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कानपुर: स्टेथोस्कोप लेकर चलता था 8वीं पास एम्बुलेंस चालक, खुद को बताता था डॉक्टर; टेलीग्राम ग्रुप पर किडनी का सौदा

कानपुर पुलिस ने एक बड़े अवैध किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट का भंडाफोड़ करते हुए अस्पताल मालिक और डॉक्टरों समेत 6 लोगों को गिरफ्तार किया है. इस गिरोह ने अब तक 60 से अधिक सर्जरी की हैं. एम्बुलेंस चालक से फर्जी डॉक्टर बने शख्स और टेलीग्राम ग्रुप के जरिए डोनर-रिसीवर का सौदा करने वाले इस नेटवर्क ने स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.

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कानपुर में पुलिस ने किया किडनी रैकेट का पर्दाफाश (Photo- ITG)
कानपुर में पुलिस ने किया किडनी रैकेट का पर्दाफाश (Photo- ITG)

कानपुर पुलिस ने चिकित्सा जगत को शर्मसार करने वाले एक बड़े किडनी रैकेट का पर्दाफाश किया है, जिसमें अब तक 60 से ज्यादा अवैध ट्रांसप्लांट की बात सामने आई है. पुलिस कमिश्नर रघुवीर लाल के निर्देश पर हुई इस कार्रवाई में 'आरोही' और 'आहूजा' अस्पतालों को सील कर संचालक डॉक्टरों समेत छह आरोपियों को जेल भेजा गया. यह गिरोह टेलीग्राम के जरिए डोनर और रिसीवर के बीच सौदेबाजी करता था, जिसमें बिहार के एमबीए छात्र को डोनर और मेरठ की महिला को रिसीवर के रूप में जोड़ा गया. आठवीं पास एम्बुलेंस चालक शिवम अग्रवाल खुद को डॉक्टर बताकर मरीजों को जाल में फंसाता था. गोपनीय तरीके से अस्पतालों में रात के समय बिना किसी रिकॉर्ड के ये ऑपरेशन किए जाते थे.

आठवीं पास एम्बुलेंस चालक बना 'फर्जी डॉक्टर'

इस पूरे गिरोह का सबसे हैरान करने वाला किरदार शिवम अग्रवाल उर्फ काना है.महज आठवीं तक पढ़ा यह व्यक्ति मूल रूप से एम्बुलेंस चालक था, लेकिन स्टेथोस्कोप डालकर खुद को डॉक्टर बताता था. वह मरीजों का भरोसा जीतकर उन्हें अवैध ट्रांसप्लांट के लिए तैयार करता था. 

जांच में सामने आया है कि कानपुर के अस्पतालों में करीब 40 से 50 अवैध सर्जरी की गईं, जिनमें एक विदेशी महिला का ट्रांसप्लांट भी शामिल है. शिवम की गिरफ्तारी के बाद ही इस संगठित अपराध की परतें खुलनी शुरू हुईं.

टेलीग्राम ग्रुप पर होता था किडनी का सौदा

रैकेट का डिजिटल नेटवर्क मेरठ का डॉक्टर अफजाल संचालित करता था. उसने टेलीग्राम पर एक विशेष ग्रुप बना रखा था जहां अंग दाताओं और जरूरतमंदों को मिलाया जाता था. इसी प्लेटफॉर्म के जरिए बिहार के समस्तीपुर से एमबीए अंतिम वर्ष के छात्र आयुष को डोनर और मेरठ की पारुल तोमर को रिसीवर के तौर पर जोड़ा गया. पैसों के लेनदेन से लेकर ऑपरेशन की पूरी प्लानिंग इसी सुरक्षित माने जाने वाले ऐप पर की जाती थी ताकि पुलिस की नजरों से बचा जा सके.

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फिल्मी स्टाइल में बिना रिकॉर्ड के ऑपरेशन

अवैध सर्जरी के लिए अपराधियों ने बेहद शातिर तरीका अपनाया था. ऑपरेशन वाले दिन अस्पताल के नियमित स्टाफ को हटा दिया जाता था और एक विशेष टीम आकर सर्जरी करती थी. सर्जरी के तुरंत बाद मरीजों को गुप्त स्थानों पर शिफ्ट कर दिया जाता था ताकि कोई सुराग न मिले. चौंकाने वाली बात यह है कि किसी भी मरीज का कोई मेडिकल रिकॉर्ड या हिस्ट्री दर्ज नहीं की जाती थी. 'आहूजा हॉस्पिटल' में ही ऐसी 7-8 सर्जरी होने की पुष्टि हुई है.

कार्रवाई और सवाल

डीसीपी वेस्ट कासिम आबदी के नेतृत्व में पुलिस ने आरोपियों को कस्टडी में लेकर पूछताछ शुरू कर दी है. पुलिस फरार अन्य आरोपियों की तलाश में जुटी है और मोबाइल फोन की जांच की जा रही है. इस खुलासे ने यूपी के स्वास्थ्य विभाग की निगरानी प्रणाली पर बड़े सवालिया निशान लगा दिए हैं. एक एम्बुलेंस चालक का इतने बड़े स्तर पर फर्जी डॉक्टर बनकर किडनी ट्रांसप्लांट जैसा जटिल ऑपरेशन करवाना सिस्टम की एक बहुत बड़ी और डरावनी खामी को उजागर करता है.

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