ओडिशा के पुरी स्थित जगन्नाथ धाम मंदिर में सोमवार को महास्नान पूर्णिमा का आयोजन किया जा रहा है. ज्येष्ठ पूर्णिमा के इस खास दिन भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा देवी को 108 कलशों में भरे सुगंधित जल से स्नान कराया जाता है. इसीलिए इस दिन को महा स्नान पूर्णिमा कहते हैं.
इस स्नान के बाद भगवान की प्रतिमाओं को सूती-मलमली कपड़ों से पोछा जाता है और फिर बड़ेृ-बड़े कपड़ों में लपेटा जाता है. इस दौरान बड़े-बड़े कपड़ों में लिपटी तीनों दैव प्रतिमाएं हाथीनुमा आकार में नजर आती हैं. भगवान के इस शृंगार को 'गजाबेशा' या गजवेश कहा जाता है. इस स्वरूप में उन्हें गणेश जी के रूप में पूजा जाता है और जगन्नाथ बन जाते हैं गजानन नाथ.
हर साल रथयात्रा निकलने से तकरीबन 2 हफ्ते पहले पुरी के श्रीमंदिर के आंगन में ये अनुष्ठान किया जाता है. इस दिन नील माधव बन जाते हैं 'गजानन माधव' और इसी 'हाथी वेशा' में ही श्रद्धालु उनके दर्शन करते हैं. इस दर्शन के बाद अगले 15 दिनों तक गर्भगृह बंद रहता है और फिर भगवान के दर्शन रथयात्रा के साथ ही होते हैं. लेकिन भगवान जगन्नाथ के इस 'हाथीवेशा' या गणपति रूप धारण करने की वजह क्या है?
पुरी में प्रसिद्ध है गजानन वेश की लोककथा
इसका जवाब पुरी की एक लोककथा में मिलता है. कहते हैं कि 16वीं शताब्दी में महाराष्ट्र के एक गांव में एक मूर्तिकार थे गणपति भट्ट. नाम के अनुसार ही वह गणेश भक्त भी थे. दिन-रात वह गणपति की भक्ति में ही लीन रहते थे और सिर्फ गणपति महाराज की ही प्रतिमा बनाया करते थे. एक समय वह तीर्थ यात्रा पर निकले.
हर ओर की यात्रा के बाद वह पुरी (ओडिशा) पहुंचे. लेकिन यहां भट्ट जी को बहुत निराशा हुई, क्योंकि पुरी में गणेश जी का कोई मंदिर ही नहीं था. ऐसा देखकर वह विचलित हो गए. यह उनकी यात्रा का अंतिम पडाव था और वह इस दौरान अपने ईष्ट गणपति बप्पा के दर्शन करना चाहते थे. वह बप्पा की भक्ति में इतने मग्न थे कि भगवान जगन्नाथ के मंदिर में बिना दर्शन किए ही पुरी की यात्रा छोड़ कर लौटने लगे. इस तरह उनकी चार धाम की यात्रा भी अधूरी हो रही थी. यहां तक कि पुरी में भगवान का महाप्रसाद भी उन्होंने ग्रहण नहीं किया.
वह इसी तरह विचलित होकर लौट रहे थे कि रास्ते में उन्हें एक ब्राह्मण युवक मिला. उस युवक ने भट्ट जी को इस तरह विचलित हुए देखा तो उसकी वजह पूछने लगा. तब गणेश भक्त ने कहा- मैं यहां अपने प्रभु के दर्शन करने आया था, लेकिन यहां तो उनका कोई भी मंदिर नहीं है. अब मैं खुद ही यहां एक मंदिर तराशूंगा. इस पर वह ब्राह्मण जोर-जोर से हंसने लगा. फिर उसने कहा, शुभ काम में देरी क्यों? आप यहीं अभी ही गणेश प्रतिमा का निर्माण करना शुरू कीजिए.
नहीं बन सकी गणपति की प्रतिमा
ब्राह्मण युवक की बात में कुछ ऐसा जादू था कि गणपति भट्ट ने गणेश मूर्ति बनानी शूरू कर दी. वह सबकुछ बनाते हुए जब मूर्ति का चेहरा बनाते तो कभी आंखें गोल हो जातीं, कभी बहुत बड़ी, कभी वह मूर्ति बनाते-बनाते खुद उनके हाथों में बंसी पकड़ा देते थे. वह कई बार कोशिश करके भी जैसी चाहते थे, वैसी प्रतिमा नहीं बना पाते थे.
तब ब्राह्मण युवक ने कहा कि, यहां तो गणपति का कोई मंदिर भी नहीं, आप एककाम करिए, ध्यान लगाइए और उस ध्यान में गणपति जी का स्मरण कीजिए, फिर वह ध्यान में जैसे नजर आएं वैसी प्रतिमा बना लीजिए. गणपति भट्ट को ये विचार अच्छा लगा. उन्होंने ध्यान करना शुरू किया. ध्यान में उन्हें अलग-अलग दृश्य नजर आए.
कभी देखते की एक बड़ा चेहरा दिख रहा है, जो उन्हें ही देखकर मुस्कुरा रहा है. फिर वह देखते कि गणेश जी ही बांसुरी बजाते नजर आ रहे हैं. कभी उन्हें दिखाई दिया कि दो बड़ी-बड़ी गोल आंखें उन्हें ही देखे जा रही हैं. इसके बाद उन्हें पुरी के श्रीमंदिर में स्थापित भगवान जगन्नाथ नजर आए. अब गणपति भट्ट बहुत परेशान हुए, जो उन्होंने देखा था उसका वर्णन वह कर ही नहीं पा रहे थे, मूर्ति बनाना तो दूर की बात थी.
महास्नान के बाद कैसे बनता है 'गणपति वेश'
तब ब्राह्मण युवक ने पूछा कि आप ने श्रीमंदिर में जगन्नाथ जी के दर्शन किए थे? गणपति भट्ट बोले, नहीं... जब मुझे पता चला कि यहां गणेश जी विराजमान ही नहीं हैं तो मैं बाहर से ही लौट आया. तब ब्राह्नण ने कहा, अरे! एक बार देख तो लिए होते, हो सकता है आप के गणेशजी भी वहीं मौजूद हों. चलिए दर्शन करके आते हैं. ब्राह्मण के समझाने पर गणपति भट्ट राजी हो गए और फिर से मंदिर की ओर चले. उस दिन 'अनासरा विधान' से पहले महास्नान हुआ था.
स्नान के बाद महाप्रभु को पोछते हुए चेहरे पर नाक से होते कपड़े को ऐसे लपेटा जाता है कि जैसे वह हाथी की सूंड हो. यही प्रभु जगन्नाथ का गजानन वेश है. जब गणपति भट्ट श्रीमंदिर पहुंचे तो उन्होंने यही दृश्य देखा और खुशी के मारे चिल्ला पड़े मेरे गणेश जी तो यही हैं. यहां मंदिर में विराजमान हैं.
जगन्नाथ प्रभु में उन्हें अपने ईष्ट के दर्शन हो गए. फिर वह जब ब्राह्मण युवक से अपनी खुशी जाहिर करने के लिए मुड़ तो देखा वहां कोई नहीं था, कहते हैं कि अपने सच्चे श्रद्धालु की भक्ति देखकर भगवान जगन्नाथ खुद उनके मन का भ्रम दूर करने आए थे. भगवान जगन्नाथ के गजवेश के दर्शन से आनंद मिलता है और इसके बाद ही वह 15 दिनों तक किसी को दर्शन नहीं देते हैं और एकांत वास में चले जाते हैं.
मान्यता है कि महास्नान के बाद उन्हें ज्वर हो जाता है और दइतापति सेवक उनका उपचार करते हैं. एकांतवास की इस प्रक्रिया को पुरी में 'अनासरा' कहते हैं. इन 15 दिनों में देव विग्रहों के दर्शन नहीं होते हैं. 15 दिनों के बाद जब जगन्नाथ जी ठीक होते हैं तब उस दिन 'नैनासार उत्सव' मनाया जाता है.
इस दिन भगवान का फिर से श्रृंगार किया जाता है, उन्हें नए वस्त्र पहनाए जाते हैं और इसके बाद वह भ्रमण के लिए तैयार होते हैं. तब फिर श्रीमंदिर के सिंहद्वार पर रथ लाए जाते हैं और फिर दो दिन बाद यहां से रथयात्रा प्रारंभ होती है. ये कुछ ऐसा है कि बीमार होने के कारण जब जगन्नाथ जी कई दिनों तक एकांत में होते हैं तो वह मन बदलने के लिए भाई-बहन के साथ यात्रा पर निकलते हैं.
विकास पोरवाल