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लकड़ी, कोयला और भट्टियां... गैस संकट ने हिला दी लखनऊ के होटल कारोबार की रीढ़, छोटा हुआ मेन्यू

लखनऊ के चारबाग इलाके की गलियों में अगर आप सुबह-सुबह निकलें, तो एक बदली हुई तस्वीर नजर आती है. जहां कभी गैस सिलेंडरों से भरी गाड़ियां होटल और रेस्टोरेंट के बाहर खड़ी दिखती थीं, अब वहां कोयले से लदे ट्रॉली और ट्रक नजर आते हैं. धुएं की हल्की परत हवा में तैरती है और बड़े-बड़े चूल्हों पर जलती आग यह कहानी खुद बयां कर देती है...

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लखनऊ के होटलों में कोयले पर बन रहा खाना. (Photo: Screengrab)
लखनऊ के होटलों में कोयले पर बन रहा खाना. (Photo: Screengrab)

लखनऊ के चारबाग इलाके में गैस संकट का सीधा असर होटल इंडस्ट्री पर देखने को मिल रहा है. गैस की कमी के चलते होटल अब लकड़ी, कोयले और इंडक्शन के सहारे काम चला रहे हैं, जिससे लागत बढ़ गई है और मेन्यू में कटौती करनी पड़ रही है. यहां अब खाना गैस पर नहीं, बल्कि लकड़ी और कोयले पर बन रहा है.

यह बदलाव नहीं, बल्कि मजबूरी है. गैस संकट ने लखनऊ के होटल कारोबार की रीढ़ हिला दी है. चारबाग, जहां शहर के सबसे ज्यादा होटल और ढाबे हैं, वहां लगभग 99 प्रतिशत होटल अब गैस छोड़कर वैकल्पिक इंतजामों पर आ गए हैं. कोई कोयले की भट्ठी जला रहा है, तो कोई लकड़ी का सहारा ले रहा है. वहीं, कुछ जगहों पर इंडक्शन चूल्हों से काम चलाया जा रहा है.

लेकिन यह बदलाव जितना दिखने में आसान लगता है, उतना है नहीं. चारबाग के एक होटल के बाहर खड़े नरेंद्र सिंह अपने हाथों से कोयला झोंकते हुए कहते हैं, पहले सब कुछ गैस से चलता था- जल्दी, साफ और आसान. अब एक-एक चीज के लिए जूझना पड़ रहा है. उनके होटल के किचन में अब गैस की जगह लोहे की बड़ी भट्ठियां लगी हैं, जिनमें कोयला जल रहा है. पास में लकड़ियों का ढेर पड़ा है, जो कभी खत्म नहीं होता.

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लेकिन इस आग की कीमत भी कम नहीं है. होटल कारोबारियों के मुताबिक, एक दिन में करीब एक क्विंटल कोयले की खपत हो रही है. और कोयले के दाम लगातार बढ़ते जा रहे हैं. यानी जिस गैस संकट से बचने के लिए कोयले का सहारा लिया गया, वही अब एक नई आर्थिक चुनौती बन गया है.

चारबाग होटल एसोसिएशन के अध्यक्ष सुरेंद्र शर्मा कहते हैं, यह व्यवस्था अस्थायी है. भट्ठियों के सहारे काम कब तक चलेगा, कोई नहीं जानता. ग्राहक तो आ रहे हैं, लेकिन हम उन्हें पहले जैसी सर्विस नहीं दे पा रहे.

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समस्या सिर्फ लागत की नहीं है, समय की भी है. गैस पर जो खाना 10-15 मिनट में तैयार हो जाता था, अब उसे बनाने में दोगुना वक्त लग रहा है. ताजी रोटी बनाना मुश्किल हो गया है. किचन में धुआं बढ़ गया है, जिससे काम करने वाले कर्मचारियों को भी दिक्कत हो रही है.

और इसका सीधा असर ग्राहकों पर पड़ रहा है. कई होटल संचालकों ने अपने मेन्यू कार्ड से कई आइटम हटा दिए हैं. जो डिश पहले आसानी से बन जाती थीं, अब उन्हें बनाना मुश्किल हो गया है. पैकेट सप्लाई भी कम कर दी गई है, क्योंकि समय पर ऑर्डर तैयार करना अब संभव नहीं रह गया है.

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चारबाग के एक अन्य होटल मालिक बताते हैं, पहले हमारे यहां 40-50 आइटम का मेन्यू था. अब मुश्किल से 20-25 रह गए हैं. जो बन सकता है, वही रख रहे हैं.

यह सिर्फ कारोबार का संकट नहीं, बल्कि रोजी-रोटी का सवाल भी बन गया है. होटलों में काम करने वाले कर्मचारियों की स्थिति भी प्रभावित हो रही है. काम का दबाव बढ़ गया है, लेकिन सुविधाएं कम हो गई हैं. कुछ जगहों पर तो कर्मचारियों ने काम छोड़ना भी शुरू कर दिया है.

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एक रसोइया कहता है, गैस पर काम करना आसान था. अब धुएं में घंटों खड़े रहना पड़ता है. आंखों में जलन होती है, सांस लेने में दिक्कत होती है.

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इंडक्शन चूल्हे एक विकल्प जरूर बने हैं, लेकिन वे भी हर जरूरत पूरी नहीं कर पा रहे. बड़ी मात्रा में खाना बनाना इंडक्शन पर संभव नहीं है. ऐसे में होटल संचालकों के पास सीमित विकल्प ही बचे हैं.

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चारबाग की गलियों में अब हर होटल एक जंग लड़ रहा है- खर्च, समय और क्वालिटी के बीच बैलेंस की जंग. ग्राहकों को भी इस बदलाव का एहसास हो रहा है. खाना मिलने में देरी, सीमित विकल्प और कभी-कभी स्वाद में फर्क... ये सब अनुभव अब आम हो गए हैं. हालांकि, कई ग्राहक होटल संचालकों की मजबूरी को समझते भी हैं.

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एक ग्राहक ने कहा- हमें पता है कि हालात खराब हैं. लेकिन उम्मीद है कि जल्द ही सब ठीक होगा. फिलहाल, होटल इंडस्ट्री अनिश्चितता के दौर से गुजर रही है. कारोबारियों को नहीं पता कि यह संकट कब खत्म होगा. लेकिन इतना जरूर है कि अगर हालात लंबे समय तक ऐसे ही रहे, तो कई छोटे होटल बंद होने की कगार पर पहुंच सकते हैं.

चारबाग, जो कभी अपनी रौनक और स्वाद के लिए जाना जाता था, आज वहां संघर्ष चल रहा है. लकड़ी की आग, कोयले का धुआं और इंडक्शन की लिमिट... इन सबके बीच वे अपने कारोबार को जिंदा रखने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन सवाल अभी भी वही है- यह जंग कब तक चलेगी?

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