भारतीय शेयर बाजार ने अचानक सबको हैरान किया है. लगातार 5 दिनों से तेजी का आलम है, 5 दिन में सेंसेक्स करीब 4000 अंक चढ़ चुका है, जिसमें 5 फीसदी से ज्यादा की तेजी दर्ज की गई. जबकि इस बीच अमेरिकी बाजार डरा रहा है, रोज गिर रहा है, पांच दिन में नैस्डैक करीब 5 फीसदी टूट चुका है, एक महीने में नैस्डैक 10 फीसदी तक गिर चुका है. तकनीकी तौर इसे 'बेयरिश जोन' माना जाता है.
सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि भारतीय बाजार रिकवरी का संकेत दे रहा? क्योंकि जब-जब अमेरिकी बाजार में दबाव बढ़ा है, उसका सबसे ज्यादा असर भारतीय बाजार पर हुआ है. अमेरिका-ईरान युद्ध की वजह से भारतीय बाजार 15 फीसदी से ज्यादा तक फिसल गया था. लेकिन अब अचानक सबकुछ नजरअंदाज कर भारतीय बाजार संभलने की कोशिश कर रहा है, आइए असली वजह को जानते हैं.
दरअसल, कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से थोड़ी राहत मिली है, लेकिन रैली जैसी कोई बात नहीं है. इस बीच कॉरपोरेट अर्निंग्स ने भी घरेलू बाजार को थोड़ी मजबूती दी है. लेकिन जानकारों की मानें तो सबसे बड़ा पॉजीटिव सिग्नल वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के उस बयान से आया है, जिसमें उन्होंने लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स (LTCG) टैक्स में कटौती पर विचार करने की बात कही है. इस संभावित राहत से निवेशकों का भरोसा थोड़ा मजबूत हुआ है.
कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने और सुलह की कोशिशों के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में अच्छी-खासी गिरावट आई है. भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का एक बहुत बड़ा हिस्सा आयात करता है. ऐसे में क्रूड ऑयल के दामों में नरमी आना भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा बूस्टर साबित हो सकता है.
कच्चा तेल महंगा होने से सरकार का बजट जरूर बिगड़ा है. लेकिन दूसरे रास्ते से सरकार को राहत मिल रही है. जीएसटी (GST) कलेक्शन सरकार के लिए रेवेन्यू का एक अहम जरिया है. अक्टूबर 2026 में भारत का जीएसटी कलेक्शन पिछले साल की तुलना में 22.9% की बढ़ोतरी के साथ 2.31 लाख करोड़ रुपये रहा. चालू वित्तीय वर्ष यानी 2026-27 के पहले सात महीनों (अप्रैल-अक्टूबर) के लिए कुल ग्रॉस GST कलेक्शन 14.78 लाख करोड़ रुपये हो गया है, जो पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले 13.2% की बढ़ोतरी को दर्शाता है.
यह इस बात का सीधा प्रमाण है कि देश के भीतर व्यापार, उत्पादन और उपभोग की गति बेहद तेज बनी हुई है. मजबूत जीएसटी आय सरकार के राजकोषीय घाटे को नियंत्रण में रखने में मदद करती है, जिससे वैश्विक रेटिंग एजेंसियों और निवेशकों के बीच भारत की साख मजबूत होती है.
वहीं वैश्विक उथल-पुथल के बीच घरेलू स्तर पर भारतीय कंपनियों के तिमाही नतीजे बाजार को सहारा दे रहे हैं. हालांकि कुछ सेक्टरों में दबाव जरूर देखा गया है. लेकिन चुनिंदा दिग्गज कंपनियों के बेहतर प्रदर्शन ने बाजार को टूटने से बचा लिया है. पिछले 5 दिनों से लगातार हरियाली यह साबित करती है कि भारतीय निवेशकों और घरेलू संस्थागत निवेशकों का कॉन्फिडेंस मजबूत है.
वित्त मंत्री ने स्वीकार किया है कि बदलते वैश्विक हालात और विदेशी संस्थागत निवेशकों के लगातार निकासी के बीच शेयर मार्केट को संभालने की जरूरत है. भारत को अपनी 7% से अधिक की जीडीपी विकास दर को बनाए रखने के लिए भारी मात्रा में पूंजी की आवश्यकता है, और इसके लिए शेयर बाजार का मजबूत रहना जरूरी है. अगर आगामी बजट में LTCG टैक्स के मोर्चे पर निवेशकों को कोई राहत मिलती है, तो यह भारतीय शेयर बाजार के लिए 'गेम-चेंजर' साबित हो सकता है.
हालांकि मौजूदा तेजी के बावजूद भारतीय शेयर बाजार में अपने हाई से करीब 10 फीसदी नीचे है, निफ्टी 50 का ऑल टाइम हाई 26,373.20 अंक है, जो कि उसने इसी साल जनवरी के पहले हफ्ते में लगाया था. भारतीय शेयर बाजार करीब 28 महीने से एक दायरे में कारोबार कर रहा है, भारतीय बाजार में गिरावट के मुख्य कारण विदेशी संस्थागत निवेशकों की भारी बिकवाली, वैश्विक बाजारों का दबाव और चुनिंदा सेक्टर्स के वैल्यूएशन में आई नरमी रही है.
रिटेल निवेशक बड़ी ताकत
विदेशी निवेशकों की भारी बिकवाली के बावजूद घरेलू संस्थागत निवेशकों और खुद को मजबूत मान रहे रिटेल निवेशकों ने बाजार को बड़े झटके से बचाए रखा है. एसआईपी के जरिए आ रहा पैसा बाजार को गिरने से बचा रहा है, लेकिन कब तक ये चलेगा? क्योंकि पिछले 2-3 साल से बाजार में पैसे लगाने वाले ज्यादातर रिटेल निवेशक नुकसान में हैं. अधिकतर निवेशकों के पोर्टफोलियो रेड हो चुका है. क्योंकि बाजार चलने का नाम नहीं ले रहा.
पिछले दो वर्षों से शेयर बाजार में उथल-पुथल के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था ने अपनी असाधारण मजबूती का परिचय दिया है. आज भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शुमार है, जिसकी विकास दर लगभग 7% के मजबूत दायरे में बनी हुई है. भारतीय अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी और अचूक ताकत इसकी घरेलू मांग है, जहां कई विकसित देश अपनी छोटी आबादी या मांग में कमी के कारण वैश्विक मंदी से तुरंत प्रभावित हो जाते हैं, वहीं 140 करोड़ से अधिक की आबादी वाला भारत अपने खुद के दम पर एक बड़ा बाजार खड़ा करता है.
देश के मध्यम वर्ग की बढ़ती आय और लाइफस्टाइल में बदलाव से ऑटोमोबाइल, एफएमसीजी, रियल एस्टेट और डिजिटल सर्विस जैसे सेक्टर में मांग लगातार बढ़ रही हैं. वैश्विक संकट की वजह से निर्यात पर असर पड़ रहा है. लेकिन डोमेस्टिक मांग बनी हुई है, यही वजह है कि बाहरी दबावों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूती से आगे बढ़ रही है.
अमित कुमार दुबे