बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर का गुरुवार को निधन हो गया. गोवा के एक अस्पताल में उन्होंने सुबह 5.20 बजे आखिरी सांस ली, वे 75 वर्ष के थे. उन्होंने न सिर्फ बड़े पर्दे पर अपनी दमदार एक्टिंग के जरिए अलग पहचान बनाई, बल्कि अपने शांत, लगातार किए जाने वाले सामाजिक कार्यों, खासतौर पर भारत के किसानों और जल संकट से जूझते गांवों के लिए दशकों तक सेवा की. सूखाग्रस्त गांवों में किसानों की सुसाइड के मामलों के बीच उन्होंने NAAM फाउंडेशन बनाया और उनकी आवाज बने.
हमेशा उठाते रहे किसानों की आवाज
नाना पाटेकर हमेशा किसानों की आवाज उठाते रहे. आजतक के सहयोगी प्लेटफॉर्म दि लल्लनटॉप को दिए एक पुराने इंटरव्यू को देखें, तो वे किसानों की दयनीय स्थिति, फसलों के नुकसान और किसानों की सुसाइड के मामलों और उनकी मांगों पर बात करते अक्सर भावुक नजर आते थे. किसानों के प्रति उनकी दरियादिली का अंदाजा इस किस्से से ही लगाया जा सकता है, कि वे 1.5 करोड़ रुपये की नई कार खरीदने की तैयारी कर रहे थे, लेकिन इस बीच टीवी पर किसान सुसाइड की खबर देख उन्होंने जुटाई गई रकम को किसानों की मदद के लिए इस्तेमाल किया.
2015 में 'NAAM' की शुरुआत
सूखा, किसानों की सुसाइड और माहाराष्ट्र के गांवों में गहराए जल संकट के बीच मदद के लिए Nana Patekar ने साल 2015 में नाम फाउंडेशन (Naam Foundation) की शुरुआत की. उन्होंने मराठी अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर पुणे में इसकी शुरुआत की और इसका प्रमुख उद्देश्य भीषण सूखे और कर्ज से प्रभावित किसानों को मदद पहुंचाना था. नाम की शुरुआत तब हुई, जब पाटेकर ने 1.5 करोड़ रुपये की लग्जरी कार खरीदने की योजना रद्द कर दी. यही नहीं कार के लिए जुटाई गई इस रकम का इस्तेमाल उन्होंने विदर्भ और मराठवाड़ा जैसे सूखाग्रस्त क्षेत्रों में आत्महत्या करने वाले किसानों के परिवारों की सीधे आर्थिक मदद देने के लिए किया.
77 लाख किसानों का मददगार
बिजनेस टुडे पर छपी एक रिपोर्ट को देखें, तो अपनी स्थापना के बाद से NAAM फाउंडेशन ने 77.17 लाख किसानों का समर्थन किया है. 50,908 परिवारों को आपदा राहत प्रदान की है, जबकि 102 सैन्य शहीदों के परिवारों को आर्थिक सहायता पहुंचाई है. इसके अलावा नाना पाटेकर द्वारा शुरू किए गए इस फाउंडेशन ने 4,957 विधवाओं को भी मदद दी. अपनी शुरुआत के दौरान संस्था ने किसानों की विधवाओं और परिवारों को 15,000-25,000 रुपये के चेक प्रदान किए.
दिवंगत एक्टर नाना पाटेकर ने न सिर्फ पैसों से मदद की, बल्कि महिलाओं को रेग्युलर इनकम के वैकल्पिक साधन मुहैया कराने में भी आगे रहे. नाम फाउंडेशन के जरिए महिलाओं के लिए सिलाई मशीनें, आटा चक्की और बकरियां दी गईं. किसानों के बच्चों के लिए शिक्षा, भोजन और आवास की व्यवस्था की गई, तो वहीं वंचित दंपतियों के लिए सामूहिक विवाह समारोह भी आयोजित कराए गए.
'NAAM' की वेबसाइट पर इसका उद्देश्य
नाम फाउंडेशन की वेबसाइट देखें, तो इसकी टैगलाइन में संस्था का उद्देश्य झलकता है, जो 'देश को भोजन उपलब्ध कराने वाले हाथों की सहायता करना' है. नाना पाटेकर और मकरंद अनासपुरे ने नाम फाउंडेशन को एक औपचारिक एनजीओ के रूप में रजिस्टर्ड कराया, जिससे इसकी पहुंच महाराष्ट्र के सबसे सूखाग्रस्त क्षेत्रों में से दो मराठवाड़ा और विदर्भ तक हो.
इसके जरिए, वृक्षारोपण, किसान प्रशिक्षण, सामूहिक खेती, महिलाओं के लिए सिलाई केंद्र, नदी पुनर्जीवन और प्रभावित परिवारों के लिए घरों के निर्माण जैसे काम किए गए और खास बात ये है कि ये सब काम बिना किसी प्रचार-प्रसार के किए गए. जिस प्रमुख मुद्दों को इसके जरिए कवर किया गया, उनमें गांवों का तेजी से पतन, किसानों की बढ़ती आत्महत्याएं और लगातार जल संकट सबसे ऊपर थे.
आजतक बिजनेस डेस्क