दुनिया इस वक्त एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां शांति की बातें तो बस कहने-सुनने के लिए रह गई हैं, असली चर्चा तो एटम बम की हो रही है. अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की जो आक्रामक नीतियां रही हैं और हाल के दिनों में जिस तरह के तनाव बढ़े हैं, उसने माहौल ऐसा बना दिया है कि अब कई देश दबी जुबान में नहीं, बल्कि खुलकर सोचने लगे हैं कि क्या, हमें भी परमाणु ताकत बन जाना चाहिए?
अटलांटिक महासागर से लेकर प्रशांत महासागर तक, यह बहस अब बंद कमरों की फाइलों से निकलकर सड़कों और न्यूज चैनलों की खुली चर्चा बन गई है. जापान टाइम्स की मानें तो ट्रंप जिस तरह से अपने दुश्मनों पर हमलावर रहते हैं और अपने ही दोस्तों को किनारा कर देते हैं, उससे दुनिया में एक अजीब सा डर बैठ गया है. सबको लग रहा है कि मुसीबत पड़ने पर शायद अमेरिका साथ न दे, इसलिए अपना इंतजाम खुद ही करना बेहतर है.
जर्मनी और पोलैंड जैसे देश, जो दशकों से बड़े आराम से अमेरिका के 'न्यूक्लियर अम्ब्रेला' (परमाणु सुरक्षा कवच) के भरोसे बैठे थे, अब बुरी तरह सकपकाए हुए हैं. जब ट्रंप ने ग्रीनलैंड खरीदने जैसी अजीब बातें कीं और यूरोप की सुरक्षा से हाथ खींचने के संकेत दिए, तभी से इन देशों को समझ आ गया कि अब पुराने रिश्तों के भरोसे बैठना ठीक नहीं. यही वजह है कि जब फ्रांस ने अपनी परमाणु सुरक्षा को पूरे यूरोप तक बढ़ाने का इशारा किया, तो जर्मनी और पोलैंड ने उसे हाथों-हाथ लिया. मतलब साफ है, अब भरोसा वॉशिंगटन से हटकर अपनी खुद की मसल पावर बढ़ाने पर जा रहा है.
अब जरा इस पूरे मामले को सिलसिलेवार तरीके से (Step-by-Step) समझिए. एक तरफ अमेरिका ईरान को आंखें दिखा रहा है कि तुम अपना परमाणु कार्यक्रम बंद करो, वरना खैर नहीं. लेकिन दूसरी तरफ, वही अमेरिका सऊदी अरब को यूरेनियम संवर्धन की वैसी ही टेक्नोलॉजी देने पर विचार कर रहा है. इसे लेकर एक्सपर्ट्स भी सिर खुजला रहे हैं. उनका कहना है कि ये तो सीधा-सीधा 'डबल स्टैंडर्ड' है. आप एक को बम बनाने से रोक रहे हैं और दूसरे के लिए रास्ता साफ कर रहे हैं.
दुनिया कितनी खतरनाक मोड़ पर खड़ी है, इसका अंदाजा इसी से लगाइए कि वैज्ञानिकों की 'डूम्सडे क्लॉक' अब 12 बजने (महाविनाश) से महज 85 सेकंड दूर है. इसे आसान भाषा में समझें तो, इस प्रतीकात्मक घड़ी में 12 बजने का मतलब है दुनिया का अंत. फिलहाल यह घड़ी 11 बजकर 58 मिनट 35 सेकंड पर टिक-टिक कर रही है. यानी इंसानियत तबाही के इतने करीब पहले कभी नहीं थी. इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी (IAEA) के चीफ राफेल ग्रॉसी भी बार-बार चेतावनी दे रहे हैं कि अगर और ज्यादा देशों के पास परमाणु हथियार आ गए, तो दुनिया सुरक्षित नहीं होगी, बल्कि एक ऐसे बारूद के ढेर पर बैठ जाएगी जहां एक छोटी सी चिंगारी सब खत्म कर देगी.
अभी दुनिया में 9 देशों के पास परमाणु बम है, लेकिन 20 से ज्यादा देश ऐसे हैं जिनके पास पैसा, दिमाग और संसाधन सब हैं कि वे जब चाहें इस क्लब में शामिल हो सकते हैं. रिपोर्ट्स कहती हैं कि ईरान के पास इस वक्त इतना यूरेनियम जमा हो चुका है कि वह कागजों पर करीब एक दर्जन परमाणु हथियार बनाने की ताकत रखता है. यही वो बात है जिसने इजरायल और अमेरिका की नींद उड़ा रखी है.
अगर पड़ोसी ने बनाया, तो मैं क्यों पीछे रहूं?
सबसे बड़ा खतरा उस चेन रिएक्शन का है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में 'प्रोलिफरेशन कास्केड' कहते हैं. आसान भाषा में कहें तो यह एक ऐसी दौड़ है, जिसमें कोई पीछे नहीं रहना चाहता. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर दक्षिण कोरिया ने परमाणु हथियार की दिशा में कदम बढ़ाया, तो जापान भी चुप नहीं बैठेगा. जापान आगे बढ़ेगा तो ताइवान पर भी दबाव बढ़ेगा और अगर ऐसा हुआ, तो चीन की चिंता और आक्रामकता दोनों बढ़ सकती हैं, जिससे क्षेत्र में तनाव और खतरनाक स्तर तक पहुंच सकता है.
मिडिल ईस्ट का हाल तो और भी बुरा है. अगर ईरान ने बम हासिल किया, तो सऊदी अरब ने पहले ही कह रखा है कि वह भी पीछे नहीं रहेगा. आज छोटे देशों को ये लगने लगा है कि परमाणु बम ही उनकी असली 'लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी' है. उनके सामने यूक्रेन और लीबिया जैसे उदाहरण हैं, जिन्होंने हथियार छोड़े और बाद में उनका क्या हाल हुआ, ये पूरी दुनिया ने देखा. बस यही सोच दुनिया को एक बहुत ही खतरनाक मोड़ पर ले जा रही है.
एशिया में भी माहौल बदल रहा है. सर्वे के मुताबिक, दक्षिण कोरिया के 75% से ज्यादा लोग अब अपना खुद का परमाणु बम चाहते हैं. जापान, जिसने हिरोशिमा और नागासाकी का दर्द झेला है, वहां भी अब बम रखने की चर्चा तेज हो गई है. चीन की बढ़ती ताकत और अमेरिका के बदलते रुख ने जापान को अपनी पुरानी शांतिवादी नीति पर फिर से सोचने को मजबूर कर दिया है. चीन भी इस पर पैनी नजर रखे हुए है और उसने चेतावनी दी है कि जापान के पास पहले से ही काफी प्लूटोनियम है, जिसे वह कभी भी हथियार में बदल सकता है.
अमेरिका पर से उठ गया है भरोसा?
यूरोप में भी अब हवा पूरी तरह बदल चुकी है. फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने हाल ही में एक बड़ी बात कही थी कि 'अगर आजाद रहना है, तो ताकतवर होना पड़ेगा.' फ्रांस अब अपनी परमाणु शक्ति को और बढ़ाने और यूरोपीय देशों के साथ तालमेल बिठाने में लगा है. जर्मनी के चांसलर भी अब फ्रांस के साथ गोपनीय बातचीत कर रहे हैं ताकि यूरोप की अपनी एक अलग सुरक्षा दीवार खड़ी की जा सके.
ब्रिटेन में भी अब यह मांग उठ रही है कि वे अपनी मिसाइलें खुद बनाएं ताकि उन्हें छोटी-बड़ी बात के लिए अमेरिका का मुंह न ताकना पड़े. रूस इन सारी हरकतों को सीधा उकसावा मान रहा है. रूस का कहना है कि नाटो (NATO) देश मिलकर जो ये परमाणु बिसात बिछा रहे हैं, उसका नतीजा अच्छा नहीं होगा.
कुल मिलाकर बात ये है कि हर देश खुद को सुरक्षित करने की होड़ में लगा है, लेकिन हकीकत में वे पूरी दुनिया को और ज्यादा असुरक्षित बना रहे हैं. ट्रंप की नीतियां हों, ईरान पर बढ़ता दबाव हो या एशिया और यूरोप में बदलती ये नई रणनीतियां, ये सब मिलकर एक ऐसा जाल बुन रही हैं जहां से बाहर निकलना नामुमकिन लग रहा है. अब सवाल सिर्फ ये है कि क्या हम इस तबाही के रास्ते से वापस मुड़ेंगे, या फिर इंसानियत खुद ही अपने विनाश का बटन दबाने वाली है?