
पिछले एक साल में अमेरिका ने रूस से तेल खरीदने वाले देशों को धमकाया, रूसी तेल कंपनियों पर प्रतिबंध लगाए और अपने व्यापारिक साझेदारों पर भारी-भरकम टैरिफ लगाए. अब इसी कड़ी में अमेरिका ने एक और कड़ा कदम उठाया है यानी एक ऐसा बिल, जिसमें रूस से व्यापार करने वालों पर 500 फीसदी तक टैरिफ लगाने की धमकी दी गई है.
तेल को लेकर यह 'जंग' तो पहले से चल रही थी, लेकिन अब अमेरिका ने इसमें यूरेनियम को भी जोड़ दिया है. सवाल ये है कि इससे सबसे ज्यादा असर किस पर पड़ेगा? और क्या अमेरिका ने इस चक्कर में खुद को ही नुकसान पहुंचा लिया?
दरअसल, 2023 में अमेरिका खुद रूसी यूरेनियम का सबसे बड़ा खरीदार था. वर्ल्ड इंटीग्रेटेड ट्रेड सॉल्यूशन (WITS) के आंकड़ों के मुताबिक, उस साल अमेरिका ने रूस से करीब 1.2 अरब डॉलर का यूरेनियम खरीदा. इसके बाद यूरोपीय संघ (464.4 मिलियन डॉलर), फ्रांस (431.7 मिलियन डॉलर), चीन (418 मिलियन डॉलर) और दक्षिण कोरिया (342.3 मिलियन डॉलर) का नंबर आता है.

अमेरिका लंबे समय तक रूस से यूरेनियम मंगाता रहा. लेकिन 2024 में उसने एक कानून पास किया, जिसके तहत रूस में बना लो-एनरिच्ड यूरेनियम आयात करना प्रतिबंधित कर दिया गया. दिलचस्प बात ये है कि अमेरिका को रूस पर अपनी निर्भरता का एहसास तभी हुआ, जब उसने खुद उस पर रोक लगा दी.
इसके बाद अमेरिका ने ये भी साफ किया कि अगर ज़रूरत पड़ी, तो ऊर्जा सचिव की मंजूरी (वेवर) के जरिये आयात की इजाजत दी जा सकती है. यानी अगर देश के हित में हो, या अमेरिकी न्यूक्लियर ऊर्जा सप्लाई चेन को बनाए रखने के लिए ज़रूरी हो तो रूसी यूरेनियम आ सकता है. 2024 से 2027 के बीच आयात पर कोटा भी तय किया गया है.
आंकड़े बताते हैं कि रूस और चीन, दोनों अमेरिका के बड़े यूरेनियम सप्लायर रहे हैं. 2023 में अमेरिका ने रूस से करीब 1.19 अरब डॉलर और चीन से 471 मिलियन डॉलर का यूरेनियम खरीदा. लेकिन 2024 में तस्वीर बदल गई, रूस से आयात घटकर 623 मिलियन डॉलर रह गया, जबकि चीन से आयात बढ़कर 848 मिलियन डॉलर पहुंच गया.

कहानी यहीं खत्म नहीं होती. माना जा रहा है कि चीन से जो अतिरिक्त यूरेनियम अमेरिका खरीद रहा है, वह असल में रूस में ही बना यूरेनियम है, जो बस रास्ता बदलकर आ रहा है. सेंटर फॉर ईस्टर्न स्टडीज़ के मुताबिक, चीनी कस्टम्स डेटा में रूस से चीन को यूरेनियम निर्यात में तेज बढ़ोतरी दिखी है. यही वजह है कि 2024 में अमेरिका ने इस पूरे मामले की जांच भी शुरू कराई थी.
यानी एक तरफ अमेरिका रूस पर सख्ती दिखा रहा है, दूसरी तरफ रूसी यूरेनियम किसी न किसी रास्ते से अमेरिकी बाजार तक पहुंचता दिख रहा है कि बस लेबल बदल गया है.