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अमेरिका-कनाडा रक्षा रिश्तों में तनाव! 1940 से चला आ रहा सैन्य समझौता स्थगित

अमेरिकी रक्षा उप सचिव एल्ब्रिज कोल्बी का कहना है कि कनाडा अपनी रक्षा प्रतिबद्धताओं पर “विश्वसनीय प्रगति” दिखाने में विफल रहा है, इसलिए इस मंच की उपयोगिता का पुनर्मूल्यांकन किया जाएगा.

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दशकों पुराना सैन्य बोर्ड स्थगित
दशकों पुराना सैन्य बोर्ड स्थगित

अमेरिका और कनाडा के बीच दशकों से चली आ रही रक्षा साझेदारी तनाव के दौर से गुजर रही है. अमेरिकी रक्षा उप सचिव एल्ब्रिज कोल्बी ने घोषणा की है कि दोनों देशों के बीच 1940 में स्थापित स्थायी संयुक्त रक्षा बोर्ड (Permanent Joint Board on Defence) को फिलहाल स्थगित किया जा रहा है. इस फैसले को अमेरिका-कनाडा सैन्य सहयोग के इतिहास में एक महत्वपूर्ण और असामान्य कदम माना जा रहा है.

यह बोर्ड क्या है और क्यों महत्वपूर्ण है?

स्थायी संयुक्त रक्षा बोर्ड की स्थापना द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ओग्डेंसबर्ग समझौते के तहत की गई थी. इसका उद्देश्य अमेरिका और कनाडा के बीच रक्षा रणनीति, सुरक्षा नीति और उत्तरी अमेरिकी महाद्वीप की सुरक्षा को लेकर समन्वय स्थापित करना था. यह बोर्ड किसी प्रत्यक्ष सैन्य ऑपरेशन का हिस्सा नहीं है, बल्कि एक उच्च-स्तरीय सलाहकार मंच है, जो कई दशकों से कुछ विषयों पर गाइड करता रहा है. ये विषय हैं-

  • NORAD (North American Aerospace Defense Command) का समन्वय
  • उत्तरी अमेरिका की हवाई सुरक्षा रणनीति
  • रक्षा खरीद और तकनीकी सहयोग
  • नाटो (NATO) सहयोग में तालमेल

अमेरिकी रक्षा उप सचिव एल्ब्रिज कोल्बी ने सोशल मीडिया पोस्ट में दावा किया कि कनाडा अपनी रक्षा प्रतिबद्धताओं को लेकर “विश्वसनीय प्रगति” नहीं कर रहा है. उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका अब “बयानबाजी और वास्तविकता के बीच अंतर” को नजरअंदाज नहीं कर सकता. इस बयान के बाद अमेरिका ने बोर्ड की गतिविधियों को रोककर इसके भविष्य और उपयोगिता पर पुनर्मूल्यांकन शुरू कर दिया है.

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हालांकि विवाद के बीच कनाडा ने हाल ही में अपने रक्षा बजट में बड़ी बढ़ोतरी की है. प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के नेतृत्व में कनाडा ने 2025 में रक्षा पर लगभग 63.4 अरब डॉलर खर्च किए हैं. यह पहली बार है जब कनाडा ने NATO के निर्धारित लक्ष्य - GDP का 2% रक्षा खर्च को पूरा और पार किया है. सरकार का कहना है कि यह “पीढ़ियों में सबसे बड़ा रक्षा निवेश” है. इसके बावजूद अमेरिका का रुख सख्त दिखाई दे रहा है, जिससे दोनों देशों के बीच रणनीतिक भरोसे पर सवाल उठने लगे हैं.

इस फैसले की कनाडा में भी तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली है. पूर्व कंजर्वेटिव नेता एरिन ओ'टूल ने अमेरिका के इस कदम को “पूरी तरह गलत” बताया. उन्होंने कहा कि कनाडा हमेशा एक जिम्मेदार और भरोसेमंद सहयोगी रहा है और रहेगा. कई विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला न केवल कूटनीतिक तनाव को बढ़ा सकता है, बल्कि आने वाले सालों में रक्षा साझेदारी की दिशा भी बदल सकता है.

कार्लटन विश्वविद्यालय के अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ फेन ओस्लर हैम्पसन ने इस कदम को “अशुभ संकेत” बताया. उनके अनुसार, यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब कनाडा और अमेरिका दोनों को मिलकर उत्तरी अमेरिकी सुरक्षा ढांचे को मजबूत करने की जरूरत है. उन्होंने यह भी कहा कि यह बोर्ड अमेरिका के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह नीति-स्तर पर रक्षा सहयोग को दिशा देता है. उनके अनुसार, इस तरह का कदम अमेरिका के अपने राष्ट्रीय सुरक्षा हितों को भी प्रभावित कर सकता है.

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F-35 लड़ाकू विमान विवाद से जुड़ाव?

विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूरे विवाद के पीछे रक्षा खरीद से जुड़ा मुद्दा भी हो सकता है. कनाडा अभी भी लॉकहीड मार्टिन के F-35 लड़ाकू विमानों की खरीद पर अंतिम निर्णय नहीं ले पाया है. लॉकहीड मार्टिन द्वारा निर्मित 88 लड़ाकू विमानों के प्रस्ताव की समीक्षा चल रही है और इसी बीच अमेरिकी राजदूत की चेतावनी भी सामने आई है कि अगर कनाडा यह खरीद आगे नहीं बढ़ाता, तो द्विपक्षीय रक्षा संबंधों पर गंभीर असर पड़ सकता है.

NORAD और उत्तरी अमेरिका की सुरक्षा पर असर

विशेषज्ञों का मानना है कि इस बोर्ड की स्थगन से NORAD जैसी संयुक्त सुरक्षा व्यवस्थाओं पर भी अप्रत्यक्ष असर पड़ सकता है. NORAD अमेरिका और कनाडा की साझा हवाई रक्षा प्रणाली है, जो उत्तर अमेरिका की सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है.

इस फैसले से दोनों देशों के बीच रणनीतिक संवाद में कमी, रक्षा नीति समन्वय में देरी और सैन्य भरोसे में गिरावट जैसी स्थितियां पैदा हो सकती हैं.

वैश्विक संदर्भ में बढ़ता तनाव

यह घटनाक्रम ऐसे समय पर हुआ है जब वैश्विक स्तर पर पहले से ही भू-राजनीतिक तनाव बढ़ा हुआ है. विशेषकर मध्य पूर्व में ईरान और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर स्थिति संवेदनशील बनी हुई है. ऐसे समय में अमेरिका और कनाडा जैसे लंबे समय के सहयोगियों के बीच इस तरह का तनाव पश्चिमी रक्षा गठबंधन की स्थिरता पर सवाल खड़े करता है.

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