पंचायत बिहार आजतक के "युवा बिहारी स्टार्टअप के खिलाड़ी" सत्र में बिहार के चार युवा उद्यमियों ने अपनी सफलता की कहानी साझा की. इस सत्र को श्वेता सिंह ने होस्ट किया. मंच पर मौजूद रहे कैफे कारोबारी मनीष काबरा, डॉक्टर से कवयित्री और अब अभिनेत्री बनी डॉ. तिष्या श्री, निर्माण क्षेत्र के उद्यमी केशव वर्मा और आर्टेमिस पिंक ज्वेलरी की संस्थापक साक्षी केशरी ने बताया कि कैसे उन्होंने बिहार में रहकर या बिहार के नाम पर बड़े सपने पूरे किए. इस मौके पर डॉ. तिष्या श्री ने बिहार की बेटियों को समर्पित अपनी लिखी कविता भी सुनाई.
सेशन की शुरुआत मनीष काबरा से हुई, जिन्होंने बताया कि उनके कैफे कारोबार ने अभी एक दशक पूरा किया है. उन्होंने बताया कि दस साल पहले जब वे किसी ब्रांड को पटना में अपना कारोबार खोलने के लिए मनाने जाते थे, तो ब्रांड यह कहकर मना कर देते थे कि पटना इसके लिए तैयार नहीं है. मनीष ने सिर्फ 200 वर्ग फीट के कैफे और चार कुर्सियों से अपनी दुकान शुरू की थी. आज उनका कारोबार हर साल तेरह लाख लोगों तक पहुंचता है और उनके मुताबिक भारत में उनकी कंपनी की दूसरी सबसे बड़ी उपस्थिति पटना में ही है. उन्होंने युवाओं से कहा कि किसी मंच का इंतजार करने के बजाय खुद मंच बनाना चाहिए. मनीष ने यह भी कहा कि आज के युवाओं ने चीजों को देखने का तरीका बदल दिया है, जैसे धोबी की दुकान को लॉन्ड्री कहना, नाई की दुकान को सैलून कहना और चाय की दुकान को कैफेटेरिया कहना. उन्होंने बिहारी होने पर गर्व जताया.
इसके बाद डॉ. तिष्या श्री ने अपनी कहानी बताई. वे पेशे से एमबीबीएस डॉक्टर हैं और मेडिकल की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने भोजपुरी फिल्मों के कुछ शुरुआती ऑफर ठुकरा दिए थे. बाद में वे कविता लेखन की तरफ मुड़ीं और हिंदी में कवयित्री तथा अंग्रेजी में लेखिका के तौर पर पहचान बनाई. उनकी तीन किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं. उन्होंने मंच पर बिहार की बेटियों को समर्पित अपनी एक कविता के कुछ हिस्से गाकर सुनाए, जिसका शीर्षक कुछ इस भाव का है कि "मैं हूं बेटी बिहार की". उन्होंने बताया कि इस गीत का लोकार्पण एक साल पहले हुआ था और इसे बिहार विधानसभा में तब के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने लोकार्पित किया था. डॉ. तिष्या ने यह भी बताया कि उन्हें अचानक घर बैठे एक फिल्म का ऑफर मिला, जिसके लिए उन्होंने कभी ऑडिशन नहीं दिया था और पहले उन्हें यह ऑफर मजाक जैसा लगा था. उनकी नई फिल्म आने वाले समय में रिलीज होगी.
तीसरे मेहमान केशव वर्मा ने बताया कि उनके पिता ने पंद्रह साल पहले सातवां ग्रुप नाम की कंपनी शुरू की थी और शुरुआत में सिर्फ चार कट्ठे जमीन पर एक अकेली इमारत बनाई थी. केशव ने इंग्लैंड से कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई की और पढ़ाई पूरी करने के बाद बिहार लौट आए. उन्होंने बताया कि परिवार की इच्छा के साथ उनकी खुद की भी यही चाहत थी कि वे बिहार वापस आकर यहां काम करें. अभी उनकी कंपनी इस क्षेत्र का सबसे बड़ा मॉल बना रही है. उनका लक्ष्य अपनी कंपनी को इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में पूरे भारत में सबसे बेहतर बनाना है.
आखिर में साक्षी केशरी ने अपनी कंपनी आर्टेमिस पिंक के बारे में बताया, जो प्राकृतिक हीरों से बनी लग्जरी ज्वेलरी बनाती और गल्फ देशों में निर्यात करती है. साक्षी की पूरी पढ़ाई पंद्रह साल तक पटना में ही हुई. उन्होंने हाल ही में पटना में अपने ज्वेलरी की एक प्रदर्शनी लगाई थी, जिसे लोगों से मिली सराहना उनकी उम्मीद से कहीं ज्यादा थी. साक्षी चाहती हैं कि जो ज्वेलरी बनाने की फैक्ट्रियां अभी सूरत और मुंबई में हैं, वे बिहार में भी लगें. उन्होंने यह भी बताया कि बिहार के ओबरा नाम की जगह पर कालीन बनाए जाते हैं, जो कई लोगों को पता नहीं है, और ऐसी बातें तभी सामने आएंगी जब लोग उन्हें बाहर लाएंगे.
सत्र की चर्चा मनीष काबरा से शुरू हुई. उन्होंने कहा कि बिहारी होने की सबसे बड़ी खासियत यही है कि संघर्ष करना बचपन से ही आ जाता है. उनके मुताबिक यह ईश्वर की तरफ से मिली हुई खूबी है और कोई भी बिहारी संघर्ष से घबराता नहीं है. मनीष ने कहा कि जन्म कहां और किस हालत में होगा, यह किसी के हाथ में नहीं होता, लेकिन अपनी किस्मत और हालात बदलना अपने हाथ में होता है. उन्होंने साफ कहा कि वे किसी बड़ी विरासत या पहचान की वजह से इस मंच पर नहीं आए, बल्कि लोग उन्हें उनके काम और मेहनत से जानते हैं.
मनीष ने अपने सपने के बारे में बताया कि जैसे बनारस का पान और आगरा का पेठा मशहूर है, वैसे ही वे चाहते हैं कि पटना पहुंचने वाला हर व्यक्ति उनकी बनाई कॉफी जरूर पिए. उन्होंने एक कर्मचारी की कहानी सुनाई, जो हाजीपुर का रहने वाला है और जिसका नाम टीटू है. टीटू ग्यारह साल पहले हाउसकीपिंग की नौकरी से जुड़ा था और आज बिहार का सबसे बेहतरीन ब्रू मास्टर बन गया है. मनीष ने बताया कि टीटू ने साल के 365 दिनों में मुश्किल से चार पांच दिन ही छुट्टी ली है और उन्हें उस पर गर्व है. उन्होंने आयोजकों का धन्यवाद किया कि उन्हें युवाओं के साथ बात करने के लिए इतना बड़ा मंच मिला.
इसके बाद डॉ. तिष्या श्री ने कहा कि बिहार के बारे में दुनिया को बताना एक अलग तरह की जिम्मेदारी है. उन्होंने बताया कि बचपन में उन्हें यह बात अच्छी नहीं लगती थी कि उन्हें बार बार समझाना पड़े कि चाणक्य की कर्मभूमि और भगवान बुद्ध का ज्ञान बिहार से जुड़ा है, लेकिन बाद में उन्हें समझ आया कि यह बताना जरूरी है क्योंकि इससे लोग बिहार से जुड़ाव महसूस करते हैं. उन्होंने शत्रुघ्न सिन्हा और बिहार से आए अन्य कलाकारों का उल्लेख करते हुए कहा कि इसे एक तरह की सॉफ्ट पावर डिप्लोमेसी कहा जा सकता है. डॉ. तिष्या ने बताया कि वे जहां भी परफॉर्म करती हैं, अमेरिका हो या मुंबई, वे गर्व से बिहार की बात करती हैं.
उन्होंने अपनी लिखी कुछ पंक्तियां भी सुनाईं, जिनमें कहा गया है कि कभी दिनकर, कभी मांझी, कभी ठाकुर भिखारी के रूप में बिहार की पहचान रही है और यह चिंगारी कभी नहीं बुझ सकती. डॉ. तिष्या ने बताया कि बाहर निकलने पर बिहारी होने के कारण कई बार उन्हें और उनके दोस्तों को चिढ़ाया जाता था, जिस वजह से कुछ लोग अपना परिचय दिल्ली या मुंबई का बताने लगे थे. उन्होंने कहा कि आज भी कुछ लोग बिहार को देश के पिछड़ेपन की वजह मानते हैं, जिसके जवाब में उन्होंने कई उदाहरण गिनाए, जैसे आर्यभट्ट का शून्य, नालंदा विश्वविद्यालय का ज्ञान, मिथिला की धरती पर मां सीता का जन्म, दिनकर और विद्यापति का साहित्य, जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति, राजेंद्र प्रसाद की उपलब्धियां, चंपारण से शुरू हुआ स्वतंत्रता आंदोलन और वैशाली से जुड़ी लोकतंत्र की परंपरा. उन्होंने कहा कि बिहार के बिना भारत का इतिहास और भूगोल दोनों अधूरे हैं.
केशव वर्मा ने कहा कि सरकार व्यवसायियों के लिए कई नई नीतियां ला रही है, लेकिन प्रशासनिक व्यवस्था को इन नीतियों को पूरी तरह अपनाने में अभी वक्त लग रहा है. उन्होंने बताया कि इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में किसी भी मंजूरी के लिए अब भी देरी होती है, हालांकि ईज ऑफ डूइंग बिजनेस को लेकर हाल के वर्षों में सुधार हुआ है.
साक्षी केशरी ने कहा कि बिहार में पिछले दस साल में बुनियादी ढांचे के मामले में बड़ा बदलाव आया है. उन्होंने बताया कि उनकी पीढ़ी के लोग पढ़ाई के लिए बाहर जाते हैं, लेकिन वापस लौटकर बिहार के लिए कुछ करना चाहते हैं. उन्होंने कहा कि कोई भी व्यक्ति अकेले ताकतवर नहीं होता, इसलिए टीम बनाकर आगे बढ़ना जरूरी है.
चर्चा के अंत में डॉ. तिष्या श्री ने बिजनेसमैन और उद्यमी के बीच फर्क समझाया. उनके मुताबिक उद्यमी वह होता है जो नया विचार लेकर आता है, जबकि बिजनेसमैन उस विचार को आगे बढ़ाने का काम करता है. उन्होंने बताया कि सरकार स्टार्टअप को दस लाख रुपए तक का बिना ब्याज कर्ज दे रही है और बिहार में अभी 1761 रजिस्टर्ड स्टार्टअप हैं, जिनमें से 253 महिलाओं द्वारा शुरू किए गए हैं. उन्होंने कहा कि यह संख्या कम है लेकिन एक अच्छी शुरुआत है.
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