बीते एक महीने में ईरान के शाहेद ड्रोन की गड़गड़ाहट पूरे खाड़ी क्षेत्र में गूंज रही है. ये कम लागत वाले ड्रोन अमेरिका के साथ जंग में ईरान का सबसे बड़ा हथियार बनकर उभरे हैं. अमेरिका अपने सैन्य ठिकानों को बचाने के लिए इन्हें गिराने में करोड़ों डॉलर की मिसाइलों का इस्तेमाल कर रहा है. ऐसे में खाड़ी क्षेत्र से 4500 किलोमीटर दूर स्थित एक देश मदद को आगे आया है.
यह देश यूक्रेन है, जो रूस के साथ चार साल से जंग लड़ रहा है और उसे इन शाहेद ड्रोन्स को मार गिराने का अच्छा-खासा अनुभव है. इतना ही नहीं यूक्रेन ने सस्ते स्टिंग और बुलेट इंटरसेप्टर बड़े पैमाने पर बनाए हैं.
कुछ हफ्ते पहले ही युद्ध के शुरुआती दौर में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि यूक्रेनी राष्ट्रपति जेलेंस्की वह आखिरी शख्स होंगे, जिनसे वह मदद मांगेंगे. एक महीने के भीतर ईरान ने मध्यपूर्व में अमेरिकी ठिकानों और ऊर्जा प्रतिष्ठानों को भारी नुकसान पहुंचाया है. इस युद्ध में उनका खर्च अरबों डॉलर तक पहुंच गया. ऐसे में खाड़ी देशों ने यूक्रेन की ओर रुख किया ताकि ईरान के शाहेद ड्रोन से बचा जा सके.
इससे पहले जेलेंस्की का कतर, यूएई और सऊदी अरब में भव्य स्वागत किया गया. एक समझौता हुआ, जिसके तहत यूक्रेन अपने स्टिंग इंटरसेप्टर मुहैया कराएगा और बदले में उसे रूस के खिलाफ इस्तेमाल के लिए उन्नत एयर डिफेंस मिसाइल मिलेंगी.
इतना ही नहीं, यूक्रेन पहले ही 200 से अधिक एंटी ड्रोन एक्सपर्ट्स को मध्यपूर्व भेज चुका है, जो जॉर्डन और कुवैत में शाहेद ड्रोन से निपटने में मदद कर रहे हैं.
यूक्रेन से मदद क्यों मांग रहे खाड़ी देश?
सबसे बड़ा सवाल है कि यूक्रेन अचानक से खाड़ी देशों की आंखों का तारा क्यों बन गया? इसका जवाब युद्ध की वित्तीय लागत है. मध्य पूर्व की जंग ने दिखाया है कि हमला करना सस्ता हो गया है जबकि बचाव बहुत महंगा पड़ रहा है. उदाहरण के लिए ईरान का शाहेद 136 ड्रोन जिसकी कीमत करीब बीस हजार से तीस हजार डॉलर है. इन्हें हजारों की संख्या में तेजी से महीनेभर में बनाया जा सकता है.
इन सस्ते ड्रोन और मिसाइलों ने अमेरिकी ठिकानों को भारी नुकसान पहुंचाया है. इन्हें रोकने के लिए अमेरिका और उसके सहयोगी पैट्रियट मिसाइल और THAAD सिस्टम जैसे महंगे हथियार इस्तेमाल कर रहे हैं, जिनकी सप्लाई भी अब कम पड़ रही है. इसके अलावा F-16 जैसे लड़ाकू विमानों को हवा में बनाए रखना भी बहुत महंगा है. यह तकरीबन 25,000 डॉलर प्रति घंटा और उनसे दागी गई मिसाइलें खर्च को और बढ़ा देती हैं.
यूक्रेन ने भी कुछ साल पहले इसी तरह की चुनौती का सामना किया था, जब रूस को ईरान से शाहेद ड्रोन मिले थे. पश्चिम से पर्याप्त मदद न मिलने पर यूक्रेन ने खुद सस्ते और प्रभावी समाधान विकसित किए. दो साल की मेहनत के बाद शाहेद किलर सामने आए स्टिंग और बुलेट इंटरसेप्टर. इनका सिद्धांत सरल था कि सस्ते ड्रोन का मुकाबला उससे भी सस्ते और स्मार्ट ड्रोन से करना.
ये इंटरसेप्टर ऑफ द शेल्फ पार्ट्स से बनाए जाते हैं और इनकी सफलता दर 70 से 90 फीसदी तक है. रिपोर्ट्स के अनुसार, यूक्रेन ने फरवरी में रूस द्वारा भेजे गए 5,000 ड्रोन में से 87 फीसदी को मार गिराया. इन ड्रोन को ऑपरेटर FPV गॉगल्स के जरिए नियंत्रित करते हैं, जिससे जामिंग या तकनीकी दिक्कतों से बचा जा सके.
स्टिंग इंटरसेप्टर सबसे तेज और घातक है. यह 315–340 किमी प्रतिघंटा की रफ्तार से उड़ सकता है, 10,000 फीट तक जा सकता है और थर्मल कैमरों से लक्ष्य को पहचानता है. खास बात यह है कि अगर लक्ष्य न मिले, तो यह वापस लौट सकता है. बुलेट इंटरसेप्टर जेट इंजन और चार रोटर से लैस होता है. 3D-प्रिंट किया जा सकता है और AI के जरिए लक्ष्य खोज लेता है.
ये शाहेद ड्रोन से अलग कैसे हैं?
इसका मुख्य अंतर तकनीक में है. शाहेद ड्रोन जीपीएस गाइडेड सुसाइड या कामिकाजे ड्रोन होते हैं, जो एक बार लक्ष्य पर हमला करके नष्ट हो जाते हैं. वहीं, यूक्रेन के स्टिंग जैसे इंटरसेप्टर वापसी कर सकते हैं और दोबारा इस्तेमाल हो सकते हैं, जिससे लागत काफी कम हो जाती है.
ईरान ने हजारों शहीद ड्रोन तैनात करके अमेरिकी और खाड़ी देशों की रक्षा प्रणाली को दबाव में ला दिया. हालांकि कई ड्रोन मार गिराए गए, लेकिन इसकी कीमत बहुत ज्यादा रही. यूक्रेन ने तीन साल के अनुभव से इन ड्रोन से निपटने के तरीके विकसित किए. अब यूक्रेन खाड़ी देशों के लिए प्रमुख एंटी ड्रोन तकनीक सप्लायर बनकर उभरा है. इससे उसकी वैश्विक भूमिका भी बदल रही है.