भारत के शहरी इलाकों की आबादी लगातार बढ़ रही है. हर साल करीब 1% आबादी शहरी इलाकों में बस रही है. 2030 तक 58 करोड़ लोगों के शहरों में रहने का अनुमान है. 2008 में जब मैकिन्से की रिपोर्ट ने पहली बार इस ट्रेंड का पता लगाया था, तब यह संख्या 34 करोड़ थी, इस माइग्रेशन को संभालने के लिए देश में अभी 6 मेट्रो सिटीज हैं.
DLF होम डेवलपर्स के मैनेजिंग डायरेक्टर आकाश ओहरी का कहना है कि यह काफी नहीं है. 'बिज़नेस टुडे' के 'इंडिया एट 100' इवेंट में बोलते हुए, ओहरी ने कहा कि अगले दशक में भारत जो शहर बनाएगा, वे तय करेंगे कि आजादी की 100वीं सालगिरह पर देश किस हालात में होगा. उन्होंने सैटेलाइट टाउन और प्राइवेट मेट्रो से लेकर पेड़ लगाने और कॉर्पोरेट अधिकारियों के बोनस को सस्टेनेबिलिटी टारगेट से जोड़े जाने जैसे कई मुद्दों पर चर्चा की.
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शहरीकरण को रोकना नहीं, बेहतर तरीके से संभालना जरूरी: ओहरी
ओहरी ने कहा कि भारत में शहरीकरण होकर रहेगा, लेकिन असली सवाल यह है कि देश इस बदलाव को किस तरह संभालता है. आज जिस तरह से माइग्रेशन हो रहा है, उसे देखते हुए एक तरफ भारत के ट्रिलियन-डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की बात हो रही है, जबकि दूसरी तरफ देश में चर्चा और रोजगार के प्रमुख केंद्र के तौर पर कुछ ही बड़े मेट्रो शहर सामने हैं.
उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षों में इन शहरों पर आबादी का दबाव बढ़ना तय है. ऐसे में केवल बड़े शहरों पर निर्भर रहने के बजाय उनके आसपास मजबूत सैटेलाइट और फीडर टाउन विकसित करने की जरूरत है. इन शहरों को बेहतर मोबिलिटी कनेक्टिविटी, मजबूत भौतिक इंफ्रास्ट्रक्चर और ऐसी परिवहन व्यवस्था से जोड़ना होगा, जिससे लोग आसानी से मुख्य शहरों तक आ-जा सकें.
ओहरी के मुताबिक, मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर अगले दो दशकों में शहरों की ओर बढ़ने वाली आबादी के लिए पर्याप्त नहीं होगा. इसलिए शहरीकरण के इस ट्रेंड का विरोध करने के बजाय इसे ध्यान में रखकर अभी से लंबी अवधि की योजना बनानी होगी.
उन्होंने विकसित देशों का उदाहरण देते हुए कहा कि मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर आर्थिक विकास के बाद नहीं आता, बल्कि कई बार आर्थिक विकास को आगे बढ़ाने का माध्यम बनता है.
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पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप से बड़े बदलाव की संभावना
ओहरी ने शहरी विकास में पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल की भूमिका पर भी जोर दिया, उन्होंने अंतरराष्ट्रीय उदाहरण देते हुए न्यूयॉर्क के हडसन यार्ड, लंदन के कैनरी वार्फ और सिंगापुर के प्राइवेट-लीड डेवलपमेंट मॉडल का उल्लेख किया. उन्होंने कहा कि ये उदाहरण बताते हैं कि जब सरकार और निजी क्षेत्र दोनों लंबे समय के परिणामों के लिए प्रतिबद्ध होकर काम करते हैं, तो बड़े पैमाने पर बदलाव संभव है.
उन्होंने बताया कि DLF ने गुरुग्राम में इसी तरह के मॉडल को अपने तरीके से अपनाया है, ओहरी ने राघवेंद्र मार्ग प्रोजेक्ट और गुरुग्राम में DLF के प्राइवेट मेट्रो नेटवर्क का उदाहरण देते हुए कहा कि जब नागरिकों की आकांक्षाएं सरकारी तंत्र की गति से आगे निकल जाती हैं, तो निजी डेवलपर भी शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं.
30-50 साल की प्लानिंग की जरूरत
ओहरी के मुताबिक, भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति और लंबी अवधि की योजना तैयार करना है. उन्होंने कहा कि शहरों का विकास कुछ वर्षों या एक-दो चुनावी चक्रों के आधार पर नहीं किया जा सकता, इसके लिए 30 से 50 साल आगे की सोच के साथ प्लानिंग करनी होगी.
उनके मुताबिक, भारत में शहरीकरण की रफ्तार को देखते हुए अब यह तय करना जरूरी है कि आने वाली आबादी कहां बसेगी, वह कैसे यात्रा करेगी, उसे किस तरह का इंफ्रास्ट्रक्चर मिलेगा और शहरों का विस्तार किस दिशा में होगा. इसलिए भविष्य के भारत के लिए चुनौती सिर्फ नए शहर बनाने की नहीं, बल्कि ऐसे कनेक्टेड, मोबिलिटी-फ्रेंडली और मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर वाले शहरी क्लस्टर तैयार करने की है, जो बढ़ती आबादी और आर्थिक गतिविधियों दोनों का दबाव संभाल सकें,
ओहरी के मुताबिक, शहरी विकास की सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ अच्छी नीतियां बनाना नहीं, बल्कि उनका लगातार और प्रभावी अमल सुनिश्चित करना है, उन्होंने कहा कि भारतीय शहरों में अच्छे सिविल सर्वेंट और नीतियां मौजूद हैं, लेकिन कचरा प्रबंधन जैसी बुनियादी सेवाओं में इरादे और जमीनी अमल के बीच अंतर दिखाई देता है, उन्होंने DLF के ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर मॉडल का उदाहरण देते हुए कहा कि पार्क, ग्रीन कवर, पेड़ ट्रांसप्लांटेशन और सस्टेनेबिलिटी कंपनी की सोच का हिस्सा रहे हैं.
उनके मुताबिक, मुंबई जैसे शहरों को भौगोलिक सीमाओं के कारण वर्टिकल विकास की जरूरत है, लेकिन दूसरे शहरों को खुली जगहों, पार्कों, साफ हवा, बेहतर शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर और रीसाइकल किए गए पानी को प्राथमिकता देनी चाहिए. साथ ही, कॉर्पोरेट सेक्टर को सस्टेनेबिलिटी के लिए जवाबदेह बनाना भी जरूरी है, क्योंकि टिकाऊ शहर केवल इरादों से नहीं, बल्कि मजबूत गवर्नेंस, लगातार अमल और जवाबदेही से बनते हैं.
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