बांग्लादेश में नई बीएनपी सरकार के गठन के साथ ही विदेश नीति को लेकर स्पष्ट संकेत सामने आए हैं. तारिक रहमान के नेतृत्व में बनी सरकार ने बुधवार को कहा कि देश सभी राष्ट्रों, विशेषकर अपने पड़ोसी देशों के साथ संप्रभु समानता और साझा हितों के आधार पर सम्मानजनक तथा पारस्परिक रूप से लाभकारी संबंध बनाए रखेगा. इस बयान को 18 महीने के मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के दौरान तनावपूर्ण रहे बांग्लादेश-भारत संबंधों की संभावित समीक्षा के रूप में देखा जा रहा है.
नव नियुक्त विदेश मंत्री खलीलुर रहमान ने कहा कि “बांग्लादेश फर्स्ट” देश की विदेश नीति का केंद्रीय सिद्धांत होगा. उन्होंने स्पष्ट किया कि इस ढांचे के तहत बांग्लादेश अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए सभी देशों के साथ संतुलित और व्यावहारिक सहयोग को आगे बढ़ाएगा. उन्होंने संवाददाताओं से कहा कि बाहरी भागीदारी की व्यापक पुनर्समीक्षा की जाएगी, जो संप्रभु समानता, आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने, राष्ट्रीय गरिमा, सम्मान और पारस्परिकता के सिद्धांतों पर आधारित होगी.
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खलीलुर रहमान ने कहा, “जहां जटिलताएं या ठहराव हैं, वहां बाधाओं को दूर करने और संबंधों को सामान्य बनाने के प्रयास जारी रहेंगे.” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि विदेश नीति किसी दलगत विचार से प्रभावित नहीं होगी. उनके शब्दों में, “विदेश नीति एक गंभीर विषय है और हमारा लक्ष्य ऐसी नीति बनाना है जो बांग्लादेश के लोगों की इच्छा और आकांक्षाओं को प्रतिबिंबित करे तथा राष्ट्रीय हितों और रचनात्मक वैश्विक सहभागिता पर आधारित हो.”
बीएनपी पहले ही संकेत दे चुकी है कि नई सरकार पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के नई दिल्ली से प्रत्यर्पण की मांग को नहीं छोड़ेगी. हालांकि पार्टी का कहना है कि यह मुद्दा द्विपक्षीय संबंधों में बाधा नहीं बनेगा. विश्लेषकों का मानना है कि नई सरकार संतुलन साधने की कोशिश कर रही है, ताकि राजनीतिक प्रतिबद्धताओं और कूटनीतिक आवश्यकताओं के बीच सामंजस्य बना रहे.
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इस बीच गृह मंत्री सलाहुद्दीन अहमद ने देश के आंतरिक हालात पर टिप्पणी करते हुए कहा कि बांग्लादेश में “भीड़ संस्कृति” का दौर समाप्त हो चुका है. उन्होंने कहा कि किसी भी तरह से भीड़तंत्र को बढ़ावा नहीं दिया जाएगा. “मांगें हो सकती हैं, लेकिन उन्हें उचित प्रक्रिया और लोकतांत्रिक मंचों के माध्यम से उठाया जाना चाहिए,” उन्होंने कहा.
नई सरकार के इन बयानों को घरेलू स्थिरता और संतुलित कूटनीति की दिशा में शुरुआती संकेत माना जा रहा है. अब देखना होगा कि ‘बांग्लादेश फर्स्ट’ नीति व्यवहार में किस तरह आकार लेती है और क्षेत्रीय समीकरणों पर इसका क्या असर पड़ता है.