घर में लगे पौधे समय के साथ बड़े होते जाते हैं और उनकी जड़ें भी फैलने लगती हैं. कई बार पौधे की धीमी ग्रोथ, पत्तियों का पीला पड़ना या बार-बार पानी की जरूरत पड़ना इस बात का संकेत होता है कि अब उसे ज्यादा जगह की जरूरत है. अगर पौधे की जड़ें गमले में पूरी तरह भर जाएं तो उसे रूट बाउंड (Root Bound) स्थिति कहा जाता है, जिसमें पौधा पानी और पोषक तत्वों को सही तरीके से नहीं ले पाता.
गमले के नीचे से निकलने लगें जड़ें
अगर आपके पौधे की जड़ें ड्रेनेज होल (पानी निकलने वाले छेद) से बाहर आने लगी हैं तो यह सबसे बड़ा संकेत है कि पौधे का गमला छोटा पड़ गया है. जड़ों को अब फैलने के लिए ज्यादा जगह चाहिए.
मिट्टी जल्दी सूखने लगे
पहले जिस पौधे को हफ्ते में एक बार पानी देने की जरूरत होती थी, अगर अब उसकी मिट्टी जल्दी सूखने लगी है तो इसकी वजह जड़ों का ज्यादा फैल जाना हो सकता है. ज्यादा जड़ें मिट्टी की नमी को तेजी से सोख लेती हैं और पौधे को बार-बार पानी की जरूरत पड़ने लगती है.
पौधे की ग्रोथ रुक जाए
अगर पौधे की नई पत्तियां छोटी निकल रही हैं या लंबे समय से नई ग्रोथ नहीं दिख रही है तो हो सकता है कि गमले में जड़ों के लिए जगह खत्म हो गई हो. ऐसे में बड़ा गमला पौधे को दोबारा बढ़ने में मदद कर सकता है.
पौधा बार-बार गिरने लगे
कुछ पौधे ऊपर से ज्यादा बड़े और भारी हो जाते हैं, जबकि नीचे की जड़ों को सहारा देने के लिए पर्याप्त जगह नहीं मिलती. ऐसे पौधे आसानी से एक तरफ झुकने या गिरने लगते हैं. यह भी गमला बदलने का संकेत हो सकता है.
गमले की मिट्टी खराब दिखने लगे
अगर मिट्टी की ऊपरी सतह पर सफेद परत (नमक जमा होना) दिखाई देने लगे या मिट्टी बहुत सख्त हो जाए, तो पौधे को नई मिट्टी और बड़े गमले की जरूरत पड़ सकती है. पुरानी मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी भी हो सकती है.
पौधे को बाहर निकालकर करें जांच
अगर आपको शक है कि पौधे का गमला छोटा हो गया है तो धीरे से पौधे को गमले से बाहर निकालकर जड़ों को देखें. अगर जड़ें चारों तरफ गोल-गोल घूम रही हैं और मिट्टी कम दिखाई दे रही है तो पौधा रूट बाउंड हो चुका है.
बड़ा गमला चुनते समय रखें ध्यान
कब बदलें पौधे का गमला?
पौधे को नए गमले में लगाने का सही समय तब होता है जब उसकी जड़ें जगह भर दें, ग्रोथ धीमी हो जाए या पौधा बार-बार तनाव के संकेत देने लगे. समय पर गमला बदलने से पौधे की जड़ें स्वस्थ रहती हैं और नई पत्तियां व शाखाएं तेजी से विकसित होती हैं.
आजतक एग्रीकल्चर डेस्क