अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर जर्मनी से अपनी सेना हटाने की धमकी दी है. यह धमकी ऐसे वक्त में आई है जब जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने ईरान के साथ अमेरिका की बातचीत की आलोचना की थी। लेकिन यूरोप के देश अब ट्रंप की इस तरह की धमकियों के आदी हो चुके हैं.
जर्मनी के नए चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने बुधवार को एक बयान दिया था. उन्होंने कहा था कि ईरान के साथ बातचीत में अमेरिका की जो धीमी चाल है उससे अमेरिका का ही 'अपमान' हो रहा है. इस बयान से ट्रंप नाराज हो गए और उन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट करके फिर से जर्मनी से सेना हटाने की बात कह दी.
ट्रंप ने NATO के बारे में क्या कहा है?
राष्ट्रपति ट्रंप पिछले कई हफ्तों से NATO यानी पश्चिमी देशों के सैन्य गठबंधन पर भड़के हुए हैं. ईरान के खिलाफ जंग में NATO के देशों ने अमेरिका का साथ नहीं दिया. इस पर ट्रंप ने NATO को 'कागज का शेर' कहा है और यूरोपीय नेताओं को 'कायर' तक कह दिया है.
क्या यह धमकी सच में पूरी होगी?
लंदन के रक्षा विशेषज्ञ एड अर्नोल्ड ने कहा कि यह धमकी शायद सिर्फ 'दिखावा' है. उन्होंने कहा कि अमेरिका को खुद जर्मनी से बहुत फायदा होता है. मध्य पूर्व में होने वाले सैन्य ऑपरेशन के लिए जर्मनी की जगह और सुविधाएं बहुत जरूरी हैं. इसलिए अमेरिका जर्मनी से सेना हटाने का जोखिम नहीं उठाएगा. एक वरिष्ठ पश्चिमी अधिकारी ने भी बताया कि अमेरिका और जर्मनी के बीच सेना हटाने की कोई बातचीत नहीं हो रही.
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यूरोप को असली डर किस बात का है?
यूरोपीय देशों को सेना हटाने की धमकी से उतना डर नहीं लगता जितना पहले लगता था. अब उन्हें असली चिंता दो बातों की है. पहली, अमेरिका जर्मनी से पैट्रियट मिसाइल सिस्टम और गोला-बारूद मध्य पूर्व भेज रहा है. दूसरी, एस्टोनिया जैसे देशों को बताया गया है कि उनके अमेरिकी हथियारों के ऑर्डर में देरी होगी क्योंकि अमेरिका अपनी जरूरतों को पहले पूरा कर रहा है.
रूस की नजर इस सब पर है
कई यूरोपीय नेताओं को डर है कि रूस के राष्ट्रपति पुतिन इस दशक के अंत तक यूरोप में कहीं और हमला कर सकते हैं खासकर अगर वो यूक्रेन जीत गए. ईरान के साथ अमेरिकी जंग ने अमेरिकी सेना के यूरोप से हटने की आशंका को और बढ़ा दिया है. इसीलिए NATO के नेताओं और यूरोपीय देशों के बीच पिछले कुछ महीनों में कई बैठकें हुई हैं.
यूरोप अब अपनी सुरक्षा खुद करेगा?
पिछले एक साल में यूरोपीय देशों और कनाडा ने समझ लिया है कि उन्हें अपनी पारंपरिक सुरक्षा का इंतजाम खुद करना होगा. आगे चलकर NATO में अमेरिका की मुख्य भूमिका सिर्फ परमाणु हथियारों और कुछ सैनिकों तक सीमित रह सकती है.