गाजा के मुद्दे पर मुस्लिम दुनिया में पनपे आक्रोश और भावनात्मक उबाल के बीच पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के लिए यह त्रासदी एक राजनीतिक अवसर में बदलती दिखी. गाजा में कथित तौर पर शांति स्थापित करने और पुनर्निर्माण के लिए बने 'बोर्ड ऑफ पीस' ने शहबाज को घरेलू दबावों से उबरने और अंतरराष्ट्रीय मंच पर खुद को फिर से प्रासंगिक दिखाने का मौका दिया है.
गाजा में 65 हजार मौतों के बाद स्विटजरलैंड के दावोस शहर में 'बोर्ड ऑफ पीस' की लॉन्चिंग हुई. इस मौके पर 20 देशों के प्रतिनिधि नजर आए. इसके पाकिस्तान समेत 8 तो मुस्लिम देश थे. लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप के कानों में फुसफुसाते शहबाज शरीफ की तस्वीर की अच्छी खासी चर्चा हुई. गाजा के पुनर्निर्माण का चाहे जो भी हो लेकिन ट्रंप के नजदीक आने का मौका तलाश रहे शहबाज ने आखिर अपने इगो को बूस्ट कर ही लिया.
दावोस से आए इस वीडियो में शहबाज शरीफ ट्रंप से हाथ मिलाकर उनके कान में फुसफुसाते दिखे. ट्रंप ने भी कान लगाकर उनकी बात सुनी और फिर कंधा थपथपया. हालांकि दोनों के बीच क्या बात हुई, ये जानकारी नहीं मिली है.
इस मुलाकात की खास बात यह रही कि दावोस में पाकिस्तान के आर्मी चीफ आसिम मुनीर के मौजूद होने के बावजूद सारा फोकस शहबाज शरीफ पर ही रहा.
अन्य मुलाकातों में ट्रंप के 'फेवरिट जनरल' आसिम मुनीर सारी महफिल लूट ले जाते थे, लेकिन इस बार शहबाज ने ऐसा जुगाड़ लगाया कि ट्रंप आसिम मुनीर को मंच पर बुला ही नहीं पाए. दरअसल 'बोर्ड ऑफ पीस' के मंच पर हर देश का एक ही नेता मौजूद था और आसिम मुनीर दर्शक दीर्घा में मौजूद थे. इसलिए सारा फुटेज शहबाज को ही मिला.
बता दें कि इससे पहले 23 सितंबर 2025 को शहबाज शरीफ ने न्यूयॉर्क में ट्रंप से मुलाकात की थी, लेकिन ये मुलाकात 36 सेकेंड ही चली थी. इसके बाद पाकिस्तान के पीएम शहबाज शरीफ डोनाल्ड ट्रंप से मिलने का मौका लगातार तलाश रहे थे.
ट्रंप और शहबाज की अगली मुलाकात अक्टूबर में मिस्र के शर्म अल शेख में हुई. ये मौका भी गाजा पीस समिट का था. यहां भी शहबाज शरीफ ने ट्रंप को शांति का मसीहा बताया और नोबेल शांति पुरस्कार के लिए उनका नाम आगे बढ़ाया. इस दौरान शहबाज ने कहा था कि ट्रंप इस सम्मान के लिए "सबसे सच्चे और सबसे शानदार उम्मीदवार" हैं.
हालांकि इसी दौरान ट्रंप ने मुनीर को 'फेवरिट जनरल' कहकर शरीफ का हाजमा खराब कर दिया था.
ट्रंप से शहबाज की मुलाकात आर्थिक और घरेलू संकट में डूबे पाकिस्तान को वर्ल्ड पॉलिटिक्स में 'भरोसेमंद' और 'प्रासांगिक' बनाता है. इसलिए शहबाज को ऐसी तस्वीरों की शिद्दत से तलाश रहती है. इसलिए शहबाज ट्रंप से मिलने की वजह तलाश ही रहे थे.
आखिरकार उनकी आरजू 22 जनवरी को पूरी हुई. लेकिन इस मुलाकात ने पाकिस्तान और शहबाज के विरोधाभासों को उजागर कर दिया.
गाजा की आवाज पाकिस्तान में बहुत संवेदनशील मुद्दा है. 99% लोग इजरायल की कार्रवाइयों की निंदा करते हैं. और इसके लिए कुछ भी कर गुजरने का ऐलान करते रहते हैं.
लेकिन ट्रंप की छत्र छाया पाने के लिए शहबाज शरीफ ने गाजावासियों की पीड़ा का प्रत्यक्ष उदाहरण 'बोर्ड ऑफ पीस' का न सिर्फ मेंबर बनना स्वीकार किया. बल्कि इस क्लब में शामिल होने के लिए 1 बिलियन डॉलर देना भी स्वीकार कर लिया. जैसा कि ट्रंप ने इस बोर्ड की मेंबरशिप फी रखी है.
शहबाज शरीफ जब ट्रंप के साथ 'बोर्ड ऑफ पीस' के मंच पर थे उसी वक्त अमेरिका के राष्ट्रपति घोषणा कर रहे थे कि अगर हमास ने हथियार नहीं डाले तो ट्रंप हमास के परखच्चे उड़ा देंगे. गौरलतब है कि इस बोर्ड का एक सदस्य इजरायल भी है. इजरायल और पाकिस्तान की दुश्मनी का आलम यह है कि पाकिस्तान ने अबतक इजरायल को मान्यता नहीं दी है. लेकिन चूंकि 'बोर्ड ऑफ पीस' में शामिल होने से पाकिस्तानी नेतृत्व को अमेरिका के आस-पास भटकने का मौका मिल जाता है, इसलिए सालों पुराने नीतिगत मुद्दे से डिरेल होते हुए शहबाज ने गाजा के मुद्दे पर उस ग्रुप में शामिल हो गया है जिसका चीफ अमेरिकन राष्ट्रपति है और जिसका एक अहम मेंबर इजरायल है.
पाकिस्तान के इस डिप्लोमैटिक कदम पर संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान की राजदूत रह चुकी मलीहा लोधी ने पाक सरकार की तीखी आलोचना करते हुए इसे शहबाज शरीफ द्वारा ट्रंप की बूट पॉलिश करार दिया है. मलीहा लोधी ने कहा है कि क्या ऐसे में सवाल उठता है कि क्या ट्रंप को खुश करना सिद्धांतों पर टिके रहने से ज्यादा अहम हो गया है?
पाकिस्तान के विपक्ष का कहना है शहबाज ने अमेरिका के सामने सरेंडर कर दिया है. लेकिन विपक्ष के आरोपों को अनसुना कर शहबाज ने गाजा संकट का इस्तेमाल अपनी छवि चमकाने में की, जहां वे खुद को 'कूटनीतिक विजेता', 'इस्लामी हितों का रक्षक' और 'अमेरिका से डील करने वाले स्मार्ट लीडर' बताते हैं. ये बात अलग है कि मात्र एक सप्ताह पहले गाजा में सर्दी की वजह से 9 बच्चों समेत 25 लोगों की मौत हो चुकी है.