मिडिल ईस्‍ट में जंग, पूरी दुनिया का निकल रहा 'तेल'... भारत-चीन में भी बना डर!

मिडिल ईस्‍ट में छिड़ी जंग ने तेल की कीमतों में जोरदार इजाफा किया है. वहीं अब ईरान ने 'स्‍ट्रेट ऑफ होर्मुज' को भी बंद कर दिया है, जहां से दुनिया का 20 फीसदी एनर्जी होकर गुजरता है. ऐसे में तेल की कीमत 100 डॉलर के पार जा सकती है, जो ग्‍लोबल इकोनॉमी को प्रभावित कर सकती है.

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युद्ध से तेल संकट गहराने का आसार. (Photo: ITG) युद्ध से तेल संकट गहराने का आसार. (Photo: ITG)

हिमांशु द्विवेदी

  • नई दिल्‍ली,
  • 05 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 1:55 PM IST

मिडिल ईस्‍ट में ईरान, इजरायल और संयुक्‍त राज्‍य अमेरिका के बीच चल रहे जंग को 6 दिन हो चुके हैं, जिससे पूरा मिडिल ईस्‍ट प्रभावित हुआ है. हवाई सफर भी इस क्षेत्र में पूरी तरह से रुक चुका है. साथ ही तेल सप्‍लाई भी बाधित हुई है. इस युद्ध में कई देशों के शामिल होने की आशंका दिख रही है, क्‍योंकि ईरान ने मिडिल ईस्‍ट के कई देशों में मिसाइलें दागी हैं.

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जिस कारण मिडिल ईस्‍ट में स्थिति बेहद नाजुक है. इधर, चीन भी ईरान के सपोर्ट में बयान दे रहा है, जिससे हालात और भी गंभीर होते दिख रहे हैं. हालांकि, अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप ने 4 हफ्तों में युद्ध के खत्‍म होने का भी संकेत दिया है. लेकिन दुनिया को सबसे ज्‍यादा जिस बात की टेंशन है, वह कच्‍चे तेल की आपूर्ति.

तनाव की वजह से 'स्‍ट्रेट ऑफ होमुर्ज' का रास्‍ता बंद है, ईरान के कंट्रोल में आने वाला यह (स्‍ट्रेट ऑफ होमुर्ज) एक संकरा मार्ग है, जहां से दुनिया का 20 फीसदी एनर्जी इम्‍पोर्ट होती है. खासकर चीन और भारत इस एरिया से सबसे ज्‍यादा कच्‍चा तेल आयात करते हैं. भारत यहां से 50 फीसदी के आसपास तेल का इम्पोर्ट करता है. 

कच्‍चे तेल की कीमतों में उछाल
स्‍ट्रेट ऑफ होमुर्ज फारस की खाड़ी को खुले समुद्र से जोड़ता है. इसी रास्‍ते से सऊदी अरब, इराक, कुवैत और यूएई का कच्‍चा तेल एशिया और यूरोप के बाजारों में जाता है. ईरान के द्वारा यह रास्‍ता बंद करने के बाद कच्‍चे तेल के दाम में भारी उछाल आई है, क्‍योंकि खाड़ी से बाहर निकलने का यही मुख्‍य द्वार है. कच्‍चे तेल की कीमत अब 85 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गई है. 5 मार्च को इसमें 2.50 फीसदी की तेजी देखी गई. एक्‍सपर्ट्स का कहना है कि अगर ये युद्ध लंबा खिंचता है तो ब्रेंट क्रूड ऑयल का दाम 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच सकता है. 

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अर्थव्‍यवस्‍थाओं पर सीधा असर 
कच्‍चा तेल महंगा होने से दुनिया की बड़ी अर्थव्‍यवस्‍थाओं खासकर भारत, चीन, अमेरिका और यूरोप के देशों पर इसका सीधा असर दिख सकता है. एक्‍सपर्ट्स मान रहे हैं कि भारत पर इसका गंभीर असर पड़ सकता है, क्‍योंकि भारत अपनी जरूरत का करीब 85% कच्चा तेल आयात करता है. इसमें से बड़ा हिस्‍सा खाड़ी देशों से आता है.

सरकारी सूत्रों के मुताबिक भारत के पास करीब 50 दिन का ईंधन रिजर्व है. जिसमें 25 दिनों का कच्चा तेल भंडार और 25 दिनों का पेट्रोलियम  उत्पाद शामिल है. ऐसे में आपूर्ति लंबे समय तक बाधित होने से पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ सकते हैं, ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक्स महंगे, महंगाई में उछाल और रुपये पर दबाव आ सकता है, जो भारत की जीडीपी को प्रभावित कर सकते हैं. 

वहीं चीन दुनिया का सबसे बड़ा कच्‍चा तेल आयातक है, उसकी मैन्युफैक्चरिंग इंडस्‍ट्री कच्‍चे तेल पर ही निर्भर है. चीन भी 80 फीसदी से ज्‍यादा कच्‍चा तेल आयात करता है. ऐसे में मिडिल ईस्‍ट से सप्‍लाई बाधित होने के बाद उत्पादन लागत बढ़ेगी, निर्यात प्रतिस्पर्धा कम हो सकती है, प्रोडक्‍ट्स सप्‍लाई पर असर और इंडस्‍ट्री डेवलपमेंट धीमा हो सकता है.

हालांकि चीन के पास अभी सबसे ज्‍यादा 6 महीने का तेल रिजर्व रखा है, जो चीन के लिए बड़ी राहत है. इसके अलावा, चीन ने रूस जैसे देश से तेल आयात करना जारी रखा है. लेकिन तेल के दाम बढ़ने से इसके अर्थव्‍यवस्‍था पर दबाव आ सकता है. 

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अमेरिका के अर्थव्‍यवस्‍था पर क्‍या असर? 

इसके अलावा, अमेरिका के पास 4 महीने का अधिकारिक तेल रिजर्व है, लेकिन वेनेजुएला के तेल को शामिल करें तो इसके पास एक विशाल भंडार है. फिर भी कच्‍चे तेल की कीमतों में ग्‍लोबल स्‍तर पर बढ़ने से अमेरिका में भी महंगाई बढ़ेगी, जिससे उसके भी अर्थव्‍यवस्‍था पर असर हो सकता है. साथ ही अमेरिका ईरान के साथ सीधे तौर पर जंग में शामिल है, जिससे लागत में इजाफा होने से इसके अर्थव्‍यवस्‍था पर गहरा प्रभाव पड़ने वाला है. यूरोप और एशिया के अन्‍य देशों को भी इस युद्ध से अर्थव्‍यवस्‍था में नकारात्‍मक परिणाम देखना पड़ सकता है.

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