Maruti Cars Dispatch By Rail: कार खरीदने के बाद सबसे बड़ा सवाल होता है कि गाड़ी घर तक कब पहुंचेगी. लेकिन गाड़ी बनाने वाली कंपनी के लिए असली सवाल इससे पहले का है. कार फैक्ट्री से निकली तो ग्राहक के शहर तक कैसे पहुंचेगी. सड़क से या रेल से. अब तक तमिलनाडु के पोलाची इलाके के लिए भी यही समस्या थी. लेकिन मारुति ने इसका हल निकाल लिया और कंपनी ने मानेसर से 120 कारों की पहली खेप ट्रेन में लादी और पोलाची टर्मिनट पहुंचा दी. ये देश की पहली कार कंपनी है जिसने रेल के माध्यम से कारों को इस इलाके में पहुंचाया है.
पढ़ने या सुनने में यह सिर्फ 120 कारों की कहानी लगती है, लेकिन इसके पीछे दक्षिण भारत में कारों की सप्लाई का पूरा गणित छिपा है. क्योंकि पोलाची रेलवे जंक्शन पर कारों की यह पहली ऑटोमोबाइल खेप है. सवाल यह है कि जब इस इलाके में कारों की मांग पहले भी थी, तो अब तक कंपनियां यहां सीधे ट्रेन से कारें क्यों नहीं भेज पा रही थीं. और पोलाची में ऐसा क्या बदला कि मारुति सुजुकी ने यहां से रेल-लॉजिस्टिक्स की नई कहानी शुरू कर दी.
एक हफ्ते में पहुंची पहली खेप
मारुति सुजुकी द्वारा जारी बयान में बताया कि, 18 अगस्त 2026 को हरियाणा के मानेसर स्थित अपने प्लांट की रेलवे साइडिंग से 120 कारों की पहली खेप को पोलाची के लिए रवाना किया था. इस खेप में मारुति की वैगनआर, अर्टिगा, डिजायर और सेलेरियो जैसी कारें शामिल थीं. यह रेक तकरीबन एक सप्ताह बाद यानी 25 अगस्त को पोलाची टर्मिनल पहुंचा है.
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बता दें कि, पोलाची रेलवे जंक्शन न केवल मारुति के लिए बल्कि दूसरी कार कंपनियों के लिए भी बेहद अहम है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मार्च 2026 में इस स्टेशन का उद्घाटन किया था. और इस जंक्शन को अमृत भारत स्टेशन योजना के तहत दोबारा डेवलप किया गया है. इस टर्मिनल से जुड़ने के बाद दक्षिण भारत में मारुति सुजुकी का रेल बेस्ड नेटवर्क और बड़ा हो गया है. कंपनी के पास पहले से कोयंबटूर में रेलवे टर्मिनल मौजूद है. अब पोलाची के जुड़ने से दक्षिण भारत के अलग-अलग इलाकों में कारों की सप्लाई करना आसान होगा.
इस डिस्पैच से खास तौर पर केरल में ओणम से पहले बढ़ने वाली कारों की मांग को पूरा करने में मदद मिलने की उम्मीद है. आने वाले समय में पोलाची टर्मिनल से हर साल करीब 70 ऑटोमोबाइल रेक चलाने की योजना है. इनके जरिए हर साल 11,000 से ज्यादा वाहनों को रेल से भेजा जा सकेगा. मारुति सुजुकी ने साल 2014-15 से कारों को रेल के जरिए भेजना शुरू किया था.
रेलवे के जरिए वाहनों को भेजने के कई फायदे हैं. सबसे बड़ा फायदा यह है कि, इससे लॉजिस्टिक्स का खर्च काफी कम हो जाता है. इसके अलावा शहर में बढ़ने वाले ट्रैफिक जाम से भी छुटकारा मिलता है. क्योंकि कारों की खेप को जब सड़क मार्ग से बड़े ट्रकों में एक शहर से दूसरे शहर भेजा जाता है तो इससे बेवजह ट्रैफिक की समस्या पैदा होती है. इतना ही नहीं रेलवे से डिस्पैच करने के चलते इन ट्रकों पर खर्च होने वाला भारी मात्रा में डीजल भी बचता है और साथ ही कार्बन उत्सर्जन को भी कम करने में मदद मिलती है.
रेलवे से भेजी 32 लाख कारें
मारुति सुजुकी का कहना है कि, वित्त वर्ष 2014-15 में कंपनी की कुल डिस्पैच में रेलवे ट्रांसपोर्टेशन की हिस्सेदारी सिर्फ 5 फीसदी थी. अब वित्त वर्ष 2025-26 में यह बढ़कर 26.5 फीसदी हो चुकी है. कंपनी के मुताबिक, अब तक 32 लाख से ज्यादा वाहनों की डिलीवरी रेल के जरिए की जा चुकी है. पोलाची जैसे नए टर्मिनल जुड़ने से कंपनी को ज्यादा कारें कम फ्यूल खपत के साथ लंबी दूरी तक पहुंचाने में मदद मिलेगी. साथ ही दक्षिण भारत में ग्राहकों तक नई कारों को जल्दी और आसानी से पहुंचाया जा सकेगा.
पोलाची टर्मिनल की बड़ी चुनौती
हो सकता है कि, आपके दिमाग में आए कि आखिर अब तक रेलवे के जरिए पोलाची टर्मिनल तक कारें क्यों नहीं पहुंच पा रही थी. सबसे पहली बात तो ये है कि, सिर्फ रेलवे स्टेशन होना काफी नहीं था. कारों को ट्रेन से सुरक्षित तरीके से उतारने, उन्हें ट्रेलर पर चढ़ाने और फिर डीलर नेटवर्क तक भेजने के लिए अलग तरह का टर्मिनल इंफ्रास्ट्रक्चर चाहिए. और पोचाली में ऑटोमोबाइल की बल्क रेल डिस्पैचिंग के लिए जरूरी फेसिलिटी को हाल ही में ऑपरेशनल बनाया गया है.
ऐसा नहीं है कि, इस इलाके में कारों की जरूरत पहले नहीं थी, लेकिन वहां सीधे NMG/MMG जैसे स्पेशल ऑटोमोबाइल रेक से कार उतारने की सुविधा नहीं थी. इससे पहले पोलाची और आसपास के इलाकों के लिए आने वाली कारों को सलेम, इरुगुर या मदुरै जैसे दूसरे रेलवे टर्मिनल पर उतारा जाता था और वहां से ट्रक के जरिए पोलाची भेजा जाता था. यानी रेल से कार को बाजार के काफी करीब लाने के बावजूद आखिरी हिस्से की डिलीवरी सड़क से करनी पड़ती थी.
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बड़े खेप से बड़ा फायदा
एक और दिलचस्प बात ये है कि, यदि रेलवे से भेजी जाने वाली कारों की खेप बड़ी होगी तो फायदा भी बड़ा होगा. पहली रेक की लागत भी यही बताती है कि इस मॉडल का फायदा बड़े वॉल्यूम पर ज्यादा होगा. रेलवे अधिकारियों के अनुसार, 120 कारों वाली रेक का फ्रेट करीब 30 लाख रुपये का था, जबकि 260 कारों की रेक के लिए यह करीब 45 लाख रुपये बताया गया है. यानी ज्यादा कारों को एक साथ भेजने पर ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट काफी घट सकती है.
अश्विन सत्यदेव