भारत में घर खरीदना ज्यादातर लोगों की जिंदगी का सबसे बड़ा आर्थिक फैसला होता है. लोग फ्लैट की लोकेशन, कीमत, सुविधाओं और सोसायटी को देखकर बुकिंग तो कर देते हैं, लेकिन कई बार जरूरी कागजात की जांच करना भूल जाते हैं. यही लापरवाही आगे चलकर कानूनी विवाद, कब्जा मिलने में देरी, बैंक लोन में परेशानी या निवेश की रकम फंसने की वजह बन सकती है. इसलिए फ्लैट खरीदने से पहले सिर्फ बिल्डर की बातों पर भरोसा न करें, बल्कि इन दस्तावेजों की जांच जरूर करें.
टाइटल डीड और मालिकाना हक के कागजात: सबसे पहले यह पता करें कि जिस जमीन पर प्रोजेक्ट बना है, उसका कानूनी मालिक कौन है. बिल्डर के पास जमीन का मालिकाना हक है या उसे विकास करने का अधिकार मिला है, इसकी जांच करें. पुरानी रजिस्ट्री और मालिकाना हक से जुड़े दस्तावेजों की कड़ी भी देखें. अगर फ्लैट रीसेल में खरीद रहे हैं, तो मौजूदा मालिक की रजिस्ट्री जरूर जांचें.
एन्कम्ब्रेंस सर्टिफिकेट (EC): इस दस्तावेज से पता चलता है कि संपत्ति पर कोई रजिस्टर्ड कर्ज, गिरवी या वित्तीय बोझ तो नहीं है. इसे संबंधित सब-रजिस्ट्रार कार्यालय से प्राप्त किया जा सकता है. ध्यान रखें कि EC में सभी तरह के विवाद या दावे दर्ज हों, यह जरूरी नहीं है, इसलिए केवल इसी के आधार पर संपत्ति को विवादमुक्त न मानें.
RERA रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट: निर्माणाधीन प्रोजेक्ट खरीदने से पहले उसका RERA रजिस्ट्रेशन नंबर जरूर जांचें. संबंधित राज्य की RERA वेबसाइट पर जाकर प्रोजेक्ट की मंजूरी, निर्माण की स्थिति, प्रस्तावित कब्जे की तारीख और बिल्डर के खिलाफ दर्ज शिकायतों की जानकारी लें. यूपी में खरीदार UPRERA पोर्टल पर प्रोजेक्ट का रिकॉर्ड देख सकते हैं.
स्वीकृत नक्शा और लेआउट प्लान: बिल्डर से प्राधिकरण द्वारा मंजूर किया गया बिल्डिंग प्लान और लेआउट प्लान मांगें, इसमें देखें कि कितने टावर, फ्लैट, मंजिल, पार्किंग और दूसरी सुविधाओं को मंजूरी मिली है. मौके पर बनी इमारत और मंजूर नक्शे में अंतर होने पर आगे कानूनी परेशानी हो सकती है.
निर्माण शुरू करने की अनुमति और जरूरी NOC: प्रोजेक्ट के लिए संबंधित प्राधिकरण से मिली निर्माण अनुमति यानी कमेंसमेंट सर्टिफिकेट की जांच करें. बड़ी इमारतों में अग्निशमन विभाग, पर्यावरण और अन्य संबंधित विभागों की मंजूरी भी जरूरी हो सकती है. ये दस्तावेज प्रोजेक्ट की वैधानिक स्थिति समझने में मदद करते हैं.
बिल्डर-बायर एग्रीमेंट: इस समझौते में फ्लैट का कारपेट एरिया, कीमत, भुगतान की शर्तें, कब्जे की तारीख, देरी होने पर मुआवजा और रद्द करने की शर्तें लिखी होती हैं. साइन करने से पहले हर बिंदु पढ़ें, केवल ब्रोशर या बिल्डर के मौखिक वादों पर भरोसा न करें.
कंप्लीशन और ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट: तैयार फ्लैट का कब्जा लेने से पहले Completion Certificate (CC) और Occupancy Certificate (OC) जरूर देखें. CC बताता है कि निर्माण स्वीकृत योजना के अनुसार पूरा हुआ है, जबकि OC संबंधित प्राधिकरण की ओर से इमारत के इस्तेमाल की अनुमति से जुड़ा दस्तावेज है. इनकी वैधता और संबंधित टावर पर लागू होने की पुष्टि करें.
प्रॉपर्टी टैक्स और बकाया भुगतान की रसीदें: रीसेल फ्लैट खरीदते समय प्रॉपर्टी टैक्स, बिजली, पानी और सोसायटी मेंटेनेंस के बकाये की जांच करें. बिल्डर से भी प्रोजेक्ट से जुड़े बकाया और भुगतान की स्थिति स्पष्ट कराएं. संबंधित रसीदें और नो-ड्यूज प्रमाणपत्र जरूर लें.
बैंक NOC और लोन क्लोजर दस्तावेज: अगर फ्लैट या जमीन पर पहले से बैंक का लोन है तो बैंक से NOC और लोन चुकाने का प्रमाण लें. यह भी सुनिश्चित करें कि संपत्ति पर बैंक का कोई बकाया दावा या गिरवी शेष न हो, जरूरत पड़ने पर बैंक से चार्ज हटाए जाने की पुष्टि कराएं.
सेलर की पहचान और पावर ऑफ अटॉर्नी: मालिक के आधार, पैन और अन्य पहचान दस्तावेजों में दर्ज नाम का संपत्ति के कागजात से मिलान करें. अगर कोई प्रतिनिधि पावर ऑफ अटॉर्नी (POA) के आधार पर फ्लैट बेच रहा है, तो उसकी वैधता और बिक्री का अधिकार जांचें. सोसायटी में रीसेल फ्लैट होने पर शेयर सर्टिफिकेट और सोसायटी के जरूरी दस्तावेज भी देखें.
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