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ईरान में तो नहीं लेकिन जंग चलती रही तो इस अरब मुल्क में जरूर हो सकता है 'रिजीम चेंज'

मिडिल ईस्ट जंग का असर बहरीन में दिख रहा है. शिया समुदाय के विरोध प्रदर्शन, गिरफ्तारियां और कस्टडी में मौत के बाद हालात तनावपूर्ण हो गए हैं. बहरीन में शिया समुदाय की आबादी कमोबेश 60% है लेकिन सत्ता कम आबादी वाले सुन्नी समुदाय के शासक के हाथों में है.

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बहरीन में शिया समुदाय की आबादी ज्यादा है और सत्ता सुन्नी शासक के हाथ में है. (Photo- ITG)
बहरीन में शिया समुदाय की आबादी ज्यादा है और सत्ता सुन्नी शासक के हाथ में है. (Photo- ITG)

अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जारी जंग का असर अब सीधे बहरीन के भीतर दिखाई देने लगा है. जहां एक तरफ ईरान में सत्ता परिवर्तन की चर्चा हो रही है, वहीं बहरीन में आंतरिक अस्थिरता तेजी से बढ़ती नजर आ रही है. शिया समुदाय के लोग सड़कों पर उतर आए हैं और हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि सरकार को सख्त कार्रवाई करनी पड़ी है. 

रिपोर्ट्स के मुताबिक, 28 फरवरी से शुरू जंग के बाद से बहरीन में अब तक 200 से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है, जिनमें ज्यादातर शिया मुस्लिम शामिल हैं. इन गिरफ्तारियों के पीछे आरोप देशद्रोह, जासूसी, दुश्मन से सहयोग और राजशाही के खिलाफ नफरत फैलाने जैसे गंभीर हैं.

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तनाव उस वक्त और बढ़ गया जब 32 वर्षीय शिया एक्टिविस्ट मोहम्मद अलमोसावी की पुलिस हिरासत में मौत हो गई. मानवाधिकार संगठनों ने इस मौत पर सवाल उठाते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की है. आरोप लगाए जा रहे हैं कि हिरासत के दौरान उनके साथ यातना दी गई, जिससे हालात और भड़क गए.

शिया समुदाय की आबादी ज्यादा, सत्ता सुन्नी के हाथ में

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दरअसल, बहरीन की सामाजिक संरचना लंबे समय से संवेदनशील रही है. यहां आबादी का बड़ा हिस्सा (कमोबेश 60%) शिया समुदाय का है, लेकिन सत्ता सुन्नी शासकों के हाथ में है. यही असंतुलन कई बार विरोध की वजह बनता रहा है. मौजूदा जंग ने इस पुराने घाव को फिर से हरा कर दिया है.

रिपोर्ट्स की मानें तो बहरीन इंस्टीट्यूट फॉर राइट्स एंड डेमोक्रेसी जैसे संगठनों का कहना है कि देश में "डर और आतंक का माहौल" है. कई गिरफ्तार लोगों को वकीलों तक पहुंच नहीं मिल रही है और उनके परिवारों को भी उनकी जानकारी नहीं दी जा रही. सोशल मीडिया पोस्ट तक को गिरफ्तारी का आधार बनाया जा रहा है, जिसमें ईरान के समर्थन या युद्ध से जुड़े कंटेंट शामिल हैं.

बहरीनी शिया लोग अमेरिकी ठिकानों पर कर रहे हमले का समर्थन

इस पूरे घटनाक्रम के पीछे बड़ा कारण बहरीन की रणनीतिक स्थिति भी है. देश में अमेरिका के फिफ्थ फ्लीट का मुख्यालय मौजूद है और सरकार ने इजरायल के साथ संबंध भी सामान्य किए हुए हैं. जंग की शुरुआत में इसी फ्लीट को ईरान ने निशाना भी बनाया था. आम जनता का एक बड़ा वर्ग, खासकर शिया समुदाय, ईरान के प्रति सहानुभूति रखता है और अमेरिकी ठिकानों पर हमलों का समर्थन करता दिख रहा है.

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रिपोर्ट के मुताबिक, विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यही स्थिति बनी रही तो बहरीन में 2011 के अरब स्प्रिंग जैसी स्थिति फिर से पैदा हो सकती है. उस समय भी बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए थे, जिन्हें कड़ी कार्रवाई के जरिए दबा दिया गया था. हालांकि सरकार का कहना है कि सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार किया जा रहा है और राष्ट्रीय सुरक्षा बनाए रखने के लिए ये कदम जरूरी हैं. लेकिन जमीनी हालात कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं.

फिलहाल बहरीन एक बेहद नाजुक दौर से गुजर रहा है. अगर ईरान के साथ जंग लंबी खिंचती है, तो इसका सबसे बड़ा असर इस छोटे लेकिन रणनीतिक रूप से अहम देश पर पड़ सकता है, जहां आंतरिक असंतोष कभी भी बड़े राजनीतिक संकट में बदल सकता है.

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