लेबनान और इज़रायल ने मंगलवार को वॉशिंगटन में दशकों बाद अपनी पहली सीधी कूटनीतिक बातचीत की. यह बातचीत इज़रायल और ईरान-समर्थित हिज़्बुल्लाह के बीच एक महीने से ज़्यादा वक्त तक चली जंग के बाद हुई. अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने इसे एक ऐतिहासिक मौका बताया, लेकिन साथ ही चेतावनी भी दी है कि इसमें किसी तत्काल सफलता की उम्मीद नहीं है.
दो घंटे से ज़्यादा वक्त तक चली यह बैठक, दो ऐसे देशों के बीच जुड़ाव का एक दुर्लभ मौका थी, जो तकनीकी रूप से दशकों से युद्ध की स्थिति में हैं और ज़्यादातर अप्रत्यक्ष संचार पर ही निर्भर रहे हैं.
अमेरिका में इज़रायल के राजदूत येचिएल लीटर ने इन बातचीत को बेहद सकारात्मक शब्दों में बताया और इस बात की ओर इशारा किया कि लेबनान में हिज़्बुल्लाह की भूमिका को लेकर दोनों पक्षों के विचारों में एक समानता देखने को मिली.

लाइटर ने कहा, "लेबनानी सरकार ने यह बिल्कुल साफ़ कर दिया है कि अब वे हिज़्बुल्लाह के कब्ज़े में नहीं रहेंगे. ईरान कमज़ोर पड़ गया है. हिज़्बुल्लाह भी काफ़ी हद तक कमज़ोर हो गया है."
'हम एक ही तरफ हैं'
लाइटर ने कहा कि चर्चाओं से दोनों पक्षों के बीच एक अप्रत्याशित तालमेल सामने आया, भले ही सालों से उनके बीच दुश्मनी और लगातार संघर्ष चल रहा था. उन्होंने कहा, "आज हमें पता चला कि हम एक ही तरफ हैं. यह सबसे सकारात्मक बात है, जो हमें इन चर्चाओं से मिली है." उन्होंने आगे कहा, "हम दोनों लेबनान को ईरान के दबदबे वाले कब्ज़ा करने वाले गुट हिज़्बुल्लाह से आज़ाद कराने के मामले में एकजुट हैं."
ये बयान बातचीत के एक मुख्य विषय की तरफ इशारा करती हैं. हिज़्बुल्लाह के प्रभाव को लेकर दोनों पक्षों की साझा चिंता है, भले ही दोनों देश बड़ी राजनीतिक और सुरक्षा मुद्दों पर अभी भी बंटे हुए हैं. हालांकि, लेबनान की तरफ से इस पर तत्काल कोई टिप्पणी नहीं आई. लेबनान का प्रतिनिधित्व वॉशिंगटन में उसकी राजदूत नाडा हमादेह मोअवाद ने किया था.
यह भी पढ़ें: इजरायल-लेबनान में युद्धविराम पर बनेगी बात? 33 साल बाद हो रही वार्ता का हिज्बुल्लाह ने किया बॉयकॉट
ज़मीनी हक़ीक़त क्या है?
कूटनीतिक पहल के बावजूद, ज़मीनी हालात अभी भी तनावपूर्ण बने हुए हैं. हिज़्बुल्लाह ने इन वार्ताओं का विरोध किया था और इस बातचीत में उसका कोई प्रतिनिधित्व नहीं था. वह उत्तरी इज़रायल पर लगातार हमले कर रहा है. वहीं, दूसरी ओर, इज़रायली सेना दक्षिणी लेबनान में अपना अभियान जारी रखे हुए है.
न तो इज़रायल और न ही पश्चिमी देशों के समर्थन वाली लेबनानी सेना हिज़्बुल्लाह को ज़बरदस्ती निहत्था कर पाई है. हिज़्बुल्लाह के पास पूरे लेबनान में अभी भी काफ़ी सैन्य ताक़त और राजनीतिक प्रभाव मौजूद है.
वार्ताओं में इस समूह की अनुपस्थिति किसी भी संभावित समझौते की सीमाओं को उजागर करती है, क्योंकि इस संघर्ष और भविष्य में होने वाले किसी भी समाधान में इसकी भूमिका केंद्रीय बनी हुई है.