प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के किसानों से रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल 50 फीसदी तक कम करने की जो पुरजोर अपील की है. कुछ लोग पूछ रहे हैं कि क्या ऐसा संभव है? जवाब है कि हां, ऐसा हो सकता है. प्रधानमंत्री की इस अपील को सिर्फ लच्छेदार भाषण समझने की भूल कतई मत कीजिए. यह सीधी, तीखी और कड़वी आर्थिक हकीकत है. इससे न सिर्फ देश की आर्थिक स्थिति ठीक होगी बल्कि लोगों की सेहत भी सुधरेगी. सरकारी तिजोरी और कृषि विज्ञान के आंकड़ों को एक साथ मेज पर रख दिया जाए, तो एक ऐसा सच बाहर आता है जो कृषि मंत्रालय की रीढ़ हिलाने के लिए काफी है. यदि भारतीय खेतों में खाद का इस्तेमाल सिर्फ 'संतुलित' हो जाए, तो भारत को विदेशों के आगे कटोरा फैलाकर यूरिया नहीं मंगाना पड़ेगा. बल्कि, हम दुनिया की छाती पर चढ़कर उसे यूरिया निर्यात करने वाले 'ग्लोबल लीडर' बन जाएंगे. इसी तरह डीएपी के आयात में 70 फीसदी से ज्यादा की कमी कर सकते हैं.
खेतों में उर्वरकों का आदर्श अनुपात 4 हिस्सा नाइट्रोजन (N), 2 हिस्सा फास्फोरस (P) और 1 हिस्सा पोटाश (P) होना चाहिए. लेकिन वर्तमान में देश में 4:2:1 का यह संतुलन बिगड़कर 9.3 : 3.5 : 1 के खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है. इसका मतलब है कि देश के खेतों में जरूरत से दोगुने से भी अधिक यूरिया झोंका जा रहा है, जिससे मिट्टी बंजर हो रही है. इसी बेतहाशा 'ओवरडोज' के चलते देश की वार्षिक यूरिया खपत बढ़कर 360 लाख मीट्रिक टन (LMT) तक पहुंच गई है. इस कृत्रिम मांग को पूरा करने के लिए भारत को वित्त वर्ष 2023-24 में 70.42 LMT यूरिया का आयात करना पड़ा, जबकि हमारे नए अत्याधुनिक कारखानों के दम पर घरेलू उत्पादन पहले से ही 300 LMT के मजबूत स्तर पर खड़ा है.
उर्वरक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि देश के किसान प्रधानमंत्री की इस अपील को स्वीकार कर लें और खेतों में वापस 4:2:1 का जादुई संतुलन बहाल कर लें, तो यूरिया की वास्तविक मांग घटकर मात्र 240 से 250 LMT रह जाएगी. इससे हमारी विदेशी मुद्रा बचेगी, यही नहीं, हमारे पास हर साल लगभग 50 से 60 LMT अतिरिक्त यूरिया बचेगा. जिसे हम निर्यात कर पाएंगे. ये आंकड़े चीख-चीख कर कह रहे हैं कि हमारे कारखानों में देश का पेट भरने और दुनिया को बेचने लायक यूरिया तैयार हो रहा है. कमी हमारे कारखानों में नहीं, बल्कि खेतों में की जा रही 'अंधाधुंध डंपिंग' में है.
डीएपी आयात में आएगी कमी
यदि देश में एनपीके (NPK) का वास्तविक अनुपात वर्तमान के 9.3 : 3.5 : 1 के असंतुलित स्तर से सुधरकर वैज्ञानिक मानक 4 : 2 : 1 के आदर्श स्तर पर आ जाता है, तो डीएपी के आयात पर भी इसका चमत्कारी असर पड़ेगा. वर्तमान में हम सालाना लगभग 92 लाख टन डीएपी (55 लाख टन आयात + 37 लाख टन घरेलू उत्पादन) का उपयोग कर रहे हैं. वर्तमान में पोटाश (1) के मुकाबले फास्फोरस का उपयोग 3.5 गुना हो रहा है, जबकि आदर्श रूप में इसे केवल 2 गुना होना चाहिए.
यदि हम पोटाश (K) की वर्तमान खपत को स्थिर (यानी बेस वैल्यू '1') मान लें और फास्फोरस (P) के अनुपात को 3.5 से घटाकर आदर्श मानक 2 पर ले आएं, तो डीएपी की कुल मांग में आनुपातिक रूप से लगभग 43 फीसदी की भारी गिरावट आएगी. इस तरह वर्तमान आयात 55 लाख टन से घटकर मात्र 15.57 लाख टन रह जाएगा. भारत का DAP आयात सीधे लगभग 40 लाख टन कम हो जाएगा. प्रतिशत के लिहाज से DAP आयात में 71.7 फीसदी की भारी कमी दर्ज की जाएगी. भारत में फास्फोरस का सबसे लोकप्रिय स्रोत डीएपी है. इसके एक बैग में 46 फीसदी फास्फोरस और 18 फीसदी नाइट्रोजन होता है.
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राज्यों की लापरवाही
देश के कुछ राज्यों में यूरिया और डीएपी का यह 'ओवरडोज' इस कदर पागलपन की हद पार कर चुका है कि यह हमारी वैश्विक निर्यात नीति के सीने में खंजर घोंप रहा है. रेगिस्तानी और पानी की किल्लत वाले इस राज्य राजस्थान में किसान 1 किलो पोटाश के मुकाबले लगभग 46 किलो यूरिया और 15 किलो फास्फोरस इस्तेमाल किया जा रहा है.
यानी एनपीके रेश्यो 4:2:1 से बिगड़कर (45.7 : 15.0 : 1) हो गया है. झारखंड में पोटाश के हर 1 किलो के मुकाबले 37 किलो नाइट्रोजन और 11 किलो फास्फोरस का इस्तेमाल हो रहा है. अगर इन राज्यों के कृषि विभाग में कार्यरत अधिकारियों को वर्षों पहले से वातानुकूलित दफ्तरों से हंटर मारकर फील्ड में दौड़ाया गया होता तो देश का हजारों टन यूरिया और डीएपी बच गया होता.
भारत को आयातक से वैश्विक निर्यातक बनाने का यह रास्ता दूध की तरह साफ है, लेकिन इस राह में सबसे बड़ा रोड़ा बने कृषि मंत्रालय और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद. इन दोनों के एक्सटेंशन विभाग सफेद हाथी बन चुके हैं. अगर किसानों को अब तक एनपीके रेश्यो की सही जानकारी नहीं है तो ICAR और कृषि विज्ञान केंद्रों के प्रसार विभाग में कार्यरत वैज्ञानिकों को हर महीने लाखों की सैलरी किस बात की दी जा रही है? इन तथाकथित विशेषज्ञों ने कभी खेतों की पगडंडियों पर उतरकर, किसानों के हाथ में हाथ डालकर यह क्यों नहीं समझाया कि यूरिया और डीएपी की अति तुम्हारी जेब भी काट रही है और देश की गर्दन भी मरोड़ रही है?
कागजों में दफन सॉइल हेल्थ कार्ड
सरकार ने अरबों रुपये फूंककर 'सॉइल हेल्थ कार्ड' बांटे, लेकिन वे कार्ड ज्यादातर किसानों के घरों में रद्दी की तरह पड़े हैं. वैज्ञानिकों की इस घोर विफलता के कारण ही किसान आज भी इस भ्रम में जी रहा है कि "जितना ज्यादा यूरिया, उतनी हरी फसल" इसी अज्ञानता ने देश की तिजोरी को खोखला कर दिया. जमीन बंजर होने की कगार पर है और सेहत खराब हो रही है वो अलग.
बहरहाल, कृषि तंत्र की नाकामी और नालायकी को अलग रखिए. लेकिन प्रधानमंत्री मोदी की रासायनिक उर्वरकों के इस्तेमाल में 50 फीसदी कटौती की अपील को लाचारी मत समझिए. यह भारत को उर्वरक क्षेत्र में दुनिया का 'सुल्तान' बनाने का सबसे बड़ा आर्थिक ब्रह्मास्त्र है. लेकिन यह ब्रह्मास्त्र तब तक काम नहीं करेगा जब तक कृषि मंत्रालय और ICAR के हुक्मरान अपने ऐशो-आराम के दफ्तरों से बाहर नहीं घसीटे जाते. जब तक वैज्ञानिक खेतों की मिट्टी में खड़े होकर संतुलित खाद को एक 'अनिवार्य राष्ट्रभक्ति का आंदोलन' नहीं बनाएंगे, तब तक भारत अपनी ही नालायकी के कारण आयातक बना रहेगा.