भारत में तांबे (Copper) की कीमत अगस्त 2026 में करीब ₹1,400 प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई है. 17 अगस्त को मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज ऑफ इंडिया लि. (MCX) पर कॉपर कॉन्ट्रैक्ट भी लगभग इसी स्तर पर कारोबार कर रहे थे. बाजार में सिर्फ कीमत ही नहीं बढ़ी है, बल्कि तुरंत सप्लाई हासिल करने के लिए खरीदारों को प्रीमियम भी चुकाना पड़ रहा है.
कॉपर की कीमतों में तेजी के पीछे ग्लोबल डिमांड और सप्लाई के बीच बढ़ता अंतर बड़ी वजह माना जा रहा है. पावर ग्रिड, इलेक्ट्रिक व्हीकल, रिन्यूएबल एनर्जी और डेटा सेंटर जैसे सेक्टर में कॉपर की जरूरत तेजी से बढ़ रही है. इसी वजह से लंदन मेटल एक्सचेंज (LME) पर भी कॉपर की कीमतें रिकॉर्ड स्तरों के करीब बनी हुई हैं. इलेक्ट्रिफिकेशन में इसकी अहम भूमिका के कारण कॉपर को अब एनर्जी ट्रांजिशन का 'नया तेल' तक कहा जा रहा है.
कॉपर की सप्लाई बढ़ाना आसान नहीं
कॉपर की बढ़ती मांग के मुकाबले सप्लाई बढ़ाना एक बड़ी चुनौती है. नई कॉपर माइन शुरू करने की प्रक्रिया लंबी और महंगी होती है. उपयोगी भंडार की पहचान, सरकारी मंजूरियां, माइन का विकास और बाजार तक जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने में कई साल लग सकते हैं. इसके अलावा, कई पुरानी माइंस में अयस्क (Ore) की गुणवत्ता लगातार कम हो रही है. ऑपरेशनल दिक्कतों और बढ़ती उत्पादन लागत ने भी कॉपर सप्लाई पर दबाव बढ़ाया है.
2040 तक 50% बढ़ सकती है मांग
S&P Global के अनुमान के मुताबिक, दुनिया में कॉपर की मांग 2025 में करीब 28 मिलियन टन से बढ़कर 2040 तक 42 मिलियन टन हो सकती है. यानी इस दौरान मांग में करीब 50% की बढ़ोतरी का अनुमान है. इलेक्ट्रिफिकेशन, रिन्यूएबल एनर्जी, इलेक्ट्रिक व्हीकल और AI से जुड़े डेटा सेंटर इस बढ़ती मांग के प्रमुख कारण हैं. इन सभी क्षेत्रों में बिजली के उत्पादन, ट्रांसमिशन और इस्तेमाल के लिए बड़ी मात्रा में कॉपर की जरूरत पड़ती है.
कॉपर कंसन्ट्रेट की कमी क्यों अहम?
कॉपर कंसन्ट्रेट की कमी मौजूदा सप्लाई दबाव की अहम तस्वीर दिखाती है. कंसन्ट्रेट को प्रोसेस करके रिफाइंड कॉपर तैयार किया जाता है. जब कंसन्ट्रेट की उपलब्धता कम होती है, तो स्मेल्टर सीमित सप्लाई के लिए आपस में प्रतिस्पर्धा करते हैं. इससे उनकी लागत बढ़ती है और मार्जिन पर दबाव आता है. दूसरी तरफ, किसी मैन्युफैक्चरर के लिए ऊंचा प्रीमियम देकर कॉपर खरीदना कई बार उत्पादन रोकने से कम महंगा पड़ सकता है. यही वजह है कि बाजार में तुरंत डिलीवरी के लिए प्रीमियम देने की स्थिति बन रही है.
LME कीमत और प्रीमियम में फर्क समझिए
कॉपर की ग्लोबल कीमत समझने के लिए London Metal Exchange यानी LME का भाव अहम माना जाता है. हालांकि, किसी खरीदार की वास्तविक लागत सिर्फ LME कीमत से तय नहीं होती. केबल निर्माता, ट्रांसफॉर्मर कंपनियां और दूसरे औद्योगिक खरीदारों को अपनी जरूरत के मुताबिक कॉपर की फिजिकल सप्लाई हासिल करनी होती है.
LME कीमत जहां कॉपर की ग्लोबल वैल्यू का संकेत देती है, वहीं उसके ऊपर दिया जाने वाला प्रीमियम यह बताता है कि धातु को जरूरत की जगह तक पहुंचाने के लिए बाजार में कितना अतिरिक्त भुगतान करना पड़ रहा है. भारत में रिफाइंड कॉपर का घरेलू उत्पादन मांग की तुलना में कम है. ऐसे में आयात पर निर्भर खरीदार ग्लोबल सप्लाई संकट, शिपिंग में रुकावट और अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उतार-चढ़ाव से ज्यादा प्रभावित होते हैं.
भारत में कॉपर की मांग कहां से आती है?
ICAI के आंकड़ों के मुताबिक, FY25 में भारत की कॉपर मांग 9.3% बढ़कर 1.878 मिलियन टन हो गई। इसमें बिल्डिंग और कंस्ट्रक्शन सबसे बड़ा मांग वाला सेक्टर रहा, जिसकी हिस्सेदारी करीब 25% थी. इसके बाद इंडस्ट्रियल एप्लिकेशन की हिस्सेदारी 19% और इंफ्रास्ट्रक्चर की 17% रही. इससे पता चलता है कि भारत में कॉपर की मांग का बड़ा हिस्सा अभी भी पारंपरिक उद्योगों से आता है.
नए सेक्टर में तेजी से बढ़ रही खपत
हालांकि, कॉपर की मांग के नए स्रोत तेजी से उभर रहे हैं. सोलर और विंड पावर, इलेक्ट्रिक व्हीकल, बैटरी स्टोरेज और इलेक्ट्रोलाइजर्स जैसे क्षेत्रों में FY25 के दौरान कॉपर की खपत 32% बढ़ी. फिर भी ICAI के आंकड़ों के अनुसार, कुल कॉपर मांग में इन नई तकनीकों की हिस्सेदारी अभी सिर्फ 4.6% है. यानी फिलहाल पारंपरिक सेक्टर सबसे बड़े खरीदार हैं, लेकिन एनर्जी ट्रांजिशन से जुड़े सेक्टर भविष्य में मांग बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं.
भारत के लिए क्यों अहम है कॉपर का बढ़ता भाव?
कॉपर की कीमतों में तेजी का असर सिर्फ मेटल ट्रेडर्स तक सीमित नहीं है. केबल, ट्रांसफॉर्मर और इलेक्ट्रिकल उपकरण बनाने वाली कंपनियों की लागत भी इससे प्रभावित होती है. खासकर उन कंपनियों के लिए दबाव ज्यादा हो सकता है, जिन्हें तुरंत कॉपर खरीदने के लिए अतिरिक्त प्रीमियम देना पड़ता है. भारत की आयात निर्भरता इस जोखिम को और बढ़ाती है. ग्लोबल सप्लाई में कमी, शिपिंग व्यवधान या अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव का सीधा असर घरेलू खरीदारों की लागत पर पड़ सकता है.
कॉपर की कहानी में सबसे बड़ा सवाल यही है कि बढ़ती ग्लोबल मांग के मुकाबले सप्लाई कितनी तेजी से बढ़ाई जा सकती है. अगर नई माइन और उत्पादन क्षमता मांग की रफ्तार से पीछे रहती है, तो कीमतों पर दबाव बना रह सकता है. भारत के लिए यह मुद्दा और महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश में बिजली की मांग भी तेजी से बढ़ रही है. मई 2026 में भारत की बिजली मांग रिकॉर्ड 270.8 GW के पीक तक पहुंच चुकी है. ऐसे में आने वाले वर्षों में इलेक्ट्रिफिकेशन, रिन्यूएबल एनर्जी, इलेक्ट्रिक व्हीकल और इंफ्रास्ट्रक्चर के विस्तार के साथ कॉपर की मांग बढ़ने की संभावना है.
आजतक बिजनेस डेस्क