लंबे समय से एक-दूसरे के कट्टर दुश्मन रहे अमेरिका और ईरान एक बार फिर बातचीत की मेज पर लौट आए हैं. दोनों देशों द्वारा जारी किए गए विवरणों के अनुसार, इस नए अंतरिम समझौते से ईरान को तत्काल प्रभाव से बड़ा आर्थिक फायदा मिलने जा रहा है, जिसके तहत वह अब अंतरराष्ट्रीय बाजार में फिर से स्वतंत्र रूप से अपने तेल की बिक्री कर सकेगा.
ईरान के लिए तेल राजस्व के इस नए रास्ते के खुलने के अलावा, दोनों पक्ष कमोबेश उसी स्थिति में वापस आ गए हैं जहां वे लगभग साढ़े तीन महीने पहले थे. यानी इजराइल और अमेरिका द्वारा ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू करने से ठीक पहले. इस युद्ध ने पूरे मिडिल ईस्ट क्षेत्र में हजारों लोगों की जान ले ली, एक गंभीर वैश्विक ऊर्जा संकट को जन्म दिया और अमेरिकी अर्थव्यवस्था को बुरी तरह झकझोर कर रख दिया.
अब, ईरान और अमेरिका 60 दिनों के गहन वार्ता के दौर में प्रवेश करेंगे. इस दौरान दोनों पक्षों के सामने सबसे बड़ा और पेचीदा सवाल यह होगा कि क्या अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान से कोई ऐसा बेहतर समझौता करा पाएंगे, जो उस 2015 के ऐतिहासिक परमाणु समझौते (JCPOA) से अधिक सख्त हो, जिसे उन्होंने आठ साल पहले खुद ही रद्द कर दिया था.
इस समझौते से ईरान को क्या फायदा?
इस अंतरिम समझौते का सबसे बड़ा लाभ ईरान को उसके तेल कारोबार के रूप में मिलने जा रहा है. समझौते के तहत अमेरिका ने ईरान के तेल निर्यात पर लगाए गए प्रतिबंधों को तत्काल प्रभाव से अस्थायी रूप से निलंबित करने पर सहमति जताई है. इसका मतलब है कि ईरान अब फिर से वैश्विक बाजार में खुले तौर पर कच्चा तेल बेच सकेगा.
युद्ध और अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण ईरान का तेल निर्यात लगभग ठप हो गया था. पिछले वर्ष ईरान ने तेल बेचकर लगभग 45 अरब डॉलर की कमाई की थी, लेकिन उसका प्रमुख खरीदार केवल चीन था. प्रतिबंधों के कारण उसे गुप्त टैंकर नेटवर्क के जरिए तेल भेजना पड़ता था, जिससे मुनाफा काफी कम हो जाता था.
अब प्रतिबंधों में राहत मिलने से ईरान नए खरीदार तलाश सकेगा और बेहतर कीमतों पर तेल बेच पाएगा. इससे उसकी अर्थव्यवस्था को अरबों डॉलर का सीधा फायदा होगा.
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खुलने से दुनिया को राहत
समझौते के तहत स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से खोलने पर सहमति बनी है. इसके साथ ही अमेरिका ईरानी बंदरगाहों से अपनी नौसैनिक नाकेबंदी हटा लेगा. यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है, जहां से युद्ध से पहले वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत गुजरता था. युद्ध के दौरान इस मार्ग के बंद होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ गई थीं. इसका असर केवल पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहा, बल्कि खाद्यान्न, फर्टिलाइजर और अन्य जरूरी वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ा.
अब इस मार्ग के खुलने से वैश्विक बाजार में तेल की आपूर्ति सामान्य होने की उम्मीद है, जिससे ईंधन की कीमतों में कमी आ सकती है और महंगाई पर भी नियंत्रण मिलने की संभावना है.
स्थानीय रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिकी अधिकारियों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि इस जलमार्ग से जहाजों की आवाजाही अगले 60 दिनों के लिए पूरी तरह से 'टोल-फ्री' रहेगी. हालांकि, मसौदे के अनुसार 60 दिनों की अवधि समाप्त होने के बाद शुल्क लगाने की संभावना को खारिज नहीं किया गया है.
इस समझौते से अमेरिका को क्या मिला?
अमेरिका के लिए इस समझौते का सबसे बड़ा लाभ यह है कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम फिर से अंतरराष्ट्रीय निगरानी के दायरे में आ जाएगा. मसौदे के अनुसार, ईरान अपने उच्च स्तर तक समृद्ध किए गए यूरेनियम को अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की निगरानी में कम समृद्ध स्तर पर लाने के लिए तैयार हुआ है. हालांकि यह केवल अंतरिम व्यवस्था है. अगले 60 दिनों में दोनों देशों के बीच इस बात पर बातचीत होगी कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर आगे किस तरह की स्थायी और कड़ी पाबंदियां लगाई जाएं.
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि क्या वह 2015 के परमाणु समझौते से अधिक सख्त और लंबी अवधि वाला नया समझौता करा पाते हैं.
ईरान को भविष्य के बड़े वादे
अंतरिम समझौते में ईरान के लिए कई बड़े आर्थिक वादे भी किए गए हैं. यदि अंतिम परमाणु समझौता हो जाता है तो ईरान पर लगे लगभग सभी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध हटाए जा सकते हैं. इसके अलावा विदेशों में फंसी ईरान की अरबों डॉलर की संपत्ति को भी चरणबद्ध तरीके से जारी करने का प्रस्ताव है.
समझौते में युद्ध के बाद पुनर्निर्माण के लिए 300 अरब डॉलर के विशेष फंड का भी उल्लेख किया गया है. हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि इतनी बड़ी राशि कहां से आएगी. राष्ट्रपति ट्रंप पहले ही साफ कर चुके हैं कि अमेरिका इस फंड में योगदान नहीं देगा.
तुलना करें तो विश्व बैंक के अनुसार 13 साल के गृहयुद्ध के बाद सीरिया के पुनर्निर्माण के लिए 215 अरब डॉलर और गाजा के पुनर्निर्माण के लिए 53 अरब डॉलर की जरूरत बताई गई थी. ऐसे में ईरान के लिए प्रस्तावित 300 अरब डॉलर का पैकेज बेहद बड़ा माना जा रहा है.
मिसाइल और प्रॉक्सी संगठनों पर चुप्पी
इस समझौते का सबसे विवादित पहलू यह है कि इसमें ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम या उसके क्षेत्रीय सहयोगी संगठनों पर कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है. युद्ध के दौरान ट्रंप प्रशासन का दावा था कि उसका उद्देश्य ईरान की मिसाइल क्षमता को खत्म करना, उसकी नौसेना को कमजोर करना और हिजबुल्ला, हूती विद्रोहियों तथा इराक की शिया मिलिशिया जैसे संगठनों को मिलने वाला समर्थन समाप्त करना है.
हालांकि समझौते के मसौदे में इन मुद्दों का कोई उल्लेख नहीं किया गया है. यही वजह है कि कई विशेषज्ञ इसे अधूरा समझौता मान रहे हैं.
लेबनान युद्ध समझौते की राह में सबसे बड़ा रोड़ा
समझौते में लेबनान में युद्ध खत्म करने की बात कही गई है, लेकिन इजरायल और हिजबुल्ला इस समझौते का हिस्सा नहीं हैं. ईरान चाहता है कि इजरायली सेना दक्षिणी लेबनान से पूरी तरह हटे, जबकि इजरायल ने वहां अपनी सैन्य मौजूदगी जारी रखने के संकेत दिए हैं. दूसरी ओर हिजबुल्ला भी इजरायल के पूरी तरह हटने तक संघर्ष जारी रखने की बात कह चुका है. यदि लेबनान में संघर्ष जारी रहता है तो यह पूरा समझौता खतरे में पड़ सकता है.
इजरायल-अमेरिका रिश्तों में भी आई खटास?
इस समझौते से इजरायल पूरी तरह संतुष्ट नहीं दिख रहा है. इजरायल के कई नेताओं ने इसे अपनी सुरक्षा के लिए नुकसानदायक बताया है. प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पर घरेलू राजनीतिक दबाव भी बढ़ गया है. वहीं राष्ट्रपति ट्रंप और नेतन्याहू के रिश्तों में भी हाल के दिनों में तनाव देखने को मिला है. फ्रांस में जी-7 सम्मेलन के दौरान ट्रंप ने यहां तक कहा कि नेतन्याहू को लेबनान के मुद्दे पर ज्यादा जिम्मेदारी दिखानी होगी.
हालांकि यह समझौता फिलहाल केवल अंतरिम व्यवस्था है. असली चुनौती अगले 60 दिनों की बातचीत में होगी. 2015 के परमाणु समझौते में ईरान को केवल सीमित स्तर तक यूरेनियम एनरिचमेंट की अनुमति थी, उसके भंडार पर सीमा तय की गई थी और आईएईए की कड़ी निगरानी लागू की गई थी. लेकिन उस समझौते की समय सीमा 15 वर्ष थी, जिसे लेकर काफी विवाद हुआ. अब देखना होगा कि क्या ट्रंप प्रशासन ईरान पर पहले से अधिक कड़े और लंबे समय तक लागू रहने वाले प्रतिबंधों वाला नया समझौता करा पाता है या नहीं.