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बुर्ज खलीफा पर सन्नाटा, खाली होते होटल... जंग की आग में सुलगते UAE से ग्राउंड रिपोर्ट

मिडिल ईस्ट में ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच छिड़ी जंग की आग अब खाड़ी देशों के सुरक्षित कहे जाने वाले शहरों तक पहुंच गई है. दुबई से शारजाह तक, रौनक की जगह अब अनिश्चितता के सन्नाटे ने ले ली है. पढ़िए, ग्राउंड जीरो से एक हफ्ते की आंखों देखी रिपोर्ट.

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हमलों के बीच गुलजार रहा दुबई का दीरा बाजार (Photo: ITG)
हमलों के बीच गुलजार रहा दुबई का दीरा बाजार (Photo: ITG)

अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर शुरू हुए हमले के चलते का पूरा मिडिल ईस्ट जंग की आग में झुलस रहा है. बदले की कार्रवाई में ईरान खाड़ी की उन सभी देशों को निशाना बना रहा है, जहां अमेरिकी सैन्य ढांचा मौजूद हैं फिर चाहे वो नौसैनिक बेड़ा हो या हवाई सेना की मौजूदगी हो और ईरान के हमले में अब खाड़ी देशों की न सिर्फ़ संपत्ति का नुकसान हो रहा है, बल्कि उसकी अर्थव्यवस्था पर भी गहरी चोट पहुंच रही है, जिसका असर लंबे वक्त तक नजर आएगा. इन परिस्थितियों में कवरेज के लिए आजतक के संवाददाता आशुतोष मिश्रा एक हफ्ते से संयुक्त अरब अमीरात (UAE) में ग्राउंड जीरो पर मौजूद रहे.

उन्होंने बताया कि मैंने ईरान-इजरायल-अमेरिका संघर्ष को ग्राउंड जीरो से कवर करने के लिए एक पूरा हफ्ता दुबई और UAE में बिताया.  रोजी रोटी की तलाश से लेकर अमीरों के लिए सुरक्षित निवेश का स्थान बन चुका UAE अब अपने भविष्य को लेकर चिंतित दिखाई दे रहा है. हवाई हमलों के चलते बार बार उसका हवाई स्पेस बाधित हो रहा है, जिससे दुबई, अबू धाबी, या UAE के किसी भी शहर से आने जाने वाली उड़ानों पर इसका प्रभाव दिख रहा है.

UAE यात्रा के लिए मुझे दुबई की या अबू धाबी की सीधी उड़ान नहीं मिली. इस वजह से मुझे अपना सफर ओमान के रास्ते शुरू करना पड़ा. दिल्ली से मस्कट पहुंचकर मैंने सड़क मार्ग से 400 किलोमीटर से ज़्यादा ये लंबा सफर तय किया. मस्कट इमिग्रेशन पर कई सवालों के जवाब देने पड़े, जिन सवालों में परिस्थितियों का तनाव दिखाई दे रहा था. जिस स्थिति में लोग खाड़ी देश छोड़कर अपने वतन जा रहे थे, उन परिस्थितियों में एक भारतीय पत्रकार का खाड़ी देशों की ओर आना सामान्य घटना तो नहीं थी. लगभग 300 किलोमीटर का सफर तय करने के बाद मैं ओमान और संयुक्त अरब अमीरात की सीमा पर पहुंचा. हाटा बॉर्डर से मैं उन लोगों को गुजरने में ज्यादा दिक्कत नहीं आ रही थी जो ओमान या UAE के निवासी थे या उनके पास रेसीडेंसी परमिट था, लेकिन प्रवासियों को इमिग्रेशन से होकर गुजरना जरूरी था, जिस प्रक्रिया में काफी वक्त लग रहा था.

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इसी सीमा पर दो दिनों पहले एक भारतीय पत्रकार को हिरासत में ले लिया गया था, जिन्हें आगे UAE में प्रवेश नहीं करने दिया गया. ओमान की सीमा छोड़कर मैंने UAE निर्देश पर अपने दस्तावेजों की जांच करवाई और फिर अगले डेढ़ सौ किलोमीटर के सफर के लिए रवाना हुआ. कड़ी सुरक्षा जांच और कस्टम विभाग से गुजरते हुए देर रात से लेकर तड़के सुबह तक ये सफर जारी रहा. आखिरकार सुबह के साढ़े 3 बजे मैं दुबई डाउनटाउन के पास ही उस होटल में पहुंचा, जहां मुझे अगले एक हफ्ते का समय बिताना था.

गुलजार रहने वाले दुबई में अजीब-सी शांति 

दुबई की फिजाओं में एक अजीब शांति थी और एक पल को लगा की संभावना ये तड़के सुबह दिखने वाली शांति की हो सकती है. कुछ समय अपने कमरे में आराम करने के बाद एक रिपोर्टर के लिए परिस्थितियों को कवर कर पूरी दुनिया के सामने लाने का समय था. स्थानीय समयानुसार सुबह के आठ बजे और भारत में उस समय साढ़े नौ बज रहे थे. अगर आप दुबई में हैं तो सबसे पहले उसकी पहचान उस गगनचुंबी इमारत के इर्द-गिर्द पहुंचना जरूरी होता है, जिसे दुनिया बुर्ज खलीफा कहती है. 

अपने होटल से लेकर बुर्ज ख़लीफ़ा के बीच पहुंचने में मुझे दस मिनट से कम समय लगा, जब के सड़क मार्ग से दूरी सिर्फ़ चार किलोमीटर से भी कम थी. मैंने दुबई में ट्रैफिक के बारे में सुना था कि कैसे पूरा शहर अपने पीक समय में रेंगते हुए चलता है, लेकिन मेरी गाड़ी 8 लेन की सड़क पर फर्राटा भर रही थी. सड़कों पर ट्रैफिक की स्थिति में मौजूदा परिस्थितियों और उससे उभरे हुए तनाव का प्रतिबिम्ब था. 

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ईरान द्वारा हो रहे हमले को एक सप्ताह बीत चुके थे. UAE इन परिस्थितियों के लिए संभवता तैयार नहीं था और उसे अंदाजा भी नहीं था कि ये युद्ध आने वाले कितने दिनों तक चलेगा. बुर्ज ख़लीफ़ा के मैंने अपने लाइव ट्रांसमिशन और कनेक्टिविटी के लिए टूरिस्ट SIM कार्ड खरीदने के लिए दुबई मॉल का रुख किया. दुबई का सबसे प्रतिष्ठित ये व्यापारिक प्रतिष्ठान हर पल सैकड़ों हज़ारों लोगों का स्वागत करता है. इतनी सुबह भीड़ न होना सामान्य बात थी. दुबई मॉल से बाहर निकल कर मैं प्रांगण के उस हिस्से में पहुंचा, जहां से बुर्ज खलीफा स्पष्ट दिखाई देता है और इसी जगह से हज़ारों लोग बुर्ज खलीफा के साथ तस्वीरें खींचते हैं. वहां मौजूद कई लोगों ने बताया कि सुबह 11 बजे यहां अच्छी खासी भीड़ होती है, लेकिन बीते कुछ दिनों से लोगों की संख्या बहुत कम हो गई है. वहां इक्का-दुक्का दिखने वाले मौजूद लोग स्थानीय नहीं थे. 

उन्होंने आगे बताया कि मैंने अपना मोबाइल फोन और माइक निकालकर रिकॉर्डिंग करनी शुरू की और परिस्थितियों की ग्राउंड रिपोर्ट तैयार करनी शुरू की और कुछ ही सेकंड के अंदर वहां सुरक्षाकर्मी मुझे रोकने के लिए आए. उन्होंने कहा आप यहां माइक लगाकर रिपोर्टिंग नहीं कर सकते. मैंने उन्हें कहा कि मेरे पास दुबई में रिपोर्टिंग करने के लिए UAE सरकार का दिया गया अनुमति पत्र है, जिसके तहत उन्होंने मुझे यहां बतौर पत्रकार काम करने की मान्यता दी है. 

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लाख समझाने के बाद भी सुरक्षाकर्मी नहीं माने और उन्होंने कहा आप इस जगह से रिपोर्ट नहीं कर सकते. किसी विवाद में पढ़ने से बेहतर मैंने जगह बदली और परिस्थितियों पर एक रिपोर्ट बनाकर मैं वहां से निकल गया था. दुबई मॉल की प्रांगण में जाने माने कैफे और रेस्टोरेंट हैं, लेकिन वहां भी एक अजीब शान्ति और सन्नाटा था जो ये कह रहा था कि दुबई कम से कम इसके लिए नहीं जाना जाता. 

इसी दौरान मोबाइल पर मिसाइल और ड्रोन हमले का एक अलर्ट आता है.  ये संदेश साफ कहता है कि लोग सुरक्षित ठिकानों पर चले जाएं. इजरायल और यूक्रेन में ऐसी परिस्थिति में तेज एयर सायरन बचता है, लेकिन UAE में इस तरह का कोई सायरन नहीं है और न ही वहां कोई ऐसे बंकर बनाए थे, जिसके नीचे लोग छुप जाएं. अलबत्ता मोबाइल फ़ोन पर अलर्ट पूरी स्क्रीन पर जरूर दिखाई दिया, लेकिन इस अलर्ट के बावजूद भी मुझे बुर्ज ख़लीफ़ा के आस-पास लोग दौड़ते भागते दिखाई नहीं दिए. मानो सबने इस संदेश को इग्नोर कर दिया है. लोगों में भय और डर नहीं दिखा. हालांकि, चेतावनी के तहत मैंने मॉल के अंदर जाना ही सही समझा. 

इस इलाके में अलग-अलग जगहों पर मैंने लोगों से बात करनी चाही तो ज्यादातर लोग परिस्थितियों के बारे में बात करने से या तो हिचकिचाते रहे या डरते रहे. कई लोगों ने मुझे बताया कि अगर उन्होंने खुलकर कुछ भी कहा तो यहां उन्हें जेल में डाल दिया जाएगा. लोगों ने कहा कि यहां खतरा ज़्यादा नहीं है, लेकिन हमलों को देखकर मन में डर ज़रूर है. लेकिन स्थिति ऐसी नहीं है कि लोग बिल्कुल भयभीत हो जाए. मेरे जेहन में ये भी ख्याल जरूर आया कि मुझे भी यहां कोई ख़तरा नज़र नहीं आता और मैं भी आम UAE वासियों की तरह यहां सुरक्षित हूं. 

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सड़कों पर अभी-भी आप सामान्य सन्नाटा था. हालांकि, दफ़्तर जाने वालों की भीड़ मुझे दुबई मेट्रो में दिखाई दी है, जिसकी फ्रीक्वेंसी 5 छह मिनट की थी और सिर्फ 3-4 कोच वाले मेट्रो के डब्बे लोगों से भरे हुए थे. 

दुबई पुलिस ने की मोबाइल और अनुमति पत्र की जांच

दोपहर होते-होते अचानक सोशल मीडिया के ज़रिए ये जानकारी मिलती है कि UAE सरकार ने किसी भी तरह के हमले या संवेदनशील इलाकों की फोटो वीडियो साझा करने दुष्प्रचार करने ग़लत जानकारी साझा करने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई करने के आदेश जारी किए हैं जो कि एक जुर्म माना जाएगा. 
    
शाम के तीन बजे दुबई डाउनटाउन के इलाके में मैं लाइव ब्रॉडकास्ट कर रहा था. हालात के बारे में आज तक पर लाइव रिपोर्टिंग के दौरान वहां पर पुलिस की गाड़ी पहुंचती है. मुझे वहां असर रिपोर्टिंग से रोका गया ,बल्कि पुलिस ने मोबाइल फोन भी ले लिया. उन्होंने मेरे बारे में मुझसे पूछा और मैंने उन्हें बताया कि मैं पत्रकार हूं और तब उन्होंने पूछा कि क्या मेरे पास अनुमति है. मैंने तुरंत ने UAE द्वारा मेरे नाम पर जारी किया गया अनुमति पत्र दिखाया. 

पुलिसकर्मी भी हैरान थे, जिस देश में आम तौर पर मीडिया खुलकर रिपोर्टिंग नहीं कर पाती उन देश में युद्ध और तनाव के हालात में एक भारतीय पत्रकार खुलेआम रिपोर्ट कैसे कर रहा है. इसलिए उन्हें इस बात पर भी शक हुआ कि कहीं ये अनुमति पत्र फर्जी तो नहीं था. उनके सवाल जवाब हाव-भाव देखकर मैं समझ गया कि शायद दुबई में ये मेरा आखिरी दिन भी हो सकता है. तमाम दस्तावेज वेरिफिकेशन करने के बाद उन्होंने मेरा फोन चेक किया और ये देखने की कोशिश की कि मैंने किस तरह की रिपोर्ट बनाई है और क्या उसमें किसी संवेदनशील इलाके की तस्वीरें हैं या हमले के दौरान नुकसान से जुड़े हुआ, किसी तरह का वीडियो मेरे फोन में मौजूद है. जिसे सोशल मीडिया पर साझा करने पर UAE सरकार ने प्रतिबंध लगाया था. 

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दो घंटे की मशक्कत के बाद उन्हें फ़ोन में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं मिला और तब उन्होंने मुझे जाने दिया. ये एक झलक काफ़ी थी, ये समझने के लिए कि अगले सात दिन मुझे किन चुनौतियों से गुजरना पड़ेगा. 

शाम होते-होते हैं मोबाइल पर एक अलर्ट आता है कि इस इलाके में ईरान द्वारा दागी गई मिसाइल और ड्रोन के युही की सीमा में प्रवेश करने का अलर्ट मिला है, जिसे एयर डिफेंस सिस्टम निष्क्रिय कर रहा है और लोगों को हिदायत दी गई है कि वो शेल्टर में चले जाए और सुरक्षित ठिकानों में रहें. सुबह की तरह ही इस समय भी लोगों के भीतर मुझे वो डर नहीं दिखाई दिया और लोग बेफिक्र होकर आते-जाते दिखाई दिए. 

एक और दिन, जब ईरान ने किए  हवाई-अड्डे के पास हमले 

अगले दिन की शुरुआत हुई और फिर तो पता चला कि रात में दुबई अंतरराष्ट्रीय हवाई-अड्डे अबू धाबी के एक इलाके में और इसी तरह UAE के कई अलग अलग इलाकों में मिसाइलों ड्रोन से ईरान द्वारा हमले किए गए. दिन बीते जा रहे थे, लेकिन युद्ध का अंत नजर नहीं आ रहा था. दुबई के लोग कहते रहे कि हालात ठीक है, हमें डरने की ज़रूरत नहीं है. लेकिन आठ दिनों के बाद चेहरे के भाव भंगिमा में बदलाव दिखाई दे रहा था. जिस होटल में मैं रुका हुआ था, वो लगभग खाली हो चुका था. सुबह नाश्ते की टेबल पर लोगों की भीड़ न के बराबर थी.

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लाइव ब्रॉडकास्ट के लिए जैसे मैंने अपना मोबाइल फोन और माइक सेट किया 3-4 मिनट के भीतर ही सुरक्षाकर्मी अचानक मेरे पास पहुंचते हैं और मुझे फिर लाइव रिपोर्टिंग से रोक दिया जाता है. पूरा दुबई शहर ही नहीं, बल्कि UAE CCTV कैमरों की निगरानी में है और ये समझना मुश्किल नहीं था उसकी इस स्तर तक सर्विलांस वाले शहर में कुछ भी पुलिस और सुरक्षाकर्मियों की निगरानी से बाहर नहीं है. मेरी पहचान पत्र के साथ मेरे पासपोर्ट अनुमति पत्र सारे दस्तावेजों की जांच फिर से होने लगी. मेरे फोन से किए गए कि मैंने कहीं इस जगह की कोई तस्वीरें तो नहीं ली है, क्योंकि इसी जगह पर पीछे दुबई का बड़ा एग्जीबिशन सेंटर था और इसी इलाके के पास एक वर्ल्ड ट्रेड सेंटर भी था. माथापच्ची के बाद उन्हें मेरे फ़ोन में कुछ नहीं मिला था, लेकिन मुझे यहां से जाने को कह दिया गया. 

मुझे पता चला कि दुबई में रहने वाले कई प्रवासी भारतीय हैं जो उन लोगों की मदद कर रहे हैं, जिनकी फ्लाइट डिले हो गई है या जो लोग किसी तरह परिस्थितियों में फंस गए हैं और वतन वापस नहीं जा पा रहे हैं. अल डेरा से लेके शारजाह और अबुधाबी में रहने वाले ऐसे भारतीयों की संख्या बहुत जिन्होंने मदद के लिए अपने दरवाजे खोल दिए. अब सड़क मार्ग से उन तमाम इलाकों तक मैं पहुंचा और मदद की उन तस्वीरों को दुनिया के सामने पहुंचाने की कोशिश की रिपोर्टिंग की, लेकिन आते जाते सड़कों पर UAE का सन्नाटा चीख कर कह रहा था कि UAE की चमक को बचाने के लिए अब खाड़ी का ये देश बड़ी कीमत चुका रहा है. कैमरे पर हर कोई कहता रहा कि हमें यहां डर नहीं लगता, हम यहां सुरक्षित हैं, लेकिन कैमरा हटते ही लोग अपने मन की पीड़ा अंदर का भय और फ़िक्र ज़ाहिर कर रहे थे. हर किसी को चिंता थी कि अगर युद्ध लंबा चला तो क्या होगा. 

दुबई का इलाका भीड़-भाड़ के लिए खाने पीने के लिए बहुत मशहूर है. ऐसी परिस्थितियों में भी ज़िंदगी मुझे यहां रात के समय चलती दिखाई दी रोज़ा इफ्तार के बाद लोग अलग-अलग देशों में दोस्त तो हज़ारों परिवार के साथ खाते पीते भी नज़र आए. लोगों ने दुबई की हिम्मत और साहस के बारे में बहुत कुछ कहा लेकिन ये भाव भंगिमा और कुछ शब्द ये संकेत भी दे रहे थे की उनके मन में युद्ध और उसके परिणाम को लेकर कई आशंकाएं परेशान कर रही हैं. 

अगले दिन यूएई के दूसरे शहर की यात्रा के दौरान पता चला कि दुबई एयरपोर्ट के पास एक धमाका हुआ है जो कि ईरान से आए ड्रोन हमले की वजह से हुआ था. एयरपोर्ट था रास्ते में था तो मैंने अपने ड्राइवर से कहा कि एयरपोर्ट के पास एक ऐसी जगह पर रुके, जहां से पूरा एयरपोर्ट दिखाई देता हो. ड्राइवर ने मुझे तुरंत बताया कि सर ऐसी जगह पर खड़े होने की अनुमति नहीं है और तस्वीरें लेने पर गिरफ़्तारी हो सकती है और एक फ्लाईओवर के हिस्से में बिना कैमरे मैंने खड़ा होकर एयरपोर्ट को एक बार देखने की कोशिश की, लेकिन सिर्फ़ ढाई मिनट के अंदर वहां पर सुरक्षाकर्मियों की गाड़ी पहुंचती है. इसके पहले कि किसी बात को लेकर विवाद होता हमने तुरंत वहां से निकलना ज़रूरी समझा. अगले तीन दिनों में यह पता चल चुका था कि से ज़्यादा लोग सिर्फ इस बात के लिए गिरफ्तार हुए थे कि उन्होंने उन जगहों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा की थी, जहां ड्रोन को निष्क्रिय करने के चलते उसके टुकड़े नीचे गिरे धमाके हुए आग लगी या संपत्ति को नुकसान हुआ. 

अपने इसी कवर यात्रा के दौरान UAE की एयरफोर्स ने एक ड्रोन हमले को मरीना के पास नाकामयाब किया, लेकिन उसका टुकड़ा मरीना कि इमारत के एक हिस्से पर गिरा जिससे नीचे खड़े दो नागरिकों को गंभीर चोट आयी ना कि इमारत के क़िस्से को भी नुकसान पहुंचा. अगले दिन सुबह मैंने उस इलाके में जाने की कोशिश की. बीती रात हमलों की वीडियो बनाने वाले कई लोगों को हिरासत में ले लिया गया था, जिसकी जानकारी मुझे मरीना पहुंचने पर मिली. दुबई पुलिस और सिविल डिफेंस के लोग इस इलाके में लगातार गश्त कर रहे थे और ये समझना मेरे लिए मुश्किल नहीं था कि अगर मैंने यहां पर अपना कैमरा मोबाइल निकाला तो मुझे गिरफ्तार कर लिया जाएगा. 

इसी मरीना की दूसरी तरफ़ मैंने अपनी रिपोर्ट में शुरू की और 3 मिनट से कम के समय में अचानक मुझे वह दुबई पुलिस की एक जीप दिखाई पड़ती है. मोबाइल फ़ोन के कैमरे का एंगल उस दिशा में था, जिसे मरीना कि इमारत नहीं दिख रही थी, लेकिन यह मैं समझ गया कि अगर मैंने कैमरा घुमाया तो यह गिरफ्तारी तय है. जिसके बारे में मेरा ड्राइवर मुझे लगातार आगाह कर रहा था. कुछ मिनट के अंदर एक दूसरी सुरक्षाकर्मियों की टीम आती है जो मुझे तुरंत यहां से जाने को कह देते हैं. 

पर्यटक हुए कम, रात में भी दुबई में सन्नाटा 

रात के वक्त बाजारों की चहल पहल में कमी नजर आने लगी थी. सड़कों पर ट्रैफ़िक सूखने लगा था और स्थानीय लोग घरों में रहना ज़्यादा पसंद कर रहे थे. ज़्यादातर पर्यटक देश छोड़कर जा चुके थे. मुल्क में रहने वाले सोशल मीडिया पर हम सुरक्षित है का कैंपेन चला रहे थे. 

सरकारी सुरक्षा व्यवस्था सख़्त होती जा रही थी और हर उस शख़्स के ख़िलाफ़ कार्रवाई की जा रही थी जो वीडियो साझा करें या मौजूदा परिस्थितियों के बारे में कुछ भी बताने की कोशिश करें, क्योंकि UAE को लग रहा था कि अगर हालात के बारे में ज़्यादा जानकारी सामने आए तो लोगों के बीच भय बैठेगा और अनिश्चितता का माहौल फैलेगा. सरकार नहीं चाहती थी कि लोगों में डर बढ़े. 

हर दिन UAE सरकार की ओर से कहा जाने लगा कि भ्रामक बातें सोशल मीडिया पर न देखी जाए सरकार नागरिकों की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है और ऐसा दिखाई देता था जब ईरान से आने वाले 90 प्रतिशत हमलों को उनका एयर डिफेंस निष्क्रिय कर देता था.  अपने कवरेज की इस यात्रा के दौरान मैंने एक दिन होर्मुज जलडमरूमध्य जाने का फ़ैसला किया, जिसके लिए रस अल खैमा इलाके में एक नाविक से संपर्क भी साधा. हालांकि, सुबह होते-होते मुझे जानकारी दी गई कि अगर मैंने बोर्ड से पानी में उतरने की कोशिश की तो गिरफ्तारी तय है और ऐसे में डर से उस नाविक ने भी जाने से मना कर दिया. 

इस दौरान कई कारोबारी व्यापारियों से मुलाक़ातें होंगी, जिन्होंने युद्ध के दुष्परिणाम पर अपनी चिंता जाहिर की और सबसे ज़्यादा डर इस बात का दिखा कि अगर युद्ध लंबा चला तो एक बहुत बड़ा संकट इस मुल्क के और मुल्क में रहने वालों के सामने खड़ा हो जाएगा, क्योंकि खाने पीने से लेकर चीन की तमाम जरूरी वस्तुओं के आयात पर निर्भर है और आयात का मार्ग उसी समंदर का रास्ता है जिस पर फिलहाल खतरा मंडरा रहा है. 

हालांकि, सरकार लगातार कहती रही कि किसी भी चीज की किल्लत नहीं है, लेकिन उनकी ओर से ये आदेश जारी किया जाने लगा कि लोग आवश्यक वस्तुओं की जमाखोरी न करें और ऐसा तभी होता है जब सरकार परिस्थितियों के बाद उत्पन्न होने वाली संभावनाओं को समझने लगती है. भारत और पाकिस्तान से UAE को जाने वाली सप्लाई पर फर्क पड़ रहा था. इस बीच यूएई के कई ऑयल रिफाइनरी हमले के चलते प्रभावित हो चुके थे. 

हवाई मार्ग कई बार बाधित हो चुका था और अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट का इलाका लगातार हमले झेल रहा था. ड्रोन हमले को निष्क्रिय करते करते UAE के वायु सेना के दो ऑफ़िसर भी शहीद हो चुके थे और उनका घातक अपाचे हेलीकॉप्टर भी क्षतिग्रस्त हो चुका था. 

कूटनीति और दबाव का खेल

1973 में UAE द्वारा भारत में नियुक्त पहले राजदूत से भी मैंने संपर्क साधा और इंटरव्यू के दौरान, उन्होंने यहां तक कह दिया कि भारत के प्रति विश्वास इतना है कि अगर प्रधानमंत्री मोदी एक फोन कॉल करें तो इजरायल और ईरान युद्ध रोक देंगे.ये इंटरव्यू कुछ ही घंटों में पूरी दुनिया में वायरल हो गया. अगले ही दिन उन पूर्व राजदूत के डायरेक्टर ऑफ़ कम्युनिकेशन का फ़ोन कॉल मुझे आता है जो इस इंटरव्यू पर आपत्ति जताते हुए कहती है इस इंटरव्यू के लिए मैंने किसी की अनुमति या औपचारिकता पूरी नहीं की है. और मुझ पर दबाव बनाने लगी केस करेंगी, इंटरव्यू को तत्काल सभी प्लैटफ़ॉर्म से हटाया जाए और तब मैंने उन्हें कहा कि अनुमति और औपचारिकता के बाद ही ये इंटरव्यू हुआ है, जिसके लिए ख़ुद पूर्व राजदूत ने मंज़ूरी दी है. उसे ये भी कहा गया कि UAE में इस तरह के इंटरव्यू करने के लिए प्रोटोकॉल अलग है और जिसके लिए एक लंबी प्रक्रिया का पालन करना होता है. ऐसे में उन्हें इन परिस्थितियों में किसी तरह के राजनीतिक बयान देने का अधिकार नहीं दिया गया है.

बीते कुछ दिनों में बतौर पत्रकार यहां रिपोर्टिंग करने के अनुभव से ये समझना मुश्किल नहीं था कि आख़िर इस इंटरव्यू को हटाने का दबाव मुझ पर क्यों बनाया जा रहा है. 

पांच दिन बीतते बीतते लोगों के हाव-भाव में बदलने लगे और अब हर कोई युद्ध के लंबे समय तक खींचने की आशंका से चिंतित दिखाई दे रहा था. कई कारोबारी और व्यापारी भी इंटरव्यू में कहने लगे थे युद्ध लंबा चला तो उन्हें बहुत नुकसान उठाना पड़ेगा, लेकिन उम्मीद इस बात की थी कि कोई न कोई पहल युद्ध को रोकने की जरूरत होगी.

एक रिपोर्टर के तौर पर इतना ज़रूर समझ में आया कि पत्रकारों के लिए मौजूदा परिस्थितियों में खाड़ी देशों में काम करना आसान नहीं है. और अगर आपने वहां हो रहे नुकसान और युद्ध के असर की तस्वीरें साझा की तो कानून कड़ी कार्रवाई करता है. ऐसा भी नहीं है कि UAE में अंतरराष्ट्रीय मीडिया की मौजूदगी नहीं है, लेकिन इसे एक हफ्ते की कवरेज के दौरान मैंने सड़क पर किसी को नहीं देखा. इंडिया टुडे और आजतक की मौजूदगी UAE के शहर-दर-शहर कई इलाकों में रही, जहां हमने लोगों से बात की उनके मर्म, परिस्थितियों को समझा मुश्किलें भी सही है और 7 दिनों की  हर मुमकिन ग्राउंड रिपोर्ट के बाद फिर उसी सड़क मार्ग से गुजरकर ओमान के रास्ते वापस वतन पहुंचा.

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