पहला दिन
दोपहर 2:15 बजे: पहली चेतावनी
आज का दिन बाकी दिनों जैसा ही सामान्य था, मैं दोपहर का खाना खाकर अपनी डेस्क पर वापस लौटी ही थी कि करीब 2:15 बजे मेरी सोसायटी के व्हाट्सएप ग्रुप पर एक मैसेज आया- “क्या लाइट चली गई है? क्या सोसायटी डीजीपर चल रही है?”
मैसेज में कोई नई बात नहीं थी, दिल्ली-एनसीआर में पावर कट होना कोई ब्रेकिंग न्यूज नहीं है. मैंने मैसेज पर एक नजर डाली और वापस अपने काम में लग गई. वैसे भी, मुझे चिंता करने की जरूरत नहीं थी. मेरा घर सोसा/टी के उन चुनिंदा फ्लैटों में से है जिनमें इन्वर्टर लगा है. अगर डीजी बंद भी हो जाता, तो हमारे पास सुरक्षा की दूसरी लाइन मौजूद थी.
उस वक्त घर पर सब कुछ सामान्य चल रहा था, बच्चे स्कूल से लौट चुके थे, मैंने घर के कैमरे पर चेक किया. जल्द ही रूटीन फोन कॉल आया “मम्मा, खाने में क्या बना है?” मैंने जवाब दिया और वापस अपने काम में लग गई. उधर घर पर भी दोपहर अपनी रोज़मर्रा की रफ्तार से बीत रही थी.
मेरे पति अपने स्टडी रूम में थे, वर्क फ्रॉम होम करते हुए हमेशा की तरह कॉल्स ले रहे थे. मेरी बड़ी बेटी अपने होमवर्क में व्यस्त थी, जबकि छोटी बेटी लिविंग रूम में कार्टून देख रही थी. लाइटें जल रही थीं, पंखे चल रहे थे. रसोई में काम हो रहा था. वॉशिंग मशीन, माइक्रोवेव और बाकी उपकरण एक बटन दबाते ही चलने के लिए तैयार थे. सब कुछ इशारा कर रहा था कि शाम आम दिनों जैसी ही होने वाली है. बस, यह वैसी शाम नहीं होने वाली थी, मेरे फ्लैट के बाहर स्थितियां तेजी से बिगड़ने लगी थीं.
एक और मैसेज आया: “डीजी चल रहा है क्या?” किसी ने जवाब दिया “नहीं”
मुझे तब भी कोई खास फिक्र नहीं हुई, आखिर हमारे पास इन्वर्टर जो था.
फिर मेंटेनेंस टीम का अपडेट आया- मेन लाइन में खराबी के कारण ट्रांसफार्मर में स्पार्किंग हो रही है. डीजल जनरेटर से व्यवस्था चलाई जा रही है और खराबी ठीक होते ही सप्लाई बहाल कर दी जाएगी.
डीजी पहले ही कई घंटों से चल रहा था, आखिरकार, ओवरहीटिंग की वजह से उसे भी बंद करना पड़ा. लेकिन मेरे घर में अभी भी बिजली थी, इसलिए, मैं काम करती रही. शायद यही मेरी सबसे बड़ी भूल थी, मैं समस्या को सिर्फ अपने अपार्टमेंट की खिड़की से देख रही थी.
बाकी सोसायटी के लिए स्थिति लगातार असहज होती जा रही थी. डीजी लिफ्ट और कॉमन एरिया को तो चालू रख सकता था, लेकिन एसी, वॉशिंग मशीन और माइक्रोवेव जैसे भारी उपकरण उस पर नहीं चल सकते थे. और यह दिल्ली-एनसीआर की जुलाई वाली भयानक उमस की गर्मी थी, ऐसी उमस जहां खाली बैठे-बैठे भी पसीना छूटने लगता है.
सोसायटी का व्हाट्सएप ग्रुप जल्द ही किसी ब्रेकिंग न्यूज वाले न्यूजरूम जैसा दिखने लगा.
“इलेक्ट्रीशियन आया? “फॉल्ट ठीक हुआ?” “लाइट कब तक आएगी?” “डीजी कब चलेगा?”
शाम 7:45 बजे: इन्वर्टर ने जवाब दे दिया
मैं अपने फोन पर बिना किसी खास चिंता के यह सब देख रही थी, मेरे हिसाब से, मेरे घर में बिजली थी और मेरा इन्वर्टर अभी भी चल रहा था, फिर शाम करीब 7:45 बजे मेरे पति ने मुझे वीडियो कॉल किया. उनका वीडियो कॉल करना असामान्य था. मैं दफ्तर में ब्रेकिंग न्यूज और न्यूजरूम की आपाधापी में व्यस्त थी, इसलिए मैंने कॉल देखा, थोड़ी झुंझलाई और नहीं उठाया.
कुछ ही सेकंड बाद, उन्होंने मुझे एक फोटो भेजी, मैंने फोटो खोली, वह तस्वीर लगभग पूरी तरह से काली थी.
डाइनिंग टेबल पर सिर्फ एक मोमबत्ती जल रही थी, एक पल के लिए तो मुझे समझ ही नहीं आया कि मैं क्या देख रही हूं. फिर मुझे अहसास हुआ. इन्वर्टर ने जवाब दे दिया था, लगभग पांच घंटे के बैकअप के बाद, हमारी सुरक्षा की आखिरी लाइन ने भी घुटने टेक दए थे.
रात 8:00 बजे: मोमबत्तियां कहां हैं?
मैंने तुरंत घर पर फोन मिलाया.
पति की आवाज में घबराहट और चिड़चिड़ाहट थी, उनके ऑफिस के कॉल्स कट गए थे, घर में अंधेरा था. फिर उन्होंने पूछा मोमबत्तियां कहां रखी हैं?
मुझे कोई अंदाजा नहीं था, आजकल घर में मोमबत्तियां रखता ही कौन है? हम ऐसे मेट्रो शहर में रहते हैं जहां आप कुछ ही मिनटों में ग्रॉसरी, दवाइयां, खाना, इलेक्ट्रॉनिक्स और लगभग कुछ भी ऑर्डर कर सकते हैं. कुछ घंटों का पावर कट ज़्यादा से ज़्यादा एक असुविधा भर होता है. मोमबत्तियां तो आप जन्मदिन, दिवाली या सजावट के लिए खरीदते हैं, अंधेरे में गुज़ारा करने के लिए नहीं. इस बीच, खाना बनाने वाली बाई आ चुकी थी, रात का खाना बनना था.
बच्चों और बाई ने मिलकर पूरा घर छान मारा. आखिरकार, स्टोर रूम से जन्मदिन की कुछ छोटी मोमबत्तियां और दिवाली की पुरानी मोमबत्तियां मिल गईं, मोमबत्ती की रोशनी में खाना बना.
और जब पूरी रसोई में अंधेरा हो और सबको भूख लगी हो, तो आप नए प्रयोग नहीं करते. आप सबसे आसान चीज़ बनाते है पुलाव. उधर, मैं घर के लिए निकल चुकी थी. सोसायटी का व्हाट्सएप ग्रुप लगातार बज रहा था. मेंटेनेंस टीम की सफाई थी कि ग्रिड सप्लाई और ट्रांसफार्मर बिजली बोर्ड के नियंत्रण में हैं, जबकि सोसायटी का दूसरा कनेक्शन केवल कॉमन एरिया की सेवाओं के लिए है.
वजह बताने के लिए सबके पास जवाब थे, बस बिजली किसी के पास नहीं थी.
रात 9:00 बजे: अंधेरे में स्वागत है
जब मैं आखिरकार अपनी सोसायटी पहुंची, तो नजारा बिल्कुल बदला हुआ था. पूरी सोसायटी में घना अंधेरा था, लेकिन पार्क अजीब तरह से गुलजार थे. बच्चे इधर-उधर भाग रहे थे. औरतें एक साथ बैठी थीं. पुरुष ट्रांसफार्मर को लेकर चर्चा कर रहे थे. बुजुर्ग अपने घरों से बाहर निकल आए थे. ऐसा लग रहा था मानो पूरी सोसायटी को उनके फ्लैटों से निकालकर पार्कों में भेज दिया गया हो.
मैं अपने फ्लैट की तरफ बढ़ते हुए बस यही सोच रही थी शुक्र है, मैं तीसरी मंजिल पर रहती हूं. मैं उस स्थिति की कल्पना भी नहीं करना चाहती थी कि अगर मैं 18वीं मंजिल पर रह रही होती तो क्या होता. जब मैं अपने फ्लोर पर पहुंची, तो देखा कि मेरे घर का मुख्य दरवाजा पूरा खुला हुआ था. आमतौर पर यह मजबूती से बंद रहता है, लेकिन बिजली न होने से डोरबेल काम नहीं कर रही थी और बढ़ती गर्मी की वजह से हवा के लिए सारे दरवाजे-खिड़कियां खोल दिए गए थे.
मेरी आठ साल की छोटी बेटी ने हाथ में मोमबत्ती लिए बड़े उत्साह के साथ मेरा स्वागत किया. घर में घुप्प अंधेरा था, लेकिन बच्चे बेहद खुश थे, उनके लिए यह एक थ्रिलिंग एडवेंचर था, मेरे लिए, यह एक सर्वाइवल चैलेंज बनता जा रहा था. पति अभी भी अपने फोन के हॉटस्पॉट से ऑफिस की कॉल्स लेने की कोशिश कर रहे थे. एक पल के लिए मैंने उन्हें देखा और स्थिति के पागलपन के बारे में सोचा. एक आईटी फर्म के एवीपी (AVP), वर्क फ्रॉम होम करते हुए, मोमबत्ती की रोशनी में बैठकर मोबाइल हॉटस्पॉट के ज़रिए कॉर्पोरेट दुनिया चलाने की कोशिश कर रहे थे.
लगता था कॉर्पोरेट इंडिया आधिकारिक तौर पर पाषाण युग में प्रवेश कर चुका था. आखिरकार उन्होंने सहकर्मियों को स्थिति बताई और रात के लिए काम बंद कर दिया. मैंने भी अपने ऑफिस मैसेज कर दिया कि अगर यही हाल रहा तो कल ऑफिस आना मुश्किल हो जाएगा, तभी एक और नई मुसीबत सामने आई. आरओ का पानी खत्म हो रहा था, हमने तुरंत डिलीवरी ऐप से पानी की बोतलें मंगवाईं. और फिर शुरू हुआ हमारा अगला मिशन: मोमबत्तियां ढूंढना.
रात 11:00 बजे: बिना पंखे की रात
मैंने और मेरे पति ने करीब 10 मिनट ई-कॉमर्स ऐप्स छान मारे, वहां सैकड़ों तरह की मोमबत्तियां थीं. रंग-बिरंगी मोमबत्तियां, खुशबूदार मोमबत्तियां, सजावटी मोमबत्तियां, रोमांटिक मोमबत्तियां, लग्जरी मोमबत्तियां. लेकिन वह मोटी, साधारण और काम आने वाली सफेद मोमबत्ती? गायब! ऐसा लग रहा था कि ई-कॉमर्स कंपनियों ने हमें कैंडल-लाइट डिनर के लिए तो तैयार किया था, लेकिन पावर कट के लिए नहीं.
पति पास की दुकानों की तरफ गए, कई दुकानों में मोमबत्तियां खत्म हो चुकी थीं. आखिरकार एक छोटी दुकान में कुछ मोमबत्तियां मिल गईं. वह हाथ से चलाने वाला एक पुराना पंखा भी खरीद लाए, जैसा शायद हमने दशकों से इस्तेमाल नहीं किया था, तब तक रात के 11 बज चुके थे, उमस बर्दाश्त से बाहर थी, मच्छर हमला बोल चुके थे और नींद दूर-दूर तक गायब थी.
सोसायटी के कुछ लोग बिजली विभाग के दफ्तर यह पता करने गए थे कि आखिर हुआ क्या है. खबर अच्छी नहीं थी. ट्रांसफार्मर पूरी तरह से जल चुका था, नया ट्रांसफार्मर लगाना पड़ेगा. उस वक्त कोई इलेक्ट्रीशियन उपलब्ध नहीं था, अब जो भी होता अगली सुबह ही होता,इसी बीच, दूसरी सोसायटी में रहने वाले एक दोस्त के परिवार ने हमें अपने घर आकर रहने का न्योता दिया, मैंने बच्चों से पूछा कि क्या वे वहां चलना चाहते हैं. उन्होंने मुझे ऐसे देखा मानो मैंने उनकी जिंदगी की सबसे मजेदार छुट्टी खत्म करने का सुझाव दे दिया हो.
वे क्यों जाते? यहां न स्कूल का चक्कर था, न होमवर्क का डर और न पढ़ाई का दबाव. पावर कट ने उन्हें बिन मांगे एक ऐसी छुट्टी दे दी थी जिसकी वे कभी खुले तौर पर मांग नहीं कर सकते थे,. मैंने जैसे-तैसे हाथ वाले पंखे से हवा करके उन्हें सुलाया.
लेकिन मेरी रात करवटें बदलते ही बीती, इस उम्मीद में कि शायद किसी भी पल पंखा घूम पड़े, पर ऐसा नहीं हुआ.
उधर सोसायटी का व्हाट्सएप ग्रुप पूरी रात जागता रहा, एक वक्त पर किसी ने लिखा: “चलो थोड़ा बचपन जी लो... जबरदस्ती।”
हमारी हालत का इससे सटीक बयान शायद कोई और नहीं हो सकता था.
दूसरा दिन
सुबह 10:00 बजे
अगली सुबह मैंने बच्चों को स्कूल नहीं भेजा, बिजली नहीं थी तो प्रेस नहीं चल सकती थी, बिना प्रेस की हुई यूनिफॉर्म पहनकर बच्चे कैसे जाते? और सच कहूं तो, बिना पंखे के पूरी रात बिताने के बाद स्कूल जाना किसी की प्राथमिकता में नहीं था.
जब काम वाली बाई आई, तो खुला दरवाजा देखकर ही सब समझ गई. “दीदी, आपके यहां रात भर लाइट नहीं थी? अभी भी नहीं है?
फिर उसने वह सवाल पूछा जो मेरे दिमाग में कौंध गया, “इतने बड़े घरों में भी क्या ऐसा होता है?” मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं था, सुबह के 10 बज चुके थे और इलेक्ट्रीशियन का कोई अता-पता नहीं था. स्थिति में कोई सुधार न होता देख, मेरे पति और सोसायटी के कुछ अन्य लोग नोएडा अथॉरिटी सेक्टर 96 के जन सुनवाई दफ्तर पहुंचे.
उन्होंने अधिकारियों को बताया कि कैसे बिजली न होने से हर कोई परेशान है. बच्चे पंखे और बत्तियों के बिना बेहाल हैं, बुजुर्ग गर्मी से जूझ रहे हैं, घर बिना पानी और बिजली के ठप पड़े हैं और कामकाजी लोग अपना काम नहीं कर पा रहे हैं, जो समस्या एक छोटी सी असुविधा से शुरू हुई थी, वह अब रोजमर्रा की जिंदगी को पूरी तरह थाम चुकी थी.
अधिकारियों ने बिल्डर से संपर्क किया और समस्या का जल्द से जल्द समाधान करने को कहा. बिल्डर ने भरोसा दिलाया कि मामले को देखा जा रहा है. तभी एक और अपडेट आया. सोसायटी अध्यक्ष को यूपीपीसीएल (UPPCL) के एक निदेशक का फोन आया, जिन्होंने बताया कि सोसायटी के लिए जितने क्षमता वाले ट्रांसफार्मर की ज़रूरत है, वह फिलहाल उनके पास उपलब्ध ही नहीं है.
तब यह साफ हो गया, यह मामला दो-चार घंटों में सुलझने वाला नहीं है, इसी दौरान मेरे फोन की बैटरी खत्म हो गई. मैं उसे चार्ज करने के लिए गार्ड रूम गई, गार्ड ने मुझे देखा और कहा: “मैडम, आपके फोन से पहले दो और फोन लगे हैं. उनके बाद आपका चार्ज होगा.” मैंने कतार देखी. समझ आ गया कि बिजली संकट के दौरान फोन की बैटरी पर्सेंटेज ही सबसे बड़ी करेंसी बन जाती है.
शाम 4:00 बजे: जवाब पाने के लिए ₹20,000
बिजली विभाग से कोई स्पष्ट जवाब न मिलने पर, निवासियों ने खुद पहल करने का फैसला किया और ट्रांसफार्मर की जांच के लिए किर्लोस्कर के तकनीशियन को बुलाने के लिए मिलकर ₹20,000 जुटाए. सिर्फ एक विज़िट के 20,000 रुपये! लेकिन उस वक्त किसी को पैसों की परवाह नहीं थी, हमें बस स्पष्ट जवाब चाहिए था. तकनीशियन शाम करीब 4 बजे पहुंचा. उसने लगभग दो-तीन घंटे ट्रांसफार्मर की जांच में बिताए.
आखिरकार, उसने अपना फैसला सुनाया, ट्रांसफार्मर बदलना ही पड़ेगा. इसका कोई अस्थायी इलाज या जुगाड़ नहीं है, एक नया ट्रांसफार्मर ही एकमात्र रास्ता है.
बिल्डर ने भिवानी से एक नया ट्रांसफार्मर अरेंज किया. रात के करीब 1 बजे तक उसके पहुंचने की उम्मीद थी. उसके बाद इलेक्ट्रीशियन काम शुरू करता, तब जाकर कहीं बिजली बहाल होती. इसका मतलब था बिना पंखे की एक और रात. बिना एसी की एक और रात, मोमबत्तियों, मच्छरों और उमस भरी एक और रात.
शाम: जिंदगी घर से बाहर निकल आई
जो लोग आमतौर पर काम, स्कूल, ऑफिस कॉल्स और घर के कामों में उलझे रहते थे, वे बाहर बैठकर आपस में बातें कर रहे थे. बच्चों ने पार्कों पर कब्जा कर लिया था, वे दौड़ रहे थे, खेल रहे थे और हंस रहे थे. वे अपनी जिंदगी का सबसे बेहतरीन समय बिता रहे थे, क्योंकि कम से कम आज कोई उनसे यह कहने वाला नहीं था- “अंदर जाओ और पढ़ाई करो.”
न वाई-फाई था, न टीवी, न होमवर्क का दबाव, न ही घर के अंदर बैठने की कोई वजह. यहां तक कि मैं, जिसे शाम की सैर का वक्त कभी नहीं मिलता, खुद को बाहर बैठा और पड़ोसियों से बात करते हुए पा रही थी. मेरी एक पड़ोसी ने बताया कि उन्हें चंडीगढ़ जाना था, जहां उनके बेटे का इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमिशन हुआ था, लेकिन इस ब्लैकआउट के कारण उन्हें अपनी यात्रा स्थगित करनी पड़ी.
अपनी बालकनी से मैंने देखा कि एक परिवार ने पार्क में बाहर ही गद्दे बिछा लिए थे और मच्छरदानी लगाकर पूरी रात खुले आसमान के नीचे सो रहा था, सबकी कहानियां अलग थीं, लेकिन परेशानी सबकी एक ही थी. फिर भी, इस बात में एक अजीब सा सुकून था कि हम सब मिलकर इस दौर से गुजर रहे थे. लोग एक-दूसरे का हाल-चाल पूछ रहे थे, जो बन पड़ता, शेयर कर रहे थे. साथ बैठ रहे थे, बातें कर रहे थे, मदद कर रहे थे.
ब्लैकआउट ने हमारी रोजमर्रा की दिनचर्या की परतें उतार फेंकी थीं और एक अजीब तरीके से पूरी सोसायटी को करीब ला दिया था. अचानक हम सब बराबर हो गए थे. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था कि आपका फ्लैट कितना बड़ा है, आपकी गाड़ी कितनी महंगी है या आपका पद कितना ऊंचा है पंखा किसी के लिए भी नहीं चल रहा था.
हमने एक बार फिर मोमबत्ती की रोशनी में खाना खाया. बच्चे सो गए और हम इंतजार करने लगे.
तीसरा दिन
रात 1:00 बजे
आधी रात के आसपास, व्हाट्सएप ग्रुप अचानक मैसेजों से पट गया. “ट्रांसफार्मर आ रहा है!” फिर: “ट्रांसफार्मर पहुंच गया!”
लोग घरों से बाहर निकलने लगे, रात के करीब 1 बजे नया ट्रांसफार्मर आखिरकार आ ही गया. औरतें और पुरुष उसे घेरकर खड़े हो गए.
उस भीड़ को देखकर मुझे 'गुलिवर्स ट्रैवल्स' की याद आ गई जब गुलिवर किसी अनजान देश में पहुंचता है और पूरी आबादी उसे देखने के लिए जमा हो जाती है. बस फर्क इतना था कि इस बार हमारा गुलिवर एक ट्रांसफार्मर था. हर कोई उस मशीन को देखना चाहता था जो हमारी ज़िंदगी को वापस पटरी पर लाने वाली थी. इलेक्ट्रीशियन भी आ गया. काम शुरू हुआ. हम इंतज़ार करते रहे... और इंतज़ार करते रहे.
सुबह 5:00 बजे: आखिरकार बत्ती जली
आखिरकार, सुबह के करीब 5 बजे, लगभग तीन दिनों की अफरातफरी के बाद बिजली लौट आई, छत का पंखा धीरे-धीरे घूमने लगा, मैंने अपनी पूरी जिंदगी में कभी किसी पंखे की इतनी कद्र नहीं की थी, उससे आती हवा एयर-कंडीशनर की सबसे ठंडी हवा से भी ज्यादा सुकून देने वाली लग रही थी. मैं लेट गई और अपनी आंखें मूंद लीं, यह भयावह परीक्षा आखिरकार खत्म हो चुकी थी.
3 दिन बिना बिजली के रहने ने मुझे क्या सिखाया
पीछे मुड़कर देखती हूं, तो सबसे अजीब बात गर्मी नहीं थी, न मच्छर थे, न ही वे रतजगे. सबसे चौंकाने वाली बात तो यह अहसास था कि हमारी इतनी व्यवस्थित और आधुनिक शहरी जिंदगी कितनी आसानी से ताश के पत्तों की तरह ढह सकती है.
बिजली काट दीजिए और अचानक लिफ्ट सिर्फ सीढ़ियां बनकर रह जाती है. एसी एक बेकार डिब्बा बन जाता है. आरओ पानी की समस्या बन जाता है. वॉशिंग मशीन लोहे का एक बड़ा बक्सा बन जाती है. वाई-फाई गायब हो जाता है, फोन की बैटरी खत्म होते ही वह बेकार हो जाता है और आप बाहरी दुनिया से कट जाते हैं और एक साधारण सा छत का पंखा घर की सबसे कीमती चीज़ बन जाता है.
तीन दिनों के लिए हमारी पूरी दिनचर्या ठहर सी गई थी, लेकिन इस प्रक्रिया में कुछ अप्रत्याशित भी हुआ. हमने अपने पड़ोसियों से बातें करना शुरू कर दिया. बच्चे स्क्रीन के सामने बैठने के बजाय बाहर खेलने लगे. परिवार एक साथ बैठे. लोगों ने मोमबत्तियां, पानी, खाना और जानकारियां साझा कीं. जो लोग आम दिनों में एक-दूसरे को देखकर सिर्फ मुस्कुराकर निकल जाते थे, वे अचानक एक-दूसरे के घर का हाल जानने लगे थे.
इस ब्लैकआउट ने याद दिलाया कि जिसे हम 'सामान्य जीवन' कहते हैं, वह असल में सुविधाओं का एक नाजुक ढांचा भर है. हम यह मानकर चलते हैं कि स्विच दबाते ही लाइट जल जाएगी, पंखा घूमने लगेगा, लिफ्ट चलेगी और वाई-फाई कनेक्ट हो जाएगा... जब तक कि अचानक इनमें से कुछ भी होना बंद न हो जाए.
इन तीन दिनों ने मुझे बेहद साधारण चीजों की कद्र करना सिखा दिया: एक ठंडा कमरा, चलता हुआ फ्रिज, चार्ज फोन और सबसे बढ़कर छत के पंखे की वह हल्की सी घुरघुर. अगली सुबह, जब मेरी आंख खुली तो पंखे की आवाज़ आ रही थी, मैंने फोन उठाने या वक्त देखने की जल्दी नहीं की, मैं बस चुपचाप लेटी रही और कुछ सेकंड तक उस आवाज़ को सुनती रही. तीन दिनों के सन्नाटे के बाद, पंखे की वह साधारण सी सरसराहट किसी संगीत जैसी लग रही थी.
और अब, जब भी कोई सोसायटी के व्हाट्सएप ग्रुप पर पूछता है, “लाइट है क्या?”, तो मेरी निगाहें खुद-ब-खुद छत के पंखे की तरफ उठ जाती हैं, उसकी वह हल्की सी सनसनाहट, जो कभी महसूस भी नहीं होती थी, अब मेरी सबसे पसंदीदा आवाज़ बन चुकी है.
जैस्मिन आनंद