डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ वॉर के बावजूद अमेरिका भारत के लिए सबसे बड़ा एक्सपोर्ट बाजार बना हुआ है. जुलाई 2025 से जून 2026 के 12 महीनों में अमेरिका को भारत का गुड्स एक्सपोर्ट करीब 2% से थोड़ा ज्यादा घटा है, लेकिन कुल भारतीय एक्सपोर्ट में अमेरिका की हिस्सेदारी करीब 20% बनी हुई है. यानी टैरिफ का असर जरूर पड़ा है, लेकिन अमेरिकी बाजार से भारतीय सामान की मांग में अब तक बड़ी गिरावट नहीं आई है.
इसकी पहली बड़ी वजह है कि भारत के एक्सपोर्ट का एक बड़ा हिस्सा नए 10% अतिरिक्त टैरिफ के दायरे से बाहर है. जुलाई में अमेरिका ने Section 301 के तहत भारत पर 10% का अतिरिक्त टैरिफ लगाया. लेकिन ये मौजूदा MFN ड्यूटी के ऊपर लगने वाला अतिरिक्त शुल्क है. सरकार के मुताबिक करीब 45% भारतीय एक्सपोर्ट इस नए अतिरिक्त टैरिफ से बाहर हैं. इसमें जेनेरिक फार्मास्युटिकल्स और स्मार्टफोन जैसे प्रोडक्ट शामिल हैं.
इसके अलावा स्टील, एल्युमिनियम और ऑटो पार्ट्स जैसे वो सामान, जिन पर पहले से Section 232 के तहत शुल्क लागू है, उन पर भी ये अतिरिक्त 10% ड्यूटी नहीं लगेगी. बाकी करीब 55% एक्सपोर्ट पर 10% अतिरिक्त शुल्क लागू है. यानी भारतीय एक्सपोर्ट बास्केट का एक बड़ा हिस्सा सीधे इस नए टैरिफ की मार से बच गया.
इलेक्ट्रॉनिक्स और फार्मा ने संभाला मोर्चा
दूसरी बड़ी वजह कुछ बड़े एक्सपोर्ट सेक्टर्स का अच्छा प्रदर्शन है. इलेक्ट्रॉनिक्स और जेनेरिक फार्मा जैसे सेक्टरों को शुरुआती टैरिफ से राहत मिली, इसलिए इनकी अमेरिकी बाजार में पकड़ बनी रही. जून 2026 में भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स एक्सपोर्ट में सालाना आधार पर करीब 19% की बढ़ोतरी भी दर्ज हुई. दूसरी तरफ टेक्सटाइल, गारमेंट्स और दूसरे लेबर-इंटेंसिव सेक्टर्स पर दबाव ज्यादा रहा. यानी टैरिफ का असर पूरे एक्सपोर्ट सेक्टर पर एक जैसा नहीं पड़ा.
चीन से दूरी, भारत के लिए मौका
तीसरी वजह है अमेरिका की अपनी जरूरत क्योंकि अमेरिकी कंपनियां चीन पर सप्लाई चेन की निर्भरता कम करना चाहती हैं. ऐसे में भारत को एक वैकल्पिक मैन्युफैक्चरिंग और सप्लाई बेस के तौर पर फायदा मिल रहा है. इसका मतलब ये नहीं है कि अमेरिकी कंपनियों ने बड़े पैमाने पर मैन्युफैक्चरिंग भारत शिफ्ट कर दी है. लेकिन जिस समय चीन से सप्लाई चेन डायवर्सिफाई करने की कोशिश चल रही है, उस समय भारत के एक्सपोर्टर्स के लिए अमेरिकी बाजार में अपनी जगह बनाए रखना आसान हुआ है.
एक्सपोर्टर्स ने भी बदली रणनीति
टैरिफ बढ़ने के बाद भारतीय कंपनियां भी ऐसे प्रोडक्ट्स पर ज्यादा जोर दे रही हैं, जिन पर शुल्क का असर तुलनात्मक रूप से कम है. यानी कंपनियों ने सिर्फ कीमत बढ़ाकर अमेरिकी खरीदारों पर बोझ डालने के बजाय अपने प्रोडक्ट मिक्स और बाजार की रणनीति को एडजस्ट किया है. यही वजह है कि टैरिफ बढ़ने के बावजूद अमेरिका को भारत के कुल गुड्स एक्सपोर्ट में गिरावट सीमित रही.
अमेरिका की जरूरत भी कम नहीं हुई
भारत के लिए अमेरिका इसलिए भी खास है क्योंकि वहां भारतीय सामान की मांग सिर्फ एक-दो सेक्टर तक सीमित नहीं है. इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मा, इंजीनियरिंग गुड्स, केमिकल्स, जेम्स एंड ज्वेलरी और दूसरे कई सेक्टर अमेरिकी बाजार में अपनी जगह बना चुके हैं. टैरिफ बढ़ने के बाद भी अमेरिकी खरीदारों के लिए भारत से सप्लाई पूरी तरह बंद करना आसान नहीं है. यही वजह है कि अतिरिक्त लागत के बावजूद भारतीय एक्सपोर्टर्स को बाजार में बने रहने का मौका मिला है.
हालांकि फिलहाल आंकड़े राहत देने वाले हैं, लेकिन टैरिफ का दबाव खत्म नहीं हुआ है. नए Section 301 शुल्क के तहत करीब 55% भारतीय एक्सपोर्ट पर 10% अतिरिक्त ड्यूटी लागू है. खासकर टेक्सटाइल और दूसरे लेबर-इंटेंसिव सेक्टरों के लिए चुनौती ज्यादा है. सरकार के मुताबिक टेक्सटाइल के लिए प्रस्तावित अलग मैकेनिज्म अभी शुरु नहीं हुआ है. इसलिए अभी तक की तस्वीर ये है कि अमेरिका को भारत का एक्सपोर्ट टैरिफ की वजह से टूटा नहीं है.
वहीं कुछ बड़े सेक्टर टैरिफ से बाहर हैं, क्योंकि अमेरिका को भारत जैसे वैकल्पिक सप्लायर की जरूरत है और भारतीय कंपनियां भी बदली हुई परिस्थितियों के हिसाब से अपनी रणनीति बदल रही हैं. लेकिन अगर टैरिफ का दबाव आगे बढ़ता है, तो खासकर लेबर-इंटेंसिव सेक्टर्स के लिए मुश्किल बढ़ सकती है. फिलहाल तो अमेरिका भारत का सबसे बड़ा एक्सपोर्ट बाजार बना हुआ है और टैरिफ के बावजूद इसकी पकड़ कमजोर नहीं हुई है.
आजतक बिजनेस डेस्क