हवाई सफर पर महंगे ईंधन की मार! एयरलाइंस ने सरकार से की इस पुरानी योजना की वापसी की मांग

महंगे हवाई ईंधन ने भारतीय एयरलाइंस की मुश्किल बढ़ा दी है. हालात ऐसे हैं कि कंपनियां विमान बढ़ाने के बावजूद उड़ानों की संख्या घटा रही हैं. स्टार एयर ने गर्मियों के मुकाबले सर्दियों के शेड्यूल में 16 उड़ानें कम कर दी हैं. अब एयरलाइंस सरकार से एटीएफ प्राइस स्टेबिलाइजेशन फंड दोबारा शुरू करने की मांग कर रही हैं.

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महंगे जेट फ्यूल ने भारतीय एयरलाइंस की मुश्किलें बढ़ाईं. (File Photo) महंगे जेट फ्यूल ने भारतीय एयरलाइंस की मुश्किलें बढ़ाईं. (File Photo)

अमित भारद्वाज

  • नई दिल्ली,
  • 05 नवंबर 2026,
  • अपडेटेड 11:34 AM IST

हवाई सफर की मांग बढ़ रही है और एयरलाइंस अपने बेड़े में नए विमान भी जोड़ रही हैं, लेकिन महंगे हवाई ईंधन ने कंपनियों की मुश्किल बढ़ा दी है. हालात ऐसे हैं कि विमान और क्षमता बढ़ने के बावजूद कुछ एयरलाइंस अपनी उड़ानों की संख्या घटाने को मजबूर हैं. देश की बड़ी रीजनल एयरलाइंस में शामिल 'स्टार एयर' (Star Air) ने गर्मियों के शेड्यूल में रोजाना 68 उड़ानें चलाई थीं, लेकिन सर्दियों के शेड्यूल में इनकी संख्या घटाकर 52 कर दी है.

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कंपनी ने इसके पीछे जेट ईंधन यानी एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) की ऊंची कीमतों को वजह बताया है. ईंधन महंगा होने से अतिरिक्त उड़ानें चलाना एयरलाइंस के लिए आर्थिक रूप से मुश्किल हो गया है. इसी दबाव के बीच एयरलाइंस ने नागरिक उड्डयन मंत्रालय से एटीएफ की कीमतों को स्थिर रखने वाली योजना दोबारा शुरू करने की मांग की है. कंपनियों का कहना है कि अगर सरकार पुरानी योजना को कुछ बदलावों के साथ वापस लाती है, तो उन्हें राहत मिल सकती है.

ATF की कीमत ₹105 से ₹137 प्रति लीटर

एयरलाइंस की परेशानी की बड़ी वजह हवाई ईंधन की कीमतों में तेज उछाल है. भारत में एटीएफ की कीमत मार्च 2026 में करीब ₹105 प्रति लीटर थी, जो अप्रैल में बढ़कर लगभग ₹207 प्रति लीटर तक पहुंच गई. जून में जब सरकार ने कीमतों को स्थिर रखने के लिए योजना को मंजूरी दी, तब एटीएफ करीब ₹115 प्रति लीटर था. अक्टूबर में इसकी कीमत लगभग ₹137 प्रति लीटर रही. भले ही अप्रैल के मुकाबले कीमतों में कमी आई हो, लेकिन ईंधन अब भी एयरलाइंस के लिए बड़ा खर्च बना हुआ है. इंडस्ट्री से जुड़े लोगों के मुताबिक, ज्यादा उड़ानें चलाने का मतलब अब ज्यादा कमाई के बजाय कई बार ज्यादा पैसा खर्च करना हो गया है. यही वजह है कि रीजनल ही नहीं, बड़ी एयरलाइंस भी अपने फ्लाइट ऑपरेशन पर दोबारा विचार कर रही हैं.

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क्यों बढ़ा एयरलाइंस पर दबाव?

ईंधन की बढ़ती कीमतों के साथ अंतरराष्ट्रीय हालात ने भी एयरलाइंस की परेशानी बढ़ाई है. मध्य पूर्व में भू-राजनीतिक तनाव के कारण हवाई मार्गों पर पाबंदियां और ऑपरेशन से जुड़ी चुनौतियां सामने आई हैं. एअर इंडिया और इंडिगो पहले से ही पाकिस्तानी हवाई क्षेत्र के इस्तेमाल पर लगी पाबंदियों का असर झेल रही हैं. दिल्ली में आयोजित एविएशन इंडिया इवेंट में एअर इंडिया के सीईओ टेवोल्ड गेब्रेमारियम ने भी इस मुद्दे को उठाया. उनका कहना है कि अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धियों को इस तरह की हवाई क्षेत्र संबंधी चुनौतियों का सामना नहीं करना पड़ रहा है. ऐसे में भारतीय एयरलाइंस को अतिरिक्त परिचालन दबाव झेलना पड़ रहा है.

क्या है ATF प्राइस स्टेबिलाइजेशन फंड?

एटीएफ की कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव से एयरलाइंस को राहत देने के लिए केंद्र सरकार ने जून 2026 में एक योजना को मंजूरी दी थी. इसके तहत केंद्रीय कैबिनेट ने ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) को ₹10,000 करोड़ तक की एकमुश्त बजटीय मदद देने का फैसला किया था. इस योजना का मकसद भारतीय एयरलाइंस को घरेलू और अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए एटीएफ की कीमतों में अचानक होने वाली बढ़ोतरी से बचाना था. इसे एटीएफ प्राइस स्टेबिलाइजेशन फंड (PSF) के तौर पर पेश किया गया था. हालांकि, एयरलाइंस की ओर से इसमें दिलचस्पी नहीं दिखाए जाने के कारण इसे मंजूरी मिलने के करीब एक महीने बाद ही बंद कर दिया गया.

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पुरानी योजना की शर्तों से पीछे हटीं एयरलाइंस

एयरलाइन अधिकारियों का कहना है कि पहले प्रस्ताव में कुछ ऐसी शर्तें थीं, जिनकी वजह से कंपनियां इस योजना में शामिल होने से हिचक रही थीं. एक वरिष्ठ एयरलाइन अधिकारी ने आजतक को बताया कि कंपनियों को एक तय ऑयल मार्केटिंग कंपनी से ही ईंधन खरीदने की शर्त मंजूर नहीं थी. इसके अलावा, योजना में शामिल होने के लिए तुरंत समझौता ज्ञापन (MoU) करने और पहले से किए गए पुराने समझौतों को खत्म करने की बात भी कही गई थी. अधिकारी के मुताबिक, उस समय कंपनियों ने नहीं सोचा था कि एटीएफ की कीमतें इतनी ज्यादा बढ़ सकती हैं. अब हालात बदल चुके हैं. इसलिए अगर सरकार पुरानी योजना की शर्तों में बदलाव करके इसे दोबारा लाती है, तो एयरलाइंस इसमें शामिल होने पर विचार कर सकती हैं.

रीजनल एयरलाइंस को खास राहत देने की मांग

रीजनल एयरलाइंस चाहती हैं कि सरकार योजना को दोबारा शुरू करते समय उनके काम और नेटवर्क को भी ध्यान में रखे. एक रीजनल एयरलाइन के प्रतिनिधि के मुताबिक, देश के चार से रीजनल ऑपरेटर मिलकर कुल एटीएफ खपत का करीब 3 फीसदी इस्तेमाल करते हैं, लेकिन वे देश के 30 से 35 फीसदी ऐसे रूट पर उड़ानें चलाते हैं, जहां दूसरी एयरलाइंस जाने में दिलचस्पी नहीं दिखातीं. इन कंपनियों का कहना है कि वे छोटे शहरों और ऐसे इलाकों को हवाई संपर्क से जोड़ने में अहम भूमिका निभाती हैं, जहां बड़े ऑपरेटरों के लिए उड़ान चलाना फायदे का सौदा नहीं होता. इसलिए सरकार को प्राइस स्टेबिलाइजेशन फंड में रीजनल एयरलाइंस के लिए कुछ अनुकूल शर्तों पर विचार करना चाहिए.

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हालांकि, सभी रीजनल कंपनियां विशेष रियायत की मांग नहीं कर रही हैं. एक अन्य वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि उन्हें किसी खास सुविधा की जरूरत नहीं है, लेकिन महंगे जेट ईंधन को देखते हुए सरकार इस योजना को फिर शुरू कर दे तो यह पूरे उद्योग के लिए राहत की बात होगी. फिलहाल एयरलाइंस अपने खर्च और उड़ानों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही हैं. अगर ईंधन महंगा बना रहता है, तो कंपनियां कुछ रूट पर उड़ानों की संख्या घटा सकती हैं या नए रूट शुरू करने की योजना टाल सकती हैं. इसका असर खासकर छोटे शहरों के यात्रियों पर पड़ सकता है, जहां रीजनल एयरलाइंस हवाई संपर्क का अहम साधन हैं.

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