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ईरान जंग की ओर... 10 हजार भारतीयों को लेकर बढ़ी टेंशन, कश्मीरी छात्रों के पैरेंट्स ने की अपील

ईरान में खामेनेई शासन के खिलाफ चल रहे विरोध प्रदर्शन की वजह से भारत में टेंशन बढ़ गई है. वहां रह रहे हजारों भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को लेकर गहरी चिंता जताई जा रही है. भारतीय विमानन कंपनियों ने अपने फ्लाइट्स को उस क्षेत्र से डायवर्ट कर दिया है. हजारों कश्मीरी वहां पढ़ाई करते हैं, उनके पैरेंट्स अब मदद की गुहार लग रहे हैं.

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ईरान में उथल-पुथल से भारतीयों की सुरक्षा और व्यापार पर मंडराया संकट (Photo: flightradar24)
ईरान में उथल-पुथल से भारतीयों की सुरक्षा और व्यापार पर मंडराया संकट (Photo: flightradar24)

ईरान में बीते दो हफ्तों से जारी हिंसक विरोध प्रदर्शनों ने वहां की आंतरिक स्थिति को बेहद अस्थिर बना दिया है. हर दिन हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं. 28 दिसंबर 2025 से शुरू हुए इन प्रदर्शनों में हजारों लोगों की मौत की खबरें सामने आ रही हैं. मानवाधिकार संगठनों के अनुसार, मृतकों की संख्या 2,000 से अधिक हो चुकी है, जबकि कुछ रिपोर्ट्स इसे 3,000 से भी ज्यादा बता रही हैं.

इस संकट का सीधा असर भारत पर भी पड़ा है. बुधवार को ईरान ने अचानक अपना एयरस्पेस बंद कर दिया, जिससे भारत, यूरोप समेत उत्तरी अमेरिका के बीच उड़ानें बाधित हो गईं. 

एयर इंडिया और इंडिगो जैसी एयरलाइंस को रूट बदलने पड़े हैं, जिससे यात्रियों को देरी और असुविधा का सामना करना पड़ रहा है. दोनों विमान कंपनियों ने एडवाइजरी जारी करते हुए बताया कि कि रूट में बदलाव करना पड़ा है और कई फ्लाइट्स को कैंसिल करना पड़ा है.

कश्मीरी छात्रों समेत 10 हजार भारतीय संकट में

ईरान में इस समय करीब 10,000 से 12,000 भारतीय मूल के लोग मौजूद हैं. इनमें बड़ी संख्या छात्रों की है, जिनमें लगभग दो से तीन हजार कश्मीरी छात्र मेडिकल की पढ़ाई कर रहे हैं. 

जम्मू-कश्मीर स्टूडेंट्स एसोसिएशन (JKSA) ने इन छात्रों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता जताई है. बार-बार इंटरनेट बंद होने और हिंसक प्रदर्शनों के चलते इन छात्रों से संपर्क करना मुश्किल हो गया है, जिससे उनके परिवारों की चिंता बढ़ गई है.

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भारतीय दूतावास ने सभी भारतीय नागरिकों को जल्द से जल्द ईरान छोड़ने की सलाह दी है. हालांकि छात्रों और उनके संगठनों का कहना है कि अब तक किसी निकासी योजना की घोषणा नहीं की गई है, जिससे असमंजस की स्थिति बनी हुई है. वहीं, पैरेंट्स सरकार से उनके बच्चों को निष्कासन में मदद की अपील कर रहे हैं.

यह भी पढ़ें: WAR की आशंका बढ़ी... ईरान की दिशा में बढ़ रहा अमेरिका का अब्राहम लिंकन स्ट्राइक ग्रुप, मिडिल ईस्ट में हाई अलर्ट

इस अशांति का असर व्यापार पर भी दिख रहा है. पहले ही अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते भारत-ईरान व्यापार में भारी गिरावट आ चुकी है. मौजूदा हालात में शिपिंग रूट्स और तेल आपूर्ति बाधित होने की आशंका से भारत के व्यापार घाटे पर और दबाव पड़ सकता है.

आंकड़ों के अनुसार, 2019 में ईरान और भारत के बीच $17.6 बिलियन का व्यापार हुआ करता था, जो कि 2024 में घटाकर महज़ $2.3 बिलियन रह गया है. ख़ास बात ये है कि भारत के कुल व्यापार का महज़ 0.2 फीसदी व्यापार ईरान के साथ होता है. हालांकि, शिपिंग रूट बाधित होने की वजह से व्यापार घाटे पर असर पड़ सकता है.

चाबहार पोर्ट परियोजना खतरे में: भारत की सामरिक योजना पर बड़ा संकट

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भारत की सामरिक महत्व की चाबहार बंदरगाह परियोजना, जिसमें लगभग 500 मिलियन डॉलर का निवेश हुआ है, अब गंभीर खतरे में दिखाई दे रही है. यह बंदरगाह भारत के लिए पाकिस्तान को बायपास करते हुए अफगानिस्तान, मध्य एशिया और यूरोप तक पहुंचने का एक अहम गेटवे है.

चाबहार बंदरगाह भारत की रणनीतिक कोशिशों में केंद्रीय स्थान रखता है, लेकिन वहां की वर्तमान अस्थिर राजनीतिक और आर्थिक स्थिति इस परियोजना को प्रभावित कर रही है.

बासमती चावल निर्यात में भारी गिरावट

एक प्रमुख चिंता का विषय भारत के बासमती चावल निर्यात में भारी गिरावट है. ईरान, जो भारतीय बासमती चावल का सबसे बड़ा विदेशी बाजार रहा है, ने इस व्यापार में भी ठहराव देखा है.

2018-19 में भारत का ईरान को निर्यात लगभग 3.51 बिलियन डॉलर था, जो अब 2024-25 में घटकर केवल 1.24 बिलियन डॉलर रह गया है. इससे भारतीय किसानों और निर्यातकों को भारी नुकसान हो रहा है.

क्षेत्रीय संतुलन और स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी पर असर

क्षेत्रीय राजनीतिक स्थिति की अनिश्चिता भारत की पश्चिम एशिया नीति के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है. भारत ने हमेशा ईरान, सऊदी अरब और अमेरिका के बीच संतुलन बनाए रखने की कोशिश की है, ताकि क्षेत्रीय स्थिरता सुनिश्चित हो सके. 

चाबहार बंदरगाह पाकिस्तान के चीनी-प्रायोजित ग्वादर बंदरगाह से मात्र 92 समुद्री मील की दूरी पर है और भारत की रणनीतिक उपस्थिति का प्रतीक है. अगर इस क्षेत्र में अशांति बनी रहती है, तो भारत की स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी कमजोर हो सकती है और चीन-पाकिस्तान के प्रभाव में वृद्धि हो सकती है.

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इसलिए, भारत के लिए यह जरूरी है कि वह चाबहार परियोजना को स्थिर बनाए रखने के लिए अपनी कूटनीतिक और आर्थिक रणनीतियों को और मज़बूत करे, ताकि क्षेत्रीय संतुलन और अपनी स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी को कायम रखा जा सके.

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