45 मिनट तक देरी से पहुंचते. अब जाहिर है ऐसे में सुनवाई घंटा या डेढ़ घंटा ही होती. केस को डीले करना का इससे बेहतर टैक्टिक्स क्या होता?

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इतना ही नहीं केस में वकील के साथ साथ आरोपी आफताब पूनावाला ने भी कम कमाल नहीं दिखाया. अकेले आफताब की वजह से ऐसा कई बार हुआ जब सुनवाई टालनी पड़ी. अभी पिछले महीने ही बीस जुलाई को कोर्ट में इसलिए सुनवाई नहीं हो पाई क्योंकि आफताब को उस दिन एमए का एग्जाम देना था. वो इग्नू से जेल में रहते हुए पढ़ाई कर रहा है. इससे पहले कभी डेंटिस्ट के पास जाने के नाम पर तभी एंग्जायटी के लिए डाक्टर को दिखाने का नाम पर भी आफताब सुनवाई को टलवाता रहा है.

कोर्ट में सुनवाई के दौरान ही श्रद्धा के भाई श्रीजे का कई बार आफताब पूनावाला से आमना सामना हुआ. हांलाकि कभी दोनों में कोई बातचीत नहीं हुई. लेकिन जब जब श्रीजे आफताब को देखता उसे बहुत गुस्सा आता. श्रद्धा की वकील के मुताबिक कोर्ट के अंदर ऐसा कई बार हुआ जब मुल्जिम के कटघरे की जगह आफताब कोर्टरूम में सबसे अगली बेंच पर जहां वकील बैठते हैं, आकर बैठ जाता है. मुस्कुराता है. इस बारे में उन्होंने बाकायदा जज से शिकायत भी की.

अभी भी केस का आलम ये है कि इसमें जो सबसे अहम गवाह हैं उनकी गवाहियां होनी बाकी हैं. जिनमें केस के आईओ या डीएनए करने वाले डाक्टर शामिल हैं. श्रद्धा के भाई का कहना है कि फैसले में बेशक देरी हो रही है. लेकिन वो चाहता है कि जिस तरह आफताब ने श्रद्धा को मारा ठीक वैसे ही आफताब को मौत दी जानी चाहिए. हालांकि श्र्द्धा की वकील को भरोसा है कि इस साल शर्तिया कोर्ट का फैसला आ जाएगा और ये फैसला उनके ही हक में होगा.

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पर कहानी इस साल भी खत्म नहीं होगी. क्योंकि फास्ट ट्रैक कोर्ट का जो भी फैसला आएगा, उसे कोई ना कोई हाई कोर्ट में चैलेंज करेगा. अगर फास्ट ट्रैक कोर्ट आफताब पूना वाला को सजा-ए-मौत देता है, तो उस सूरत में भी उस फैसले पर मुहर हाई कोर्ट को ही लगाना है. हाई कोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट इसके बाद न जाने कितने पिटिशन, रिव्यू पिटिशन. जाहिर है श्रद्धा को मर कर भी अभी कई अदालतों के चक्कर काटने हैं. और जब तक ये चक्कर खत्म नहीं हो जाता, तब तक श्रद्धा के भाई को भी मुंबई से दिल्ली के न जाने कितने ही चक्कर काटने होंगे.

इधर, अपनी बहन के बाद पिता और दादी को खो कर इंसाफ की खातिर मुंबई से दिल्ली के चक्कर काट रहा है तो वहीं दूसरी तरफ असली गुनहगार यानी आफताब पूनावाला आराम से तिहाड़ में पढ़ाई कर रहा है, एग्जाम दे रहा है. उसे भी पता है कि अपने देश में इंसाफ जल्दी नहीं मिलता. उसे ये भी पता है कि अभी तो फास्ट ट्रैक कोर्ट एक शुरुआत है. अगर गलती से फांसी की सजा मिल भी गई, तो फांसी का वो फंदा उसके गले से न जाने कितने बरस दूर है. पर क्या सचमुच आफताब पूनावाला को श्रद्धा मर्डर केस में सजा-ए-मौत मिलेगी? क्या फास्ट ट्रैक कोर्ट की नजर में ये केस रेयरेस्ट ऑफ रेयर की कैटेगरी में आएगा? आरजी कर अस्पताल की जूनियर डॉक्टर के केस में हाई कोर्ट के फैसले ने इस सवाल को और गहरा बना दिया है.

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