'बेंगलुरु का बोझ कम करना होगा’, ट्रैफिक और ग्रोथ पर एक्सपर्ट्स की राय

इंडिया टुडे कर्नाटक समिट 2026 में विशेषज्ञों ने इस बात पर चर्चा की कि बेंगलुरु अपनी तेज़ी से हो रही बढ़त को कैसे संभाल सकता है, बिना उस खासियत को खोए जो इसे भारत के सबसे आकर्षक शहरों में से एक बनाती है.

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विकास जरूरी है, लेकिन बेहतर प्लानिंग के साथ (Photo-ITG) विकास जरूरी है, लेकिन बेहतर प्लानिंग के साथ (Photo-ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 26 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 4:05 PM IST

बेंगलुरु की कामयाबी अब उसके लिए एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है. देशभर से नौकरियां, कंपनियां और लोग शहर की ओर आकर्षित हो रहे हैं, लेकिन सड़कें, पब्लिक ट्रांसपोर्ट और सिविक इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ते दबाव के साथ कदमताल नहीं कर पा रहे हैं. ऐसे में सवाल यह है कि बेंगलुरु अपनी तेज आर्थिक और आबादी की ग्रोथ को कैसे संभाले और साथ ही शहर की वह खासियत भी बरकरार रखे, जो इसे देश के सबसे आकर्षक शहरों में शामिल करती है.

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‘इंडिया टुडे कर्नाटक समिट 2026’ में इसी मुद्दे पर एक पैनल चर्चा हुई. इसमें बेंगलुरु डेवलपमेंट अथॉरिटी के चेयरमैन और विधायक एनए हैरिस, WRI इंडिया के फेलो श्रीनिवास अलाविल्ली, बेंगलुरु पॉलिटिकल एक्शन कमिटी की CEO रेवती अशोक और ब्रांड एक्सपर्ट हरीश बिजूर शामिल हुए. उन्होंने ने ट्रैफिक, पब्लिक ट्रांसपोर्ट, शहरी नियोजन और बेंगलुरु के भविष्य से जुड़े कई अहम पहलुओं पर अपनी राय रखी.

पब्लिक ट्रांसपोर्ट बढ़ा, लेकिन चुनौती अभी बड़ी है

WRI इंडिया के फेलो श्रीनिवास अलाविल्ली ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में बेंगलुरु में पब्लिक ट्रांसपोर्ट के इस्तेमाल में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है. ‘शक्ति योजना’, बस सेवाओं के विस्तार और नए मेट्रो कनेक्शनों की शुरुआत से बस और मेट्रो से सफर करने वाले यात्रियों की संख्या बढ़ी है.

उनके मुताबिक, यह इस बात का संकेत है कि अगर पब्लिक ट्रांसपोर्ट सुविधाजनक, भरोसेमंद और आसानी से उपलब्ध हो, तो लोग निजी कार और दोपहिया वाहनों का इस्तेमाल कम करने के लिए तैयार हैं.

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हालांकि, रेवती अशोक का मानना है कि शहर को अभी लंबा रास्ता तय करना है. मेट्रो और सबअर्बन रेल भविष्य के लिए जरूरी हैं, लेकिन आने वाले वर्षों में बसें ही पब्लिक ट्रांसपोर्ट की रीढ़ बनी रहेंगी. उन्होंने भरोसेमंद बस सेवा, बेहतर बस स्टॉप और रियल-टाइम बस जानकारी उपलब्ध कराने पर जोर दिया. उनका कहना है कि अगर लोगों को यह भरोसा नहीं होगा कि बस समय पर आएगी, तो वे निजी वाहन छोड़ने के लिए तैयार नहीं होंगे.

सिर्फ सड़कें बनाने से नहीं सुलझेगा ट्रैफिक

पैनल में बेंगलुरु के सीमित सड़क नेटवर्क और पहले से विकसित शहर में नई सड़कें बनाने की मुश्किलों पर भी चर्चा हुई.
रेवती अशोक ने कहा कि कुछ बेहद भीड़भाड़ वाले इलाकों में सिर्फ सड़कें चौड़ी करने के बजाय अंडरग्राउंड इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे विकल्पों पर विचार करना पड़ सकता है. वहीं, एनए हैरिस ने बेहतर फुटपाथ और स्ट्रीट वेंडर्स के लिए व्यवस्थित जगह उपलब्ध कराने की जरूरत पर जोर दिया. उन्होंने कहा कि बिना वैकल्पिक व्यवस्था के फुटपाथ से हॉकरों को हटाने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलेगा.

पैनलिस्ट्स ने यह भी माना कि ट्रैफिक की समस्या केवल इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी नहीं है. लोगों की यात्रा करने की आदतों में बदलाव भी जरूरी है. पब्लिक ट्रांसपोर्ट को मजबूत करने के साथ नागरिकों को उसका इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित करना होगा.

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ब्रांड एक्सपर्ट हरीश बिजूर ने चर्चा में एक अहम सुझाव दिया, उन्होंने कहा कि बेंगलुरु को ‘डीमैग्नेटाइज’ करने की जरूरत है. उनका तर्क है कि बेंगलुरु कंपनियों, टेक्नोलॉजी प्रोफेशनल्स और निवेश के लिए एक बड़े चुंबक की तरह काम करता है, लेकिन शहर का मौजूदा फिजिकल इंफ्रास्ट्रक्चर इस रफ्तार से बढ़ते दबाव को अनंत समय तक नहीं संभाल सकता.

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बिजूर ने कहा कि बेंगलुरु की आबादी और वर्टिकल ग्रोथ तेजी से बढ़ी है, जबकि सड़क नेटवर्क उसी अनुपात में नहीं बढ़ पाया. इसलिए शहर के मुख्य हिस्से पर लगातार दबाव बढ़ाने के बजाय विकास को आसपास के इलाकों और सैटेलाइट शहरों तक फैलाना जरूरी है. उन्होंने रामनगर जैसे इलाकों का उदाहरण देते हुए कहा कि सबअर्बन रेल, मेट्रो और बेहतर ट्रांसपोर्ट कनेक्टिविटी के जरिए इन क्षेत्रों को बेंगलुरु से जोड़ा जा सकता है. इससे रोजगार और आर्थिक गतिविधियों का दबाव शहर के एक ही हिस्से पर नहीं रहेगा.

‘लालच अच्छा है, लेकिन एक हद तक ही’

हरीश बिजूर ने बेंगलुरु के बेतहाशा विस्तार को लेकर भी चेतावनी दी, उन्होंने कहा, “लालच अच्छा है, लेकिन एक हद तक ही.” उनका कहना था कि आर्थिक विकास जरूरी है, लेकिन शहर के इंफ्रास्ट्रक्चर की भी एक सीमा है. सड़कें, ट्रांसपोर्ट, पानी, सीवेज और दूसरी नागरिक सुविधाएं एक निश्चित क्षमता तक ही बढ़ते दबाव को संभाल सकती हैं.

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वहीं, श्रीनिवास अलाविल्ली ने लोगों और कंपनियों को बेंगलुरु से दूर जाने की सलाह देने के बजाय शहर की रोजगार पैदा करने की क्षमता को सकारात्मक नजरिए से देखने की बात कही, उनके मुताबिक असली समस्या यह है कि इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास आबादी और आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार के साथ तालमेल नहीं बिठा पाया है.

उन्होंने शहर की प्रशासनिक क्षमता बढ़ाने की जरूरत पर भी जोर दिया, उनके मुताबिक ट्रैफिक पुलिस, इंजीनियरों और दूसरे जरूरी सरकारी अधिकारियों की संख्या तेजी से बढ़ते शहर की जरूरतों के मुकाबले कम है.

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बेंगलुरु आखिर चाहता क्या है?

पैनल की चर्चा अंत में एक बड़े सवाल पर पहुंची बेंगलुरु को आखिर किस तरह का शहर बनना चाहिए?एनए हैरिस ने बेंगलुरु को भारत के सबसे रहने योग्य शहरों में से एक बताते हुए कहा कि नागरिकों और सरकार को एक-दूसरे पर दोष डालने के बजाय मिलकर समाधान तलाशने होंगे. वहीं, हरीश बिजूर ने नागरिकों की जिम्मेदारी पर जोर दिया. उन्होंने चेतावनी दी कि बेंगलुरु कहीं ऐसा ‘किराये का शहर’ न बन जाए, जहां लोग रहते और काम करते हैं, लेकिन शहर के प्रति अपनी जिम्मेदारी महसूस नहीं करते.

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