संयुक्त अरब अमीरात ने अपने हालिया कदमों से साफ संकेत दे दिया है कि वह पाकिस्तान-सऊदी अरब गठजोड़ के खिलाफ रणनीति बना रहा है. तेल उत्पादक देशों के संगठन OPEC से बाहर निकलने का उसका फैसला सऊदी अरब को बड़ा झटका देने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है. वहीं ये फैसला पाकिस्तान के लिए भी बड़ा मैसेज बनकर सामने आया है, जिसने पड़ोसी मुल्क की पेशानी पर निशान ला दिए हैं.
पाकिस्तान को झटका तो क्या भारत को लाभ?
इसे पूरे मामले को भारत के लिहाज से देखें तो सवाल उठता है कि क्या ये फैसला भारत के पक्ष में जा सकता है? असल में यूएई के इस फैसले से ग्लोबल मार्केट में तेल की सप्लाई बढ़ सकती है, जिससे कीमतों में कमी आ सकती है. इसका सीधा फायदा भारत जैसे आयात करने वाले देशों को मिल सकता है, क्योंकि उनका तेल खर्च कम होगा और महंगाई पर भी असर पड़ेगा. एक्सपर्ट्स के नजरिये को समझें तो यह कदम भारत की अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक साबित हो सकता है.
ऐसे में जहां भारत को सस्ते तेल और मजबूत ऊर्जा साझेदारी का फायदा मिल सकता है, वहीं पाकिस्तान के लिए यह स्थिति आर्थिक दबाव और रणनीतिक असहजता बढ़ाने वाली बन सकती है।”
UAE ने क्यों लिया ऐसा फैसला?
अब इस पूरे फैसले को कैनवस पर और बड़ा करके देखें तो नजर आता है कि इससे पहले कई घटनाक्रम तेजी से सामने आए. ईरान के साथ टकराव के दौरान यूएई को सीधे हमलों का सामना करना पड़ा, जबकि खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के देशों से उसे वह समर्थन नहीं मिला जिसकी उसे उम्मीद थी. वहीं, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एकतरफा युद्धविराम की घोषणा कर खुद को पीछे खींच लिया है, जिससे यूएई खुद को सैन्य रूप से असुरक्षित महसूस करने लगा.
रिपोर्ट्स के मुताबिक, इजराइल और अमेरिका की ओर से तेहरान पर हमलों के बाद सबसे ज्यादा जवाबी कार्रवाई का सामना यूएई को करना पड़ा. अबू धाबी के रक्षा मंत्रालय के अनुसार, 8 अप्रैल तक उसकी वायु रक्षा प्रणाली ने 537 बैलिस्टिक मिसाइल, 26 क्रूज मिसाइल और 2256 ड्रोन को इंटरसेप्ट किया.
पाकिस्तान को लेकर क्या है UAE की राय?
यूएई का मानना है कि पाकिस्तान ने मध्यस्थ की भूमिका निभाकर ईरान के खिलाफ सख्त रुख नहीं अपनाया, जिससे अबू धाबी में नाराजगी बढ़ी. विशेषज्ञों के अनुसार, यूएई इस संघर्ष को “ब्लैक-वाइट” की तरह देख रहा है, जहां बीच की कोई लाइन नहीं है. यही कारण है कि पाकिस्तान की मध्यस्थता उसे रास नहीं आई.
इसी नाराजगी के चलते यूएई ने पाकिस्तान से 3.5 अरब डॉलर का कर्ज समय से पहले लौटाने की मांग कर दी, जो पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार का बड़ा हिस्सा था. हालांकि बाद में सऊदी अरब ने पाकिस्तान को 3 अरब डॉलर का कर्ज देकर राहत दी और 5 अरब डॉलर की क्रेडिट लाइन देने का वादा किया.
पाकिस्तान और सऊदी के बीच रक्षा समझौता
सितंबर 2025 में पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच एक रक्षा समझौता भी हुआ, जिसके तहत पाकिस्तान जरूरत पड़ने पर रियाद की सुरक्षा के लिए अपने परमाणु और मिसाइल संसाधन दे सकता है. ईरान के हमलों के बाद पाकिस्तान ने सऊदी अरब को इस समझौते के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई.
UAE और भारत के मजबूत संबंध
इन घटनाओं के बीच खाड़ी देशों के भीतर दरार साफ नजर आने लगी है. जहां यूएई भारत के साथ मजबूत संबंध बनाए हुए है, वहीं सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच एक नए रणनीतिक गठजोड़ की चर्चा हो रही है. यमन और सूडान जैसे क्षेत्रों में भी सऊदी अरब और यूएई के बीच मतभेद बढ़े हैं.
यमन में 2015 के सैन्य हस्तक्षेप के दौरान दोनों देश साथ थे, लेकिन बाद में रणनीति को लेकर टकराव बढ़ गया. सऊदी अरब ने हूती विद्रोहियों के साथ राजनीतिक समाधान की कोशिश की, जबकि यूएई ने अलगाववादियों का समर्थन किया. इसी तरह, सूडान में भी दोनों देश अलग-अलग गुटों का समर्थन कर रहे हैं.
तेल उत्पादन को लेकर भी दोनों देशों के बीच मतभेद सामने आए हैं. दशकों से सऊदी अरब OPEC का नेतृत्व करता रहा है, लेकिन यूएई अब अपने उत्पादन पर किसी तरह की पाबंदी नहीं चाहता. OPEC से बाहर निकलने के बाद यूएई अब अपनी पूरी क्षमता से तेल उत्पादन कर सकेगा, जो वैश्विक बाजार में उसके लिए आर्थिक रूप से फायदेमंद हो सकता है.
सऊदी के साये में नहीं रहना चाहता UAE
यूएई के ऊर्जा मंत्री सुनील मोहम्मद अल माजुरी ने कहा कि यह फैसला देश की दीर्घकालिक ऊर्जा रणनीति और बाजार की जरूरतों के अनुरूप लिया गया है. वहीं उद्योग मंत्री सुल्तान अल जाबर ने इसे राष्ट्रीय हित और वैश्विक ऊर्जा स्थिरता के लिहाज से जरूरी कदम बताया.
करीब 59 साल बाद OPEC से अलग होने का यूएई का यह फैसला वैश्विक राजनीति और ऊर्जा बाजार में बड़े बदलाव का संकेत माना जा रहा है. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि सऊदी अरब के साथ उसके संबंध पूरी तरह खत्म हो गए हैं. दोनों देश अब भी बड़े व्यापारिक साझेदार हैं और GCC के सदस्य हैं. लेकिन इतना तय है कि अबू धाबी ने यह साफ कर दिया है कि वह अब सऊदी नेतृत्व के साए में रहने को तैयार नहीं है. मौजूदा युद्ध, नाकेबंदी और बदलते गठजोड़ के बीच यूएई का यह कदम खाड़ी राजनीति में नए समीकरणों की शुरुआत कर सकता है.