अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस वक्त तीन दिवसीय चीन दौरे पर हैं. उनके साथ कई बड़े कारोबारी, सुरक्षा अधिकारी और खास मंत्री भी पहुंचे हैं. लेकिन इस पूरे दौरे में सबसे ज्यादा चर्चा अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की हो रही है. इसकी वजह कोई राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि उनका चीन में प्रवेश करने का तरीका है.
दरअसल, मार्को रुबियो पर साल 2020 से चीन ने प्रतिबंध लगाया हुआ है. जब वह अमेरिकी सीनेटर थे, तब उन्होंने चीन पर उइगर मुस्लिम समुदाय के दमन और मानवाधिकार उल्लंघन के गंभीर आरोप लगाए थे. इसके बाद बीजिंग ने उनके खिलाफ सख्त कदम उठाते हुए उन पर बैन लगा दिया था. ऐसे में सवाल उठ रहा था कि आखिर ट्रंप के साथ वह चीन कैसे पहुंचे?
AFP की रिपोर्ट के मुताबिक, इस मुश्किल का हल एक "डिप्लोमैटिक वर्कअराउंड" से निकाला गया. बताया गया कि चीन में एंट्री के लिए मार्को रुबियो का नाम बदलकर "मार्को लू" कर दिया गया. दो राजनयिक सूत्रों ने दावा किया कि चूंकि प्रतिबंध उनके मूल नाम "Marco Rubio" पर लागू था, इसलिए उनके सरनेम को बदलकर चीनी उच्चारण वाला "Lu" इस्तेमाल किया गया.
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हालांकि चीन की तरफ से आधिकारिक तौर पर यह नहीं कहा गया कि नाम बदलने की वजह से ही उन्हें प्रवेश मिला. लेकिन बीजिंग स्थित चीनी दूतावास के प्रवक्ता ने इतना जरूर कहा कि "प्रतिबंध उस समय के सीनेटर रुबियो के चीन विरोधी बयानों और गतिविधियों से जुड़ा था."
मार्को रुबियो लंबे समय से चीन के सबसे मुखर आलोचकों में गिने जाते हैं. उन्होंने कई बार चीनी कम्युनिस्ट पार्टी पर उइगर मुसलमानों के खिलाफ "जनसंहार" और सांस्कृतिक पहचान मिटाने की कोशिशों का आरोप लगाया है. NPR को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि "दुनिया में लाखों लोगों को उनकी पहचान और धर्म से अलग करने की कोशिश की जा रही है."
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साल 2021 में जारी एक वीडियो बयान में रुबियो ने कहा था कि "एक मिलियन से ज्यादा उइगर और दूसरे तुर्किक मुसलमानों को कैंपों में बंद किया गया है. महिलाओं के साथ रेप, जबरन नसबंदी और जबरन गर्भपात जैसी घटनाएं हुई हैं." चीन इन सभी आरोपों को लगातार खारिज करता रहा है.
ट्रंप का यह चीन दौरा ऐसे समय हो रहा है, जब ईरान युद्ध, ट्रेड टेंशन और ग्लोबल सप्लाई चेन को लेकर अमेरिका और चीन के बीच कई संवेदनशील मुद्दे मौजूद हैं. हालांकि ट्रंप ने साफ कहा है कि वह इस दौरे में मुख्य रूप से व्यापार और आर्थिक संबंधों पर फोकस कर रहे हैं.