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'जब तक मुल्लाओं को दफन नहीं किया जाता...', कौन है ईरानी आंदोलन के नेता जो खामेनेई का अंत चाहते हैं

ईरान में 10 दिनों से जारी विरोध प्रदर्शन देश के 78 से अधिक शहरों में फैल चुके हैं. इन प्रदर्शनों में अब तक 35 लोग मारे गए हैं और 1,200 से अधिक लोग हिरासत में लिए गए हैं. प्रदर्शन की शुरुआत आर्थिक संकट, मुद्रा की गिरावट और बढ़ती महंगाई के खिलाफ हुई थी, लेकिन अब यह खामेनेई शासन के खिलाफ व्यापक असंतोष में बदल गया है.

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ईरान में खामेनेई शासन के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन जोरों पर हैं (Photo: AP)
ईरान में खामेनेई शासन के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन जोरों पर हैं (Photo: AP)

ईरान में जारी प्रदर्शनों को आज (मंगलवार) 10 दिन हो गए हैं. राजधानी तेहरान से छोटे पैमाने पर शुरू हुए प्रदर्शन सभी प्रमुख शहरों में फैल गए हैं और इनमें अब तक 35 लोगों की मौत हो गई है. ईरान के सभी बड़े शहरों में सुरक्षा बलों की तैनाती कड़ी कर दी गई है और करीब 1,200 लोगों को हिरासत में लिया गया है. 

समाचार एजेंसी एपी की रिपोर्ट के मुताबिक, मरने वालों में 29 प्रदर्शनकारी, 4 बच्चे और ईरान के सुरक्षा बलों के 2 जवान शामिल हैं. ईरान में हो रही इन मौतों को लेकर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान को लगातार चेतावनी दे रहे हैं. हाल ही में उन्होंने कहा है कि अगर ईरानी शासन शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की हिंसक हत्याएं करता है तो अमेरिका उनकी मदद के लिए आगे आएगा.

ईरान में हो रहे हालिया प्रदर्शन 2022 के बाद से अब तक के सबसे बड़े विरोध प्रदर्शन हैं जिनकी वजह ईरान की मुद्रा रियाल में भारी गिरावट और देश में बेतहाशा बढ़ती महंगाई है. 2022 के हिजाब विरोधी प्रदर्शन युवा छात्रा महसा अमीनी की पुलिस हिरासत में मौत के बाद शुरू हुए थे.

ईरान में कहां-कहां हो रहे विरोध-प्रदर्शन?

ईरान का आंदोलन तेहरान के ग्रैंड बाजार से शुरू होकर अब कम से कम 31 प्रांतों के 78 से ज्यादा शहरों में 250 से अधिक स्थानों तक फैल चुका है.

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नेशनल काउंसिल ऑफ रेजिस्टेंस ऑफ ईरान (एनसीआरआई) और ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट्स न्यूज एजेंसी (एचआरएएनए) के मुताबिक, काजेरून, मालेकशाही, केरमानशाह, शिराज, मशहद, अर्कावाज, इस्फहान, तेहरान, हफ्शेजान, कराज, शहरकुर्द और फरदिस जैसे शहरों में विरोध-प्रदर्शनों की तीव्रता काफी ज्यादा है.

'जब तक मुल्लाओं को दफन नहीं किया जाता...'

ईरान के तर्बियत मोदारेस यूनिवर्सिटी और खाजेह नसीर यूनिवर्सिटी के छात्रावासों में छात्र विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं और नारे लगा रहे हैं- 'यह कौम तब तक कौम नहीं बनेगी, जब तक मुल्लाओं को दफन नहीं किया जाएगा. तेहरान के तर्बियत मोदारेस यूनिवर्सिटी और बिरजंद में छात्रों ने 'IRGC (ईरानी एलीट फोर्स) तुम हमारे ISIS हो' के नारों के साथ आंदोलन जारी रखने की कसम खाई.

केरमानशाह में जाफराबाद और शरिआती सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे नागरिकों ने 'तानाशाह मुर्दाबाद, खामेनेई मुर्दाबाद' के नारे लगाए और पुलिस को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया.

कैसे शुरू हुआ ईरान का आंदोलन और इसका नेता कौन है?

ईरान में विरोध प्रदर्शनों की ताजा लहर अचानक या किसी एकजुट राजनीतिक आंदोलन के रूप में नहीं उभरी है. इसका कोई बड़ा चेहरा भी नहीं है. आंदोलन तेहरान में व्यापारियों की हड़ताल और दुकानों के बंद होने से शुरू हुआ. व्यापारी मुद्रा में भारी गिरावट, बढ़ती महंगाई को लेकर सड़कों पर आए. लेकिन धीरे-धीरे आंदोलन बड़ा हुआ और इसके मुद्दे भी व्यापक होते गए. पानी की कमी और इस्लामिक रिपब्लिक की खामेनेई शासन के प्रति असंतोष जैसे मुद्दे भी अब इसमें जुड़ गए हैं.

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इस आंदोलन के कुछ विश्लेषक अपदस्थ शाह के बेटे रजा पहलवी के समर्थन को अहम कारण मानते हैं, तो कुछ आर्थिक परेशानियों को. लेकिन सभी इस बात पर सहमत हैं कि यह एक जटिल, बहुस्तरीय सच्चाई है.

आंदोलन जब शुरू हुआ और व्यापारी अपना कारोबार बंद कर सड़क पर आ गए तभी लग गया कि यह कोई छोटा-मोटा आंदोलन होने नहीं जा रहा. ईरान की व्यवस्था में बाजार लंबे समय से आर्थिक आधार स्तंभ रहे हैं. उनका दुकानें बंद करना यह दिखाता है कि चुप रहना अब विरोध करने से ज्यादा महंगा पड़ने लगा है.

ईरान इंटरनेशनल को फार्स प्रांत का एक वीडियो मिला है जिसमें देखा जा सकता है कि प्रांत के आबादेह शहर में दुकानदारों ने सोमवार को भी हड़ताल के तहत अपनी दुकानें बंद रखी हैं. वीडियो में बाजार की कतारों में दुकानें बंद नजर आ रही हैं. अधिकारियों के दबाव के बावजूद व्यापारी अपनी हड़ताल जारी रखे हुए हैं.

डॉलर के मुकाबले ईरान की मुद्रा में भारी गिरावट आई है

वॉशिंगटन डीसी में रहने वाले ईरानी-कनाडाई पुरस्कार विजेता पत्रकार और कार्टूनिस्ट निक कौसर द मीडिया लाइन से बात करते हुए कहते हैं कि यह मोड़ बिगड़ते आर्थिक हालात की देन है. उन्होंने कहा, 'मुद्रा विनिमय दर काबू में नहीं है और बहुत तेजी से बढ़ी है.

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ईरान की मुद्रा में गिरावट का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि एक अमेरिकी डॉलर की कीमत 42,000 रियाल से भी ऊपर पहुंच गई है.

दुकानदारों और छोटे कारोबारियों के लिए रियाल की गिरावट का मतलब तुरंत महंगाई का बढ़ना और मुनाफे का खत्म होना है. कौसर कहते हैं, 'यह ऐसा है जैसे बढ़ी कीमतों की वजह से आपकी मासिक आय आधी हो गई हो. असल में आपको रियाल में उतने ही पैसे मिल रहे हैं, लेकिन डॉलर के हिसाब से उनकी कीमत नहीं बची.'

उनका मानना है कि सालों की कुप्रशासन और खराब प्रबंधन ने इस स्थिति की जमीन तैयार की. वो कहते हैं, 'लोग लंबे समय से खराब शासन और खराब प्रबंधन के दबाव में हैं. यह सड़कों पर उतरने का मौका बन गया है, क्योंकि सुरक्षा बलों की हालत भी ठीक नहीं है.'

ईरानी-इतालवी राजनीतिक विश्लेषक अश्कान रोस्तमी, जो ईरान ट्रांजिशन काउंसिल के सदस्य और ‘इंस्टीट्यूट फॉर अ न्यू मिडिल ईस्ट’ के सह-संस्थापक हैं, भी अशांति की जड़ आर्थिक दबावों में देखते हैं. उन्होंने कहा, 'यह सब आर्थिक बदहाली की वजह से शुरू हुआ- पहले बाजार से जो देश की आर्थिक नस है और फिर बहुत तेजी से फैल गया. सच कहूं तो मुझे इतनी तेजी की उम्मीद नहीं थी. यह तुरंत यूनिवर्सिटीज तक पहुंच गया और फिर आम लोग भी इसमें शामिल हो गए.'

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खामेनेई शासन की सख्ती से आंदोलन में जुड़ गए और लोग

ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई ने आंदोलन को खत्म करने के लिए बल प्रयोग भी किया है जिससे लोग नाराज ही हुए है. सभी प्रमुख शहरों में सख्ती बढ़ा दी गई है और सुरक्षा बलों का दखल भी बढ़ा है. इस स्थिति ने पहले से ही नाराज लोगों को और नाराज किया और वो सड़कों पर आ गए.

आंदोलन में अब छात्र, ट्रक चालक और अन्य सामाजिक समूह भी शामिल हो गए हैं. इस तरह जिस आंदोलन की शुरुआत महज एक आर्थिक शिकायत से हुई थी अब वो खामेनेई शासन के साथ टकराव में बदल गई है.

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