अभी तो शुरुआत है... RBI फिर देगा झटका, रेपो रेट बढ़ाने पर एकमत नहीं MPC

RBI Inflation Curb Measures: महंगाई का दबाव बढ़ने के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के सामने ब्याज दरों को लेकर चुनौती बढ़ गई है. केंद्रीय बैंक ने करीब चार साल बाद रेपो रेट बढ़ाकर 5.50% कर दिया है और मौद्रिक नीति का रुख भी सख्त किया है. बैठक के मिनट्स से संकेत मिलता है कि महंगाई पर काबू पाने के लिए आगे और बढ़ोतरी की जरूरत पड़ सकती है.

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महंगाई का दबाव बढ़ने के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के सामने ब्याज दरों को लेकर चुनौती बढ़ गई है. (File Photo) महंगाई का दबाव बढ़ने के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के सामने ब्याज दरों को लेकर चुनौती बढ़ गई है. (File Photo)

आजतक बिजनेस डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 22 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 10:53 AM IST

महंगाई पर काबू पाने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को ब्याज दरें और बढ़ानी पड़ सकती हैं, लेकिन ऐसा बहुत तेजी से किया गया तो देश की आर्थिक विकास दर पर दबाव बढ़ सकता है. बुधवार को जारी मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक के मिनट्स से यह संकेत मिला है. इस महीने RBI ने करीब चार साल बाद पहली बार रेपो रेट में बढ़ोतरी की थी. अब महंगाई के बढ़ते दबाव के बीच सवाल है कि क्या आने वाले महीनों में आम लोगों के लिए कर्ज लेना और महंगा हो सकता है.

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रेपो रेट बढ़कर 5.50% पर पहुंचा

RBI की मौद्रिक नीति समिति ने इस महीने सर्वसम्मति से रेपो रेट में 25 आधार अंक की बढ़ोतरी की थी. इसके बाद यह दर बढ़कर 5.50% हो गई. इसके साथ ही केंद्रीय बैंक ने अपनी मौद्रिक नीति के रुख को न्यूट्रल से बदलकर कैलिब्रेटेड टाइटनिंग कर दिया. इसका संकेत है कि महंगाई पर काबू पाने के लिए आगे भी सख्त कदम उठाए जा सकते हैं और निकट भविष्य में ब्याज दरों में कटौती की संभावना कम हो सकती है.

रेपो रेट वह ब्याज दर है, जिस पर RBI बैंकों को कर्ज देता है. इसमें बढ़ोतरी होने पर बैंकों के लिए कर्ज लेना महंगा हो सकता है. इसका असर होम लोन, कार लोन और दूसरे कर्ज की ब्याज दरों पर भी पड़ सकता है. हालांकि, ग्राहकों के कर्ज की दरों में कितना और कब बदलाव होगा, यह बैंकों के फैसलों और कर्ज की शर्तों पर निर्भर करता है.

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महंगाई क्यों बढ़ा रही RBI की चिंता?

RBI के सामने सबसे बड़ी चुनौती महंगाई को काबू में रखने की है. पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के बीच कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी और मॉनसून में कम बारिश से खाद्य महंगाई का दबाव बढ़ा है. इससे आम लोगों के घरेलू बजट के साथ-साथ केंद्रीय बैंक की मौद्रिक नीति को लेकर भी चिंता बढ़ी है. सितंबर 2026 में भारत की खुदरा महंगाई दर बढ़कर 5.54% पर पहुंच गई. यह बाजार के अनुमान से ज्यादा थी और RBI की 6% की ऊपरी लिमिट के करीब रही.

केंद्रीय बैंक ने अक्टूबर-दिसंबर तिमाही में औसत महंगाई दर 6% रहने का अनुमान जताया है. वहीं, पूरे वित्त वर्ष के लिए महंगाई का अनुमान 5% से बढ़ाकर 5.2% कर दिया गया है. MPC की बैठक के मिनट्स के मुताबिक, समिति के कई सदस्य इस बात को लेकर चिंतित थे कि महंगाई का दबाव अर्थव्यवस्था के दूसरे हिस्सों में भी फैल सकता है. उनका मानना था कि कीमतों में बढ़ोतरी को नियंत्रित करना मुश्किल होने से पहले जरूरी कदम उठाए जाने चाहिए.

आगे ब्याज दरें बढ़ाने के पक्ष में कौन?

RBI की डिप्टी गवर्नर पूनम गुप्ता ने संकेत दिया कि महंगाई को नियंत्रण में रखने के लिए आगे भी नीतिगत ब्याज दरें बढ़ाने की जरूरत पड़ सकती है. उन्होंने महंगाई की उम्मीदों को और बढ़ने से रोकने के लिए समय पर कार्रवाई करने के महत्व पर जोर दिया. वहीं, MPC सदस्य सौगत भट्टाचार्य ने भी मौद्रिक नीति को सख्त रखने के पक्ष में तर्क दिए.

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हालांकि, उन्होंने आगाह किया कि अगर ब्याज दरों में बहुत तेजी से बढ़ोतरी की गई, तो इससे आर्थिक विकास की रफ्तार प्रभावित हो सकती है. RBI के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर इंद्रनील भट्टाचार्य ने भी महंगाई को नियंत्रित करने के लिए सक्रिय रुख अपनाने का समर्थन किया. उनका नजरिया था कि कीमतों पर दबाव बढ़ने के और संकेत मिलने का इंतजार करने के बजाय समय रहते कदम उठाना बेहतर हो सकता है.

रेपो रेट बढ़ाने की रफ्तार पर सर्वसम्मति नहीं

महंगाई पर चिंता के बावजूद MPC के सभी सदस्य ब्याज दरों में आक्रामक बढ़ोतरी के पक्ष में नहीं हैं. समिति के सदस्य नागेश कुमार और राम सिंह ने मौद्रिक नीति का रुख न्यूट्रल से कैलिब्रेटेड टाइटनिंग करने के फैसले का विरोध किया. राम सिंह ने चेतावनी दी कि नीति के रुख में बदलाव को लंबे समय तक ब्याज दरें बढ़ाने के संकेत के रूप में देखा जा सकता है, जबकि फिलहाल इसकी पर्याप्त वजह नहीं दिखती.

उन्होंने ब्याज दरों को लंबे समय तक ऊंचा बनाए रखने के बजाय जरूरत के मुताबिक छोटी और धीरे-धीरे बढ़ोतरी करने का समर्थन किया. उनका मानना था कि ब्याज दरों में आक्रामक बढ़ोतरी की आशंका से उपभोक्ताओं की मांग कमजोर हो सकती है. इसका असर उन क्षेत्रों पर भी पड़ सकता है, जो सीधे तौर पर ब्याज दरों के प्रति संवेदनशील नहीं हैं. यानी महंगाई रोकने के लिए सख्त कदम जरूरी हो सकते हैं, लेकिन उनकी रफ्तार तय करते समय आर्थिक विकास पर पड़ने वाले असर को भी ध्यान में रखना होगा.

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महंगाई के बावजूद GDP ग्रोथ का अनुमान बढ़ा

दिलचस्प बात यह है कि RBI ने महंगाई का अनुमान बढ़ाने के साथ ही देश की आर्थिक विकास दर का अनुमान भी बढ़ाया है. केंद्रीय बैंक ने अपनी ताजा मौद्रिक नीति समीक्षा में चालू वित्त वर्ष के लिए आर्थिक विकास दर का अनुमान 40 आधार अंक बढ़ाकर 7.1% कर दिया. इससे पता चलता है कि RBI को आर्थिक गतिविधियों में मजबूती की उम्मीद है, लेकिन बढ़ती महंगाई के जोखिम को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. ब्याज दरें ज्यादा बढ़ने से कर्ज की लागत बढ़ सकती है और घरों तथा कंपनियों के खर्च और निवेश पर असर पड़ सकता है. दूसरी ओर, अगर महंगाई लंबे समय तक ऊंची बनी रहती है, तो लोगों की खरीदारी की क्षमता कमजोर हो सकती है.

आम लोगों के लिए क्या है इसका मतलब?

रेपो रेट फिलहाल 5.50% पर है और RBI के बदले हुए नीतिगत रुख से निकट भविष्य में ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद कमजोर हुई है. अगर आगे रेपो रेट बढ़ता है, तो होम लोन और कार लोन जैसे कर्ज महंगे हो सकते हैं. हालांकि, इसका सीधा असर इस बात पर निर्भर करेगा कि RBI कब और कितनी बढ़ोतरी करता है और बैंक अपनी ब्याज दरों में कितना बदलाव करते हैं. फिलहाल केंद्रीय बैंक के सामने दोहरी चुनौती है. उसे महंगाई पर काबू पाने के लिए जरूरत के मुताबिक सख्ती करनी है, लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित करना है कि ब्याज दरों में बहुत तेज बढ़ोतरी से आर्थिक विकास की रफ्तार कमजोर न पड़े.

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