भारत की अर्थव्यवस्था तेज रफ्तार से बढ़ रही है, लेकिन इसका असर विदेशी निवेशकों के रुख पर उसी तरह नहीं दिख रहा. देश की जीडीपी (GDP) ग्रोथ मजबूत होने के बावजूद विदेशी संस्थागत निवेशक (Foreign Institutional Investors) भारतीय शेयर बाजार में पहले की तरह पैसा नहीं लगा रहे हैं. पिछले दो साल में भारतीय शेयरों से करीब 40 अरब डॉलर (₹3.84 लाख करोड़) की विदेशी पूंजी बाहर निकल चुकी है.
ब्रोकरेज फर्म बर्नस्टीन रिसर्च (Bernstein Research) की 21 सितंबर 2026 की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में विदेशी निवेश को आकर्षित करने वाले कुछ पुराने संकेत अब पहले जितने असरदार नहीं रह गए हैं. यानी सिर्फ यह देखना कि भारत की अर्थव्यवस्था कितनी तेजी से बढ़ रही है, विदेशी निवेशकों के लिए अब पर्याप्त वजह नहीं है.
विदेशी संस्थागत निवेशक यानी FII का रुख पिछले कुछ समय में काफी बदला है. FII का मतलब विदेश के बड़े फंड और संस्थागत निवेशकों से है, जो भारतीय शेयर बाजार में पैसे लगाते हैं. बर्नस्टीन के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले 24 महीनों में FII का टोटल आउटफ्लो करीब 56.3 अरब डॉलर रहा. वहीं इस दौरान 38.6 अरब डॉलर का इन्फ्लो देखा गया. यानी बीते 24 महीनों में जितना विदेशी पैसा भारतीय शेयर बाजार में आया, उससे कहीं ज्यादा पैसा बाजार से बाहर गया.
पिछले 10 साल की तस्वीर देखें तो भारतीय शेयर बाजार में FII का नेट इंवेस्टमेंट सिर्फ करीब 4 अरब डॉलर रहा. इसके मुकाबले घरेलू संस्थागत निवेशक (Domestic Institutional Investors) करीब 300 अरब डॉलर लगा चुके हैं. इससे साफ है कि भारतीय बाजार में घरेलू निवेशकों की भूमिका लगातार बढ़ी है, जबकि विदेशी निवेशकों का योगदान कमजोर पड़ा है.
GDP बढ़ रही, तो विदेशी निवेश क्यों नहीं?
एक समय ऐसा था जब भारत की आर्थिक वृद्धि और विदेशी निवेश का रुख काफी हद तक एक साथ चलता था. यानी भारत की GDP ग्रोथ तेज होती थी तो विदेशी निवेश भी बढ़ता था. बर्नस्टीन के मुताबिक, यह रिश्ता करीब 2007 तक काफी मजबूत था. लेकिन इसके बाद दोनों के बीच संबंध कमजोर होते गए. हाल के वर्षों में तो स्थिति ऐसी रही कि भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार मजबूत रहने के बावजूद FII का पैसा बाहर जाता रहा. इसका मतलब यह है कि विदेशी निवेशक अब सिर्फ भारत की आर्थिक वृद्धि देखकर निवेश का फैसला नहीं कर रहे.
अब ब्याज दर से ज्यादा रुपये पर है नजर
विदेशी निवेशकों के फैसले में भारत और अमेरिका की ब्याज दरों का अंतर भी अहम रहा है. 2012 से 2018 के बीच ब्याज दरों का यह अंतर और FII निवेश के बीच काफी करीबी संबंध देखने को मिला था. लेकिन पिछले 4-5 साल में यह संबंध कमजोर हुआ है. अब डॉलर के मुकाबले रुपये की चाल विदेशी निवेशकों के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण दिखाई दे रही है. बर्नस्टीन के मुताबिक, हाल की अवधि में FII इन्फ्लो और रुपये की चाल के बीच संबंध करीब 72.9 फीसदी रहा है.
रुपये की कमजोरी से घटती FII की कमाई
इसे आसान उदाहरण से समझिए. मान लीजिए किसी विदेशी निवेशक ने भारत में पैसा लगाया और भारतीय शेयर की कीमत बढ़ भी गई. लेकिन इसी दौरान रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हो गया, तो डॉलर में पैसा वापस बदलते समय उसकी कमाई कम हो सकती है. यानी भारतीय बाजार में शेयर के बढ़ने से ही विदेशी निवेशक का पूरा हिसाब तय नहीं होता. उसे रुपये और डॉलर की चाल भी देखनी पड़ती है.
भारत का बाजार महंगा लगना भी बड़ी वजह
विदेशी निवेशकों की चिंता सिर्फ रुपये तक सीमित नहीं है. बाजार की कीमत यानी वैल्यूएशन (Valuation) भी एक बड़ा मुद्दा है. वैल्यूएशन का आसान मतलब है कि किसी शेयर या पूरे बाजार की कीमत उसकी कमाई के मुकाबले कितनी महंगी या सस्ती है. बर्नस्टीन के मुताबिक, 2020 के बाद भारत का वैल्यूएशन दूसरे उभरते बाजारों की तुलना में लगातार ऊंचा रहा. दिसंबर 2023 से सितंबर 2026 के बीच भारत का एवरेज रिलेटिव वैल्यूएशन 162 फीसदी रहा. इसी अवधि में नेट FII आउटफ्लो करीब 44 अरब डॉलर रहा. यानी जिस दौर में भारत दूसरे उभरते बाजारों की तुलना में महंगा दिखा, उसी दौरान विदेशी निवेशकों ने अपने पैसे निकालना भी जारी रखा.
भारतीय बाजार में विदेशी पैसा कब लौटेगा?
बर्नस्टीन का अनुमान है कि अगले 12 महीनों में FII इन्फ्लो फ्लैट या हल्की बढ़त वाला रह सकता है. यानी विदेशी निवेशकों की तरफ से तुरंत बड़े पैमाने पर पैसा भारतीय शेयरों में लगाने की उम्मीद नहीं की जा रही है. रिपोर्ट के मुताबिक, अगर कच्चे तेल की कीमतों में राहत मिलती है, कंपनियों की कमाई बेहतर होती है और अर्थव्यवस्था से जुड़े दूसरे संकेत सुधरते हैं, तो विदेशी निवेश का एक हिस्सा वापस आ सकता है. लेकिन लंबी अवधि में विदेशी निवेश को मजबूती से वापस लाने के लिए सिर्फ बाजार या GDP की तेज रफ्तार काफी नहीं होगी.
इन क्षेत्रों में बड़ी कंपनियां बनाने की जरूरत
बर्नस्टीन ने लंबी अवधि की मजबूत विदेशी पूंजी के लिए कुछ ऐसे क्षेत्रों में वैश्विक स्तर की प्रतिस्पर्धी कंपनियों की जरूरत बताई है, जहां भारत आगे बड़ी भूमिका निभा सकता है. इनमें सेमीकंडक्टर, बैटरी और एनर्जी स्टोरेज, स्पेस, डिफेंस और डीप-टेक जैसे क्षेत्र शामिल हैं. यानी आसान भाषा में समझें तो भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है, लेकिन विदेशी निवेशकों को अब सिर्फ GDP ग्रोथ नहीं, बल्कि रुपये की मजबूती, बाजार की कीमत, कंपनियों की कमाई और भविष्य के कारोबार के मौके भी देखने पड़ रहे हैं.
आजतक बिजनेस डेस्क