अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जारी जंग अब एक नए और बेहद खतरनाक चरण में पहुंचती नजर आ रही है. हाल ही में सामने आई जानकारी के मुताबिक, ईरान इस संघर्ष को "एनर्जी वॉर" में बदलने की रणनीति पर काम कर रहा है. इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ने चार बड़े टारगेट तय किए हैं, जिनके जरिए अमेरिका और इजरायल को रणनीतिक रूप से नुकसान पहुंचाने की योजना बनाई गई है.
स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान अब साफ तौर पर "एनर्जी डिटरेंस" यानी ऊर्जा पर हमला कर जवाब देने की नीति अपना रहा है. इसका मतलब यह है कि अगर उसके ऊर्जा ठिकानों को निशाना बनाया गया, तो वह पूरे क्षेत्र की ऊर्जा व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है.
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1. सबसे पहला और सबसे अहम कदम है स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को “दुश्मनों” के लिए बंद रखना. यह समुद्री मार्ग दुनिया की करीब 20% तेल सप्लाई के लिए बेहद महत्वपूर्ण है. अगर इसे पूरी तरह बंद किया जाता है, तो इसका असर सिर्फ अमेरिका या इजरायल तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी. तेल और गैस की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है और कई देशों में ऊर्जा संकट गहरा सकता है.
2. दूसरा बड़ा टारगेट इजरायल की बिजली व्यवस्था है. ईरान की योजना के मुताबिक, इजरायल के पांच प्रमुख पावर प्लांट्स—ओरोट रॉबिन, रुटेनबर्ग, हागिट, एशकोल और दलिया—को निशाना बनाया जा सकता है. ये सभी मिलकर देश की 50% से ज्यादा बिजली की जरूरत पूरी करते हैं. इन पर हमले से इजरायल की ऊर्जा सप्लाई बुरी तरह प्रभावित हो सकती है.
3. तीसरा टारगेट अमेरिका से जुड़े आर्थिक हित हैं. ईरान की रणनीति के तहत उन कंपनियों और परियोजनाओं को निशाना बनाया जा सकता है, जिनमें अमेरिकी कंपनियों की भागीदारी है. उदाहरण के तौर पर ADNOC ड्रिलिंग, सऊदी अरामको के साथ जुड़े प्रोजेक्ट्स, और ExxonMobil व Baker Hughes जैसी कंपनियों की भागीदारी वाले ऊर्जा प्रोजेक्ट्स खतरे में आ सकते हैं.
4. चौथा और सबसे व्यापक टारगेट खाड़ी देशों की ऊर्जा संरचना है, खासकर वे देश जहां अमेरिकी सैन्य ठिकाने मौजूद हैं. ईरान की नजर यूएई के बरकाह न्यूक्लियर पावर प्लांट, कतर के उम्म अल हौल और रास लफ्फान जैसे बड़े ऊर्जा केंद्रों पर है. अगर इन पर हमला होता है, तो पूरे क्षेत्र में बिजली, पानी और औद्योगिक गतिविधियां ठप पड़ सकती हैं.
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अगर यह रणनीति लागू होती है, तो इसके प्रभाव बेहद व्यापक होंगे. होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने से वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं. इसके अलावा, खाड़ी देशों में मौजूद डीसैलिनेशन प्लांट्स, जो समुद्र के पानी को पीने योग्य बनाते हैं, बिजली पर निर्भर होते हैं. ऐसे में बिजली बाधित होने पर पानी का भी गंभीर संकट पैदा हो सकता है.
फिलहाल बड़े स्तर पर इस योजना को अमल में नहीं लाया गया है और कूटनीतिक बातचीत जारी बताई जा रही है. लेकिन जिस तरह दोनों पक्ष खुले तौर पर ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाने की बात कर रहे हैं, उससे साफ है कि हालात काफी बिगड़ सकते हैं.
यह चार-स्तरीय रणनीति इस बात का संकेत है कि जंग अब सिर्फ सैन्य ठिकानों तक सीमित नहीं रही. यह ऊर्जा, व्यापार और आम लोगों की जिंदगी को सीधे प्रभावित करने वाले चरण में प्रवेश कर चुकी है. अगर यह योजना जमीन पर उतरती है, तो इसके असर मिडिल ईस्ट से कहीं आगे पूरी दुनिया तक महसूस किए जाएंगे.