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भारत-अमेरिका के बीच तनाव में सऊदी ने मारी बाजी, तेल के 'खेल' में रूस को किया रिप्लेस

रूस से भारत की तेल खरीद में भारी गिरावट आई है. तेल में गिरावट के कारण अब रूस भारत का शीर्ष तेल आपूर्तिकर्ता नहीं रहा. भारत का शीर्ष तेल आपूर्तकर्ता अब सऊदी अरब हो गया है.

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रूस की जगह अब सऊदी अरब भारत का शीर्ष तेल सप्लायर बन गया है (File Photo: Reuters)
रूस की जगह अब सऊदी अरब भारत का शीर्ष तेल सप्लायर बन गया है (File Photo: Reuters)

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूसी तेल की खरीद से नाराज होकर भारत पर अतिरिक्त 25% का टैरिफ लगा दिया था. इस कारण भारत-अमेरिका में भारी तनाव पैदा हुआ और दोनों के बीच व्यापार वार्ता भी रुक गई. लेकिन फिर 2 फरवरी को ट्रंप ने घोषणा की कि भारत-अमेरिका एक व्यापार समझौते पर राजी हो गए हैं. ट्रंप ने कहा कि डील के तहत भारत रूस से कच्चे तेल की खरीद बंद करेगा जिसके बदले में उन्होंने भारत पर लगा 25% टैरिफ हटा दिया है. उन्होंने भारत पर लगा 25% रेसिप्रोकल टैरिफ भी घटाकर 18% कर दिया.

इसके बाद से अमेरिका की तरफ से बार-बार ये दावे किए गए कि भारत रूसी तेल की खरीद बंद कर रहा है. उधर रूस कहता रहा कि भारत ऐसा कुछ करने नहीं जा रहा. भारत ने चुप्पी साधे रखी, बस इतना कहा कि राष्ट्र हित में तेल के स्रोतों में विविधता रखी जाएगी.

लेकिन अब आंकड़ों ने पूरी तस्वीर साफ कर दी है. भारत ने वास्तव में रूस से तेल खरीद में भारी कटौती की है.

रूस से भारत के माल (मर्चेंडाइज) आयात में जनवरी में 40.5 प्रतिशत की गिरावट आई. एक साल पहले जहां भारत रूस से 4.81 अरब डॉलर का माल खरीदता था, अब यह घटकर 2.86 अरब डॉलर रह गया है. इस गिरावट की वजह भारतीय रिफाइनरियों का रूसी तेल की खरीद में भारी कटौती करना है. रूस से भारत के कुल माल आयात में कच्चे तेल का हिस्सा लगभग 80 प्रतिशत रहा है.

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समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने इंडस्ट्री के सूत्रों के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि भारत की कुल तेल खरीद में रूसी कच्चे तेल का हिस्सा 2022 के अंत के बाद सबसे कम हो गया है. जनवरी में ही मध्य-पूर्व के देशों से तेल की खरीद 2022 के बाद से सबसे अधिक हो गई. और इसी के साथ ही सऊदी अरब एक बार फिर से भारत का शीर्ष तेल आपूर्तिकर्ता बन गया है.

भारत का सबसे बड़ा तेल सप्लायर रूस पीछे खिसक गया

फरवरी 2022 में रूस और यूक्रेन का युद्ध शुरू हुआ था. युद्ध के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए जिसमें उसके तेल पर प्रतिबंध भी शामिल था. प्रतिबंधों को देखते हुए रूस ने भारत और चीन जैसे अपने एशियाई सहयोगियों को रियायती दरों पर तेल ऑफर किया. इसके बाद भारतीय रिफाइनरियों ने बड़े पैमाने पर रूसी तेल खरीदना शुरू किया और रूस भारत का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बन गया. 

समय के साथ भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 1 प्रतिशत से बढ़कर लगभग 40 प्रतिशत तक पहुंच गई. लेकिन अब इस खरीद में तेजी से गिरावट आई है.

नवंबर से चीन रूस से समुद्री रास्ते से आने वाले कच्चे तेल का सबसे बड़ा खरीदार बन गया है. अनुमान है कि फरवरी में चीन 20.7 लाख बैरल प्रतिदिन रूसी तेल का आयात करेगा. जनवरी में यह खरीद 17 लाख बैरल प्रतिदिन थी.

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जनवरी में भारत ने रूस से लगभग 11 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल खरीदा जो नवंबर 2022 के बाद सबसे कम है. भारत के कुल तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी घटकर 21.2 प्रतिशत रह गई है. यह मात्रा दिसंबर की तुलना में 23.5 प्रतिशत कम और पिछले साल की तुलना में लगभग एक-तिहाई कम रही.

विश्लेषकों का अनुमान है कि फरवरी में आयात औसतन 10-12 लाख बैरल प्रतिदिन और मार्च में लगभग 8 लाख बैरल प्रतिदिन तक गिर सकता है. इससे यह तो साफ है कि भारत ने अमेरिकी दबाव में तेल खरीद कम की है और आगे भी करेगा लेकिन अचानक से इसे बंद नहीं करेगा.

कमी की भरपाई कौन कर रहा है?

रूस से घटती आपूर्ति की भरपाई के लिए भारतीय रिफाइनरियां अब मध्य पूर्व, दक्षिण अमेरिका और पश्चिमी देशों से अधिक तेल खरीद रही हैं. जनवरी में भारत के कुल आयात में मध्य पूर्व की हिस्सेदारी लगभग 55 प्रतिशत रही, जबकि लैटिन अमेरिकी तेल का हिस्सा 12 महीने के उच्च स्तर लगभग 10 प्रतिशत तक पहुंच गया.

सऊदी अरब फिर से भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बन गया है और फरवरी में वहां से आयात रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने के संकेत हैं. रूस से कम खरीद के कारण भारत के तेल आयात में OPEC (तेल उत्पादक देशों का समूह) देशों की हिस्सेदारी भी 11 महीने के उच्च स्तर पर पहुंच गई.

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इससे पहले दिसंबर में रूस से भारत का कच्चे तेल आयात घटकर 2.7 अरब डॉलर रह गया था, जो दिसंबर 2024 की तुलना में 15 प्रतिशत कम था. इस दौरान सऊदी अरब और अमेरिका से आयात में अच्छी-खासी बढ़ोतरी दर्ज की गई.

कच्चे तेल के अलावा भारत रूस से कोयला, कोक, उर्वरक, लोहा, न्यूजप्रिंट और कीमती पत्थर भी आयात करता है, लेकिन कुल आयात में तेज गिरावट यह दिखाती है कि दोनों देशों के व्यापार संबंधों में कच्चे तेल की भूमिका कितनी अहम रही है.

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