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ट्रंप को आगे कर ईरान को तबाह करना चाहते हैं खाड़ी देश? जंग के बीच चुप्पी का क्या है राज

खाड़ी देशों और ईरान के बीच जारी संघर्ष ने अब एक नया मोड़ ले लिया है. एक तरफ ईरान ने खाड़ी देशों पर हजारों हमले किए हैं तो दूसरी तरफ ये देश खुद जवाबी कार्रवाई करने के बजाय अमेरिका पर ईरान की सैन्य क्षमता को पूरी तरह खत्म करने का भारी दबाव बना रहे हैं.

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क्या ट्रंप पर ईरान पर भीषण हमले के लिए दबाव बना रहे हैं खाड़ी देश?. (Photo: AP)
क्या ट्रंप पर ईरान पर भीषण हमले के लिए दबाव बना रहे हैं खाड़ी देश?. (Photo: AP)

मिडिल ईस्ट में जारी भीषण युद्ध के 18वें दिन ईरान ने संयुक्त अरब अमीरात (UAE), सऊदी अरब, कतर, कुवैत, ओमान और बहरीन पर हमलों की झड़ी लगा दी है. ईरान अब तक इन देशों पर 867 मिसाइलों और 2,500 से अधिक कामिकाज़ी ड्रोन समेत कुल 3,500 से ज्यादा हमले कर चुका है. औसतन हर घंटे नौ हमले झेलने के बावजूद ये छह मुस्लिम देश खुद जवाबी कार्रवाई करने से बच रहे हैं. वहीं, जानकारों का कहना है कि ये देश ईरान पर जवाबी हमले करके युद्ध को और भड़काना नहीं चाहते, इसीलिए अब तक मिडिल ईस्ट के इन देशों ने ईरान पर कोई पलटवार नहीं किया है.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट में दावा है कि ये देश पर्दे के पीछे से अमेरिका पर दबाव बना रहे हैं कि वह अपनी पूरी ताकत का इस्तेमाल कर ईरान की सैन्य शक्ति को मटियामेट कर दे. खाड़ी देशों को डर है कि यदि इस बार ईरान की क्षमता खत्म नहीं की गई तो भविष्य में वह उनके कच्चे तेल की आपूर्ति को स्थायी रूप से बाधित कर देगा.

दर्शक न बने खाड़ी देश

अमेरिका ईरान पर हमला जारी रखने के लिए तैयार है, लेकिन उसने सऊदी अरब और यूएई जैसे देशों के सामने एक कड़ी शर्त रखी है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का प्रशासन चाहता है कि ये देश केवल दर्शक न बने रहें, बल्कि इस युद्ध में सक्रिय रूप से शामिल होकर अमेरिका के साथ साझा हमले करें.

हालांकि, रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, अब तक किसी भी खाड़ी देश ने अमेरिका के साथ सीधे युद्ध में उतरने पर सहमति नहीं जताई है. वो चाहते हैं कि अमेरिका अकेले ही इस काम को अंजाम दे और ईरान को दशकों पीछे धकेल दे, ताकि वह दोबारा सिर न उठा सके.

पुरानी है सऊदी और ईरान की दुश्मनी

सऊदी अरब और ईरान के बीच कट्टर दुश्मनी के कई गहरे कारण हैं, जिनमें सबसे प्रमुख शिया और सुन्नी विचारधारा का टकराव है. सऊदी अरब सुन्नी बहुल है, जबकि ईरान शिया बहुल देश है.

वॉशिंगटन पोस्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार, सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने ही अमेरिका को इस युद्ध के लिए प्रेरित किया था. दोनों देश मिडिल ईस्ट की एकमात्र महाशक्ति बनना चाहते हैं. इसके अलावा ईरान सऊदी अरब के 'अल-सऊद' राजवंश के शासन को गैर-इस्लामिक मानता है, जबकि सऊदी अरब ईरान की कट्टरपंथी व्याख्या को गलत मानता है.

बता दें कि सऊदी अरब का इतिहास मात्र 94 साल पुराना है, पहले सऊदी अरब का भूभाग अलग अलग हिस्सों में बंटा हुआ था, जहां कई कबीले रहते थे. इनमें रियाद, नज़्द और हिजाज़ जैसे इलाके प्रमुख थे. इनमें भी अलग अलग इलाकों पर कई कबीलों का शासन था और इन्हीं में से एक कबीले को अल-सऊद कहते थे.

इस अल-सऊद राजवंश में इब्न सऊद का जन्म हुआ, जिन्हें सत्ता संघर्ष में हार के कारण निर्वासित होकर कुवैत जाना पड़ा. कहते हैं कि 26 साल की उम्र में इब्न सऊद ने एक सेना के साथ रियाद पर हमला किया और साल 1902 में उस पर कब्जा कर लिया.

रियाद के बाद इब्न सऊद ने नज़्द और हिजाज़ जैसे इलाकों पर कब्जा किया और साल 1925 में मक्का और मदीना को भी अपने अधिकार क्षेत्र में मिला लिया.

इसके बाद 1932 में जब इब्न सऊद का कब्जा अरब के एक बड़े भू-भाग पर हो गया, तब उन्होंने इस पूरे इलाके को मिला कर साल 1932 में सऊदी अरब नाम का देश बनाया. इसमें सऊदी नाम इब्न सऊद के राजवंश से मिला. इब्न सऊद सऊदी अरब के पहले राजा बने और तब से लेकर आजतक उनका परिवार ही सऊदी अरब पर राज कर रहा है. सऊदी अरब के मौजूदा किंग शाह सलमान इब्न सऊद के ही बेटे हैं, जबकि क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान शाह सलमान के बेटे हैं. अब सऊदी अरब में अल-सऊद राजवंश का शासन है. इसलिए ईरान सऊदी अरब को सच्चा इस्लामिक देश नहीं मानता है और 'क्राउन प्रिंस' मोहम्मद बिन सलमान इसी वजह से ईरान से नफरत करते हैं.

वो ये कहते हैं कि ईरान जिस तरह से धार्मिक कट्टरवाद को अपने देश की जनता पर थोपता है, वो असली इस्लाम धर्म नहीं है.

इसकी जगह क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान इस्लाम धर्म को प्रगतिशील सोच से जोड़ते हैं. इसके लिए उन्होंने अपने देश में महिलाओं के लिए नौकरी के अवसर बढ़ाए हैं और उन्हें काम करने का कानूनी अधिकार दिया है और वो ये भी कहते हैं कि ईरान इस्लाम धर्म की गलत व्याख्या कर रहा है. वह ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामेनेई को 'आज का हिटलर' मानते हैं और क्षेत्र में उनके विस्तारवाद को रोकने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं.

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सऊदी की पेट्रोलाइन

ईरान ने बार-बार स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद करने की धमकी दी है, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति ठप हो सकती है. हालांकि, सऊदी अरब ने इसकी काट ढूंढ ली है. सऊदी अरब अपनी 1,200 किलोमीटर लंबी 'ईस्ट-वेस्ट पेट्रोलाइन' के जरिए फारस की खाड़ी से लाल सागर के यानबू बंदरगाह तक रोजाना 50 लाख बैरल तेल पहुंचा सकता है. इस पाइपलाइन के जरिए सऊदी अरब अपना 46 प्रतिशत तेल निर्यात सुरक्षित रख सकता है. यही कारण है कि सऊदी अरब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बंद होने से ज्यादा चिंतित नहीं है और अमेरिका को युद्ध जारी रखने के लिए उकसा रहा है.

इससे आप समझ सकते हैं कि सऊदी अरब क्यों अपने कच्चे तेल को लाल सागर तक ले जाने के लिए पेट्रोलाइन का इस्तेमाल करने वाला है.

तेल उत्पादन में अमेरिका का वर्चस्व 

उधर, दुनिया के तेल उत्पादन के आंकड़ों पर नजर डालें तो अमेरिका 20.8 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ पहले स्थान पर है जो रोजाना 2 करोड़ बैरल तेल का उत्पादन करता है. अमेरिका के बाद सऊदी अरब 1.09 करोड़ बैरल के साथ दूसरे नंबर पर है. इसके बाद रशिया प्रति दिन 1 करोड़ 8 लाख बैरल, कनाडा 59 लाख बैरल, ईरान 51 लाख बैरल, इराक 44 लाख बैरल, चीन 43 लाख बैरल, UAE 40 लाख बैरल, ब्राज़ील 35 लाख बैरल और कुवैत हर दिन 27 लाख बैरल कच्चे तेल का उत्पादन करता है.

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