
साल 1968 की बात है. उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर के दतियाना गांव में एक किसान रहते थे, मेघराज सिंह खोखर. उन्होंने दिल्ली के पूसा संस्थान के वैज्ञानिकों से एक बात कही, जो आगे चलकर भारत की किस्मत बदलने वाली थी.
उस वक्त किसी को नहीं पता था कि यह बातचीत 40 साल बाद दुनिया के सबसे मशहूर चावल, यानी 'पूसा बासमती 1121' की नींव बन जाएगी. आज सिर्फ इसी एक चावल की किस्म की वजह से भारत हर साल करीब 25,000 करोड़ रुपये विदेश से कमाता है.
यह कहानी है एक किसान के अनुभव और एक वैज्ञानिक की मेहनत के मेल की, जिसने भारतीय बासमती को दुनिया का नंबर एक चावल बना दिया.

किसान ने बताया, आखिर कैसा होना चाहिए 'असली बासमती'
मेघराज सिंह खोखर, पूसा के मशहूर वैज्ञानिक डॉ. विजयपाल सिंह के फूफा थे. एक दिन उन्होंने डॉ. विजयपाल सिंह से बातों-बातों में बताया कि एक 'परफेक्ट बासमती' कैसी होनी चाहिए.
उनकी बात किसी किताब से नहीं, बल्कि सालों के खेती के अनुभव से निकली थी. उन्होंने कहा, बासमती का चावल पकने के बाद सुई जैसा लंबा और सुडौल होना चाहिए, मोटा-थुलथुला नहीं. उसकी खुशबू इतनी तेज हो कि घर में बासमती पक रही हो, तो पड़ोसी को भी पता चल जाए.

पकाने पर चावल का दाना पांच गुना तक फूल जाए. चावल खाने में मक्खन जैसा मुलायम हो और आसानी से पच जाए. बस यही चार बातें थीं. लेकिन इन्हीं चार बातों ने डॉ. विजयपाल सिंह को एक ऐसी दिशा दे दी, जो आगे चलकर इतिहास बन गई.
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वैज्ञानिक ने किसान के सपने को लैब में उतारा
डॉ. विजयपाल सिंह भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान यानी IARI, पूसा में काम करते थे. उन्होंने अपने फूफा मेघराज सिंह खोखर की बताई हुई बातों को अपनी रिसर्च का आधार बनाया.
उन्होंने एक बड़ा 'रॉस ब्रीडिंग प्रोग्राम' शुरू किया, यानी अलग-अलग किस्मों के चावल को मिलाकर एक नई और बेहतर किस्म बनाने की कोशिश. इसमें सालों की मेहनत लगी. लेकिन नतीजा जो निकला, वो बेमिसाल था.

जो चावल तैयार हुआ, उसके बारे में सोचिए
पकने से पहले उसके एक दाने की लंबाई होती है 8.5 मिलीमीटर. और पकने के बाद वही दाना 20 से 25 मिलीमीटर तक लंबा हो जाता है, यानी करीब तीन गुना लंबा. दुनिया में इससे लंबा पकने वाला चावल आज तक नहीं बना. इसीलिए इस किस्म का नाम 'लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स' में दर्ज हुआ.
इस किस्म को बनाने का पूरा श्रेय मिला डॉ. विजयपाल सिंह को, जिन्हें बाद में भारत सरकार ने 'पद्मश्री' से सम्मानित किया. उन्होंने खुद यह पूरी कहानी 'किसान तक' के पॉडकास्ट 'अन्नगाथा' में सुनाई.
पहले नाम था 'पूसा सुगंध-4', फिर मिली 'बासमती' की पहचान
यहां कहानी में एक दिलचस्प मोड़ आता है. जब यह चावल पहली बार 2003-04 में बाजार में आया, तो इसे 'बासमती' नहीं कहा जा सकता था. इसका नाम रखा गया 'पूसा सुगंध-4'. वजह थी एक पुराना नियम.

उस वक्त का नियम कहता था कि किसी भी नई चावल की किस्म को 'बासमती' तभी कहा जा सकता है, जब उसे बनाने में इस्तेमाल की गई पुरानी किस्मों में से कोई एक, उन 6 पारंपरिक बासमती किस्मों में से हो. सीधे शब्दों में, नए चावल की जड़ें सीधे किसी पुरानी बासमती किस्म से जुड़ी होनी चाहिए.
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पूसा सुगंध-4 की बासमती वंश से जड़ें तो जुड़ी थीं, लेकिन उसका कोई 'डायरेक्ट पैरेंट' उन 6 पारंपरिक किस्मों में नहीं था. इसलिए राइस इंडस्ट्री के कुछ लोगों और वाणिज्य मंत्रालय ने इसे बासमती मानने से इनकार कर दिया.
लेकिन जब इस चावल की खूबियों की चर्चा दुनियाभर में होने लगी और विदेशी बाजारों में इसकी जबरदस्त मांग आने लगी, तो सरकार ने बासमती की परिभाषा ही बदल दी.
नई परिभाषा में यह शर्त हटा दी गई कि 'डायरेक्ट पैरेंट' पारंपरिक किस्म होना जरूरी है. अब नया नियम यह हुआ कि अगर किसी चावल में बासमती की पीढ़ी के गुण मौजूद हैं, तो उसे बासमती माना जा सकता है.
इसके बाद साल 2008 में 'सीड एक्ट 1966' के तहत इस चावल का दोबारा रजिस्ट्रेशन हुआ और 'पूसा सुगंध-4' का नाम बदलकर हो गया 'पूसा बासमती 1121'.

आज यही चावल भर रहा है भारत का खजाना
आज भारत हर साल करीब 50,000 करोड़ रुपये के बासमती चावल का निर्यात करता है. इसमें से करीब 50 फीसदी हिस्सा अकेले पूसा बासमती 1121 का है, यानी करीब 25,000 करोड़ रुपये सिर्फ इस एक किस्म से आते हैं.
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यह किस्म आज दुनिया के सबसे बड़े चावल बाजारों में छाई हुई है. खाड़ी देश, यूरोप, अमेरिका, यानी जहां भी प्रीमियम बासमती की मांग है, वहां पूसा 1121 का नाम सबसे ऊपर है.
लेकिन इस पूरी कामयाबी की असली जड़ है 1968 में एक किसान की कही हुई वो चार सादी बातें और एक वैज्ञानिक का उन बातों पर भरोसा.

मेघराज सिंह खोखर ने 'विजन' दिया और डॉ. विजयपाल सिंह ने उसे हकीकत में बदला. दोनों के मेल ने साबित कर दिया कि खेत का अनुभव और लैब की रिसर्च, जब साथ आएं, तो कुछ भी नामुमकिन नहीं.