बांग्लादेश के 13वें संसदीय चुनाव के नतीजों ने जहां सत्ता समीकरण बदलने के संकेत दिए हैं, वहीं अल्पसंख्यक समुदाय की भागीदारी को लेकर भी नई चर्चा छेड़ दी है. चुनाव में राष्ट्रवादी दल को भारी बढ़त मिली है और वह स्पष्ट बहुमत की ओर बढ़ता दिख रहा है. इसी बीच हिंदू समुदाय से जुड़े चार उम्मीदवारों की जीत खास तौर पर ध्यान खींच रही है.
ताजा नतीजों के अनुसार बीएनपी ने कुल 211 सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि इस्लामी दल को 68 सीटों पर जीत मिली. इस परिणाम ने सत्ता में बदलाव की संभावना को मजबूत किया है. लेकिन चुनाव की कहानी सिर्फ बहुमत तक सीमित नहीं है. अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व का सवाल भी उतना ही अहम बना हुआ है.
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गायेश्वर चंद्र राय
ढाका क्षेत्र से वरिष्ठ नेता गायेश्वर चंद्र राय की जीत को महत्वपूर्ण माना जा रहा है. उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी को पीछे छोड़ते हुए करीब 99 हजार से अधिक मत हासिल किए. हाल के समय में हिंदू समुदाय के खिलाफ उत्पीड़न और हमलों की खबरों के बीच उनकी जीत को प्रतीकात्मक रूप से अहम माना जा रहा है. यह क्षेत्र कई इलाकों को समेटे हुए है और यहां मुकाबला कड़ा माना जा रहा था.
निताई राय चौधरी
मगुरा क्षेत्र से निताई राय चौधरी ने भी आरामदायक जीत हासिल की. उन्हें 147000 से अधिक मत मिले. वह पार्टी के भीतर अल्पसंख्यक समुदाय का प्रभावशाली चेहरा माने जाते हैं और उनका संबंध गायेश्वर चंद्र राय से भी बताया जाता है. उनकी जीत से उन क्षेत्रों में दल की स्थिति मजबूत हुई है जहां अल्पसंख्यक आबादी उल्लेखनीय है.
वकील दीपेन देवान
रंगामाटी क्षेत्र से अधिवक्ता दीपेन देवान ने तीसरी जीत दर्ज की. उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी को पीछे छोड़ते हुए संसद में जगह बनाई.
साचिंग प्रू
बंदरबन क्षेत्र से साचिंग प्रू भी 141000 से ज्यादा वोटों के साथ जीतकर संसद पहुंचे, जिससे कुल चार अल्पसंख्यक प्रतिनिधि इस दल की ओर से चुने गए.
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जमात-ए-इस्लामी के उम्मीदवार हारे
इसके विपरीत जमात-ए-इस्लामी गठबंधन के एकमात्र हिंदू उम्मीदवार को हार का सामना करना पड़ा. खुलना क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे उम्मीदवार को पर्याप्त मत मिलने के बावजूद जीत नहीं मिल सकी. इसका मतलब यह रहा कि इस गठबंधन का कोई भी अल्पसंख्यक उम्मीदवार संसद तक नहीं पहुंच पाया.
चुनाव में कुल 79 अल्पसंख्यक उम्मीदवार मैदान में थे, जिनमें 10 महिलाएं भी शामिल थीं. 60 पंजीकृत दलों में से 22 दलों ने ऐसे उम्मीदवार उतारे. इसके बावजूद संसद में उनका प्रतिनिधित्व सीमित ही रहा, जो राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार अब भी एक चुनौती है.