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फिर शुरू होगी जंग या कायम रहेगी शांति? इस्लामाबाद में US-ईरान की सीधी बातचीत, PAK भी शामिल

ईरान जंग के बाद अब शांति की कोशिशें तेज हो गई हैं. पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिका, ईरान और पाकिस्तान के बीच त्रिपक्षीय बातचीत चल रही है. इस वार्ता में सीजफायर को स्थायी बनाने और क्षेत्रीय तनाव कम करने पर चर्चा हो रही है.

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ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची (L), पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ (M) और अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस. (Photo: AP)
ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची (L), पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ (M) और अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस. (Photo: AP)

मध्य पूर्व में हफ्तों तक चली जंग के बाद अब उम्मीद की एक नई किरण इस्लामाबाद से दिखाई दे रही है. पाकिस्तान की राजधानी में अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत चल रही है, जिसे इस पूरे संघर्ष का सबसे अहम मोड़ माना जा रहा है. लेकिन यह बातचीत जितनी जरूरी है, उतनी ही मुश्किल भी.

सीजफायर के ऐलान के बाद शुरू हुई यह बैठक ऐसे समय में हो रही है जब पूरे क्षेत्र में तनाव अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है. इजरायल-लेबनान मोर्चे पर हमले जारी हैं और होर्मुज स्ट्रेट अब भी पूरी तरह सामान्य नहीं हुआ है. ऐसे में इस बातचीत से उम्मीदें भी हैं और शंकाएं भी.

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बातचीत शुरू होने की पुष्टि करते हुए कहा, "बातचीत आधिकारिक तौर पर शुरू हो चुकी है." वहीं पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ इस पूरी प्रक्रिया में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं. उन्होंने दोनों पक्षों को एक टेबल पर लाने में अहम भूमिका निभाई है.

अमेरिका की तरफ से बैठक में कौन-कौन शामिल?

इस बातचीत में अमेरिका की तरफ से उपराष्ट्रपति जेडी वेंस, स्टीव विटकॉफ और जेयर्ड कुशनर शामिल हैं, जबकि ईरान की ओर से संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाकर ग़ालिबाफ़ और विदेश मंत्री अब्बास अराघची मौजूद हैं. पाकिस्तान की ओर से सेना प्रमुख आसिम मुनीर भी इस अहम बैठक का हिस्सा हैं.

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इस वार्ता में तीन बड़े मुद्दों पर फोकस किया जा रहा है. इसमें पहला जंग को पूरी तरह खत्म करना, दूसरा होर्मुज स्ट्रेट को खोलना और तीसरा भविष्य की सुरक्षा व्यवस्था तय करना शामिल है. हालांकि इन तीनों ही मुद्दों पर दोनों देशों के बीच अभी भी बड़ा मतभेद है.

ईरान पहले ही साफ कर चुका है कि वह किसी भी स्थायी समझौते के लिए अपनी शर्तों से पीछे नहीं हटेगा. इनमें सबसे अहम है—ईरान पर लगे प्रतिबंध हटाना और लेबनान में इजरायल की कार्रवाई पर रोक. लेकिन अमेरिका ने साफ संकेत दिया है कि लेबनान का मुद्दा इस बातचीत का हिस्सा नहीं होगा.

बैठक को लेकर क्या है ईरान का रुख?

ईरान के प्रतिनिधिमंडल के प्रमुख ग़ालिबाफ़ ने बातचीत से पहले ही अमेरिका पर भरोसा न होने की बात कही. उन्होंने कहा, "अमेरिकियों के साथ बातचीत का हमारा अनुभव हमेशा नाकामी और टूटे हुए वादों से भरा रहा है." यह बयान बताता है कि दोनों देशों के बीच भरोसे की कमी कितनी गहरी है.

दूसरी तरफ अमेरिका भी सख्त रुख अपनाए हुए है. उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने साफ कहा, "अगर सामने वाला पक्ष ईमानदारी से बातचीत करने को तैयार है, तो हम भी खुले दिल से तैयार हैं. लेकिन अगर वे हमें धोखा देने की कोशिश करेंगे, तो हमारी टीम उतनी सकारात्मक नहीं होगी."

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इस बीच ट्रंप का फोकस साफ है. उन्होंने कहा कि इस पूरी बातचीत का सबसे बड़ा मकसद यह सुनिश्चित करना है कि ईरान के पास परमाणु हथियार न हों. उनके शब्दों में, "मेरी प्राथमिकता है कि ईरान के पास कोई न्यूक्लियर हथियार न हो. यही 99 प्रतिशत मुद्दा है."

लेबनान में इजरायल की जंग जारी

हालांकि जमीन पर हालात इतने आसान नहीं हैं. सीजफायर के बावजूद इजरायल लगातार लेबनान में हमले कर रहा है, जिससे यह समझौता पहले से ही दबाव में है. ईरान और पाकिस्तान दोनों का कहना है कि लेबनान भी इस सीजफायर का हिस्सा है, जबकि इजरायल इससे इनकार कर चुका है.

पाकिस्तान के लिए भी यह बातचीत किसी परीक्षा से कम नहीं है. शहबाज शरीफ ने खुद माना कि आगे का रास्ता आसान नहीं होगा. उन्होंने कहा, "अब एक और भी मुश्किल चरण सामने है, जिसे अंग्रेजी में ‘मेक या ब्रेक’ कहा जाता है."

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बातचीत के बीच इस्लामाबाद में लॉकडाउन!

इस पूरी प्रक्रिया में सुरक्षा के भी कड़े इंतजाम किए गए हैं. इस्लामाबाद के रेड जोन में भारी पुलिस और सेना की तैनाती की गई है. सड़कों को बंद किया गया है और हर गतिविधि पर नजर रखी जा रही है.

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विशेषज्ञों का मानना है कि यह बातचीत सिर्फ दो देशों के बीच नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की स्थिरता के लिए अहम है. अगर यह सफल होती है तो न सिर्फ जंग खत्म हो सकती है, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी राहत मिलेगी. लेकिन अगर यह विफल होती है, तो हालात और भी ज्यादा खराब हो सकते हैं.

अभी के लिए दुनिया की नजरें इस्लामाबाद पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि यह बातचीत शांति का रास्ता खोलती है या फिर एक और बड़े टकराव की शुरुआत करती है.

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