किसी भी औद्योगिक क्लस्टर की असली ताकत उसकी मशीनों में नहीं, बल्कि उन हाथों में होती है जो हर दिन शॉप-फ्लोर पर खड़े होकर उत्पाद तैयार करते हैं. उत्तर प्रदेश में करीब 96 लाख MSME इकाइयां काम कर रही हैं, और इनमें लाखों शॉप-फ्लोर कर्मचारी - मशीन ऑपरेटर, फिटर, असेंबली वर्कर, पैकेजिंग स्टाफ और तकनीशियन - राज्य की औद्योगिक अर्थव्यवस्था की रीढ़ बने हुए हैं.
कानपुर, जिसे कभी "लेदर सिटी ऑफ इंडिया" कहा जाता था, आज भी देश के प्रमुख चमड़ा उत्पादन केंद्रों में शामिल है. यहां लगभग 400 सक्रिय इकाइयों में हज़ारों शॉप-फ्लोर कर्मचारी टैनिंग, कटिंग, स्टिचिंग और फिनिशिंग जैसे कामों में लगे हैं. हाल ही में हुए एक अकादमिक अध्ययन के मुताबिक, कानपुर के लेदर वर्कर्स में करीब आधे कर्मचारी स्थायी रोज़गार में हैं, जबकि बाकी अस्थायी अनुबंध पर काम करते हैं. ज़्यादातर कर्मचारियों को मासिक आधार पर वेतन मिलता है, जिससे उनकी आय में एक हद तक स्थिरता बनी रहती है.
राज्य सरकार अब इस वर्कफोर्स को औपचारिक दायरे में लाने पर ज़ोर दे रही है - इसके तहत टेनरी वर्कर्स को कौशल प्रशिक्षण, स्वास्थ्य बीमा योजनाओं और डिजिटल पहचान से जोड़ने की दिशा में काम चल रहा है, ताकि उन्हें स्किलिंग, स्वास्थ्य सुविधाओं और दुर्घटना बीमा का सीधा लाभ मिल सके.
मुरादाबाद और मेरठ: पारंपरिक हुनर, आधुनिक बाज़ार
मुरादाबाद का पीतल उद्योग और मेरठ का स्पोर्ट्स गुड्स क्लस्टर भी हजारों शॉप-फ्लोर कारीगरों को रोज़गार देते हैं. इन क्लस्टर्स में काम करने वाले ज़्यादातर कारीगर पीढ़ी-दर-पीढ़ी यही हुनर सीखते आए हैं - कास्टिंग, पॉलिशिंग, इंग्रेविंग और स्टिचिंग, मोल्डिंग राज्य सरकार की नीति के तहत इन पारंपरिक कारीगरों के लिए राज्य व्यावसायिक प्रशिक्षण परिषद और वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट (ODOP) योजना के ज़रिए ब्रांडिंग, पैकेजिंग, डिज़ाइन और तकनीकी सहयोग उपलब्ध कराया जा रहा है, जिससे स्थानीय उत्पाद वैश्विक बाज़ार तक पहुंच रहे हैं.
वेतन, सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा
उत्तर प्रदेश में शॉप-फ्लोर कर्मचारियों को श्रम विभाग द्वारा तय न्यूनतम मज़दूरी दरों का लाभ मिलता है, जो अकुशल, अर्ध-कुशल और कुशल श्रेणी के हिसाब से अलग-अलग तय होती है. फैक्ट्रीज़ एक्ट के तहत कार्यस्थल पर स्वास्थ्य, सुरक्षा और कल्याण से जुड़े प्रावधान लागू होते हैं, इसके अलावा राज्य सरकार MSME इकाइयों को प्रोत्साहित कर रही है कि वे अपने कर्मचारियों को राज्य द्वारा संचालित बीमा और पेंशन योजनाओं में पंजीकृत करें, और कौशल उन्नयन (अपस्किलिंग) के लिए प्रोत्साहन दें.
कौशल विकास से बढ़ रही है उत्पादकता
राज्य सरकार का मानना है कि सिर्फ पूंजी और इंफ्रास्ट्रक्चर से उद्योग नहीं चलते, कुशल शॉप-फ्लोर वर्कफोर्स ही किसी भी क्लस्टर की असली प्रतिस्पर्धी ताकत होती है. यही वजह है कि आईटीआई और PMKVY जैसी योजनाओं के ज़रिए तैयार हो रहे प्रशिक्षित युवा अब सीधे MSME इकाइयों में मशीन ऑपरेटर, फिटर और तकनीशियन जैसी भूमिकाओं में शामिल हो रहे हैं. इससे न सिर्फ इकाइयों को कुशल कामगार मिल रहे हैं, बल्कि कर्मचारियों की आय और करियर ग्रोथ की संभावनाएं भी बेहतर हो रही हैं.
बदलाव की दिशा में उठ रहे कदम
राज्य सरकार अब औपचारिकीकरण पर खास ज़ोर दे रही है यानी अनौपचारिक क्षेत्र में काम कर रहे कारीगरों और मज़दूरों को भी सामाजिक सुरक्षा, बीमा और कौशल प्रमाणन के दायरे में लाना। प्रवासी श्रमिक कल्याण पोर्टल और गिग वर्कर्स के लिए बन रही नई नीतियां इसी दिशा में उठाए जा रहे कदम हैं, जिनका मकसद है कि राज्य के हर औद्योगिक क्लस्टर में काम कर रहा हर कर्मचारी - चाहे वह टेनरी में हो, पीतल कारखाने में या स्पोर्ट्स गुड्स यूनिट में बेहतर सुरक्षा और अवसरों के साथ काम कर सके.
कुल मिलाकर, उत्तर प्रदेश के औद्योगिक विकास की कहानी सिर्फ नीतियों और निवेश की नहीं है - यह उन लाखों शॉप-फ्लोर कर्मचारियों की भी कहानी है, जो हर दिन मेहनत से राज्य के "मेड इन यूपी" उत्पादों को देश-दुनिया तक पहुंचा रहे हैं.
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