छोटा कार्यकाल, बड़ी पहचान: बेबाक बयान और सक्रिय शैली से चर्चा में रहे आरिफ मोहम्मद खान

बिहार के पूर्व राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान का कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी पटना के राजनीतिक और शैक्षणिक हलकों में उनकी कार्यशैली पर चर्चा जारी है. करीब 428 दिनों के कार्यकाल में उन्होंने राजभवन को एक सक्रिय मंच बनाने की कोशिश की.

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 428 दिनों का कार्यकाल लेकिन गहरी छाप - बिहार में चर्चा का विषय बने पूर्व राज्यपाल (Photo: ITG) 428 दिनों का कार्यकाल लेकिन गहरी छाप - बिहार में चर्चा का विषय बने पूर्व राज्यपाल (Photo: ITG)

रोहित कुमार सिंह

  • पटना,
  • 13 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 9:36 PM IST

बिहार के पूर्व राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान के पटना से जाने के बाद राजधानी के राजनीतिक, शैक्षणिक और प्रशासनिक हलकों में उनके कार्यकाल को लेकर चर्चा जारी है. उम्मीद से कम समय तक राज्यपाल के पद पर रहने के बावजूद उन्होंने अपनी सक्रिय कार्यशैली, सार्वजनिक कार्यक्रमों में लगातार भागीदारी और विश्वविद्यालयों से जुड़े मुद्दों पर बेबाक टिप्पणियों के कारण एक अलग पहचान बनाई.

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जनवरी 2025 में बिहार के राज्यपाल के रूप में पदभार संभालने वाले आरिफ मोहम्मद खान का कार्यकाल मार्च 2026 में समाप्त हुआ, जब केंद्र सरकार ने सेवानिवृत्त सेना अधिकारी सैय्यद अता हसनैन को राज्य का नया राज्यपाल नियुक्त किया. लगभग 428 दिनों के कार्यकाल में खान ने राजभवन को एक सक्रिय और सार्वजनिक रूप से दिखाई देने वाला संस्थान बनाने की कोशिश की.

सार्वजनिक जीवन में सक्रिय भूमिका

आरिफ मोहम्मद खान की कार्यशैली पारंपरिक रूप से शांत और औपचारिक माने जाने वाले राज्यपाल पद से कुछ अलग रही. वे लगातार शैक्षणिक संस्थानों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और सामाजिक आयोजनों में भाग लेते रहे.

पटना और राज्य के अन्य शहरों में आयोजित सेमिनार, दीक्षांत समारोह, पुस्तक विमोचन और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में उनकी मौजूदगी अक्सर चर्चा का विषय बनती थी. इन कार्यक्रमों में वे छात्रों, शिक्षकों और बुद्धिजीवियों से खुलकर संवाद करते थे.

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उनके भाषणों की एक खास पहचान यह भी थी कि वे अक्सर भारतीय दर्शन, सांस्कृतिक परंपरा, संविधान और सामाजिक समरसता जैसे विषयों पर विस्तार से बात करते थे. कई अकादमिक मंचों पर उनकी उपस्थिति को एक बौद्धिक विमर्श के रूप में देखा गया.

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विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति के रूप में सक्रियता

बिहार के राज्यपाल के रूप में आरिफ मोहम्मद खान राज्य के विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति भी थे. इस भूमिका में उन्होंने उच्च शिक्षा व्यवस्था से जुड़े कई मुद्दों पर सक्रिय हस्तक्षेप किया.

उन्होंने कई विश्वविद्यालयों का दौरा किया और शिक्षकों तथा छात्रों के साथ बैठकें कीं. कई बार उन्होंने विश्वविद्यालय प्रशासन को अनुशासन, शैक्षणिक कैलेंडर और कैंपस वातावरण सुधारने को लेकर कड़े निर्देश भी दिए.

विशेष रूप से पटना विश्वविद्यालय के कार्यक्रमों और दौरों के दौरान उन्होंने छात्रों से सीधे संवाद किया. कई मौकों पर उन्होंने छात्रों से यह भी कहा कि यदि विश्वविद्यालय प्रशासन उनकी समस्याओं का समाधान नहीं करता, तो वे सीधे राजभवन से संपर्क कर सकते हैं.

इस सक्रियता को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आईं. कुछ शिक्षकों और छात्रों ने इसे सकारात्मक पहल बताते हुए कहा कि इससे विश्वविद्यालय प्रशासन पर जवाबदेही बढ़ी, जबकि कुछ लोगों का मानना था कि राज्यपाल का कार्यालय विश्वविद्यालय प्रशासन में अत्यधिक हस्तक्षेप कर रहा है.

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विश्वविद्यालयों में अराजकता पर कड़ी टिप्पणी

अपने कार्यकाल के दौरान आरिफ मोहम्मद खान ने विश्वविद्यालय परिसरों में बढ़ती अराजकता और हिंसक घटनाओं को लेकर कई बार चिंता जताई.

पटना विश्वविद्यालय से संबद्ध B.N. कॉलेज में हुई हिंसक घटना के बाद उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा था कि विश्वविद्यालयों में आपराधिक तत्वों का प्रभाव बढ़ना बेहद चिंताजनक है.

उनकी इस टिप्पणी ने शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक व्यापक बहस को जन्म दिया था. कुछ लोगों ने इसे बिहार के उच्च शिक्षा सिस्टम की वास्तविक समस्याओं को उजागर करने की कोशिश बताया, जबकि कुछ शिक्षाविदों ने इसे विश्वविद्यालयों की छवि के लिए नुकसानदायक बताया.

राजनीतिक हलकों से संवाद

अपने कार्यकाल के दौरान आरिफ मोहम्मद खान ने बिहार के विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं से संवाद बनाए रखा था. राजभवन में आयोजित कार्यक्रमों में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के नेता शामिल होते रहे थे.

अपने कार्यकाल की शुरुआत में उनकी राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव से मुलाकात भी चर्चा में रही. कुछ राजनीतिक हलकों में इस मुलाकात को लेकर सवाल उठे, लेकिन खान ने स्पष्ट किया कि वरिष्ठ राजनीतिक नेताओं से मिलना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है.

हिजाब-नकाब विवाद में बयान

दिसंबर 2025 में एक कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा एक महिला डॉक्टर का नकाब हटाने की घटना पर राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया था.

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इस मामले में आरिफ मोहम्मद खान ने मुख्यमंत्री का बचाव करते हुए कहा था कि नीतीश कुमार छात्राओं को अपनी बेटियों की तरह मानते हैं और इस घटना को अनावश्यक रूप से राजनीतिक रंग दिया जा रहा है.

हालांकि, उनके इस बयान के बाद विपक्षी दलों ने राज्यपाल की भूमिका को लेकर सवाल उठाए और इसे राजनीतिक विवाद में हस्तक्षेप बताया.

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छोटा कार्यकाल लेकिन प्रभावशाली उपस्थिति

लगभग 14 महीनों के अपने कार्यकाल में आरिफ मोहम्मद खान ने कई मुद्दों पर अपनी स्पष्ट राय रखी और कई बार पारंपरिक रूप से सीमित माने जाने वाले राज्यपाल पद को अधिक सक्रिय रूप में प्रस्तुत किया.

समर्थकों का कहना है कि उन्होंने राजभवन को सार्वजनिक विमर्श का एक सक्रिय मंच बनाया, जबकि आलोचकों का मानना है कि उनकी शैली कभी-कभी राज्यपाल की परंपरागत सीमाओं से आगे चली जाती थी.

उनके जाने के बाद पटना के कई राजनीतिक और शैक्षणिक हलकों में यह चर्चा है कि उनकी सक्रियता और बेबाक शैली ने राजभवन को एक अलग पहचान दी थी. राजधानी के सार्वजनिक जीवन में उनकी लगातार मौजूदगी, विश्वविद्यालयों में हस्तक्षेप और बौद्धिक विमर्श में भागीदारी ने उन्हें एक ऐसे राज्यपाल के रूप में स्थापित किया, जिनका कार्यकाल भले ही छोटा रहा हो, लेकिन प्रभाव काफी व्यापक रहा.

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इसी कारण पटना के कई हलकों में यह कहा जा रहा है कि आरिफ मोहम्मद खान ने अपने कार्यकाल के दौरान राज्यपाल के पद को एक नई सक्रियता दी. यही वजह है कि उनके जाने के बाद भी उनकी कार्यशैली को याद किया जा रहा है.

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