अयोध्या में रामजन्म भूमि और काशी में तहखाने का ताला खोलने के आदेश और उनका परिपालन कुछ घंटों में ही हो गया. काशी में 31 जनवरी और अयोध्या के इतिहास में एक फरवरी की तारीख दर्ज है. हालांकि, वाराणसी के जिला जज अजय कृष्ण विश्वेश ने ज्ञानवापी परिसर में मौजूद तहखाने का ताला खोलकर व्यास परिवार के पूजा के पारंपरिक अधिकार की बहाली और देव विग्रहों को सेवा पूजा के लिए जिला प्रशासन को सात दिनों की मोहलत दी. लेकिन प्रशासन ने सात घंटे से भी कम समय में आदेश का परिपालन कर दिया. रात ग्यारह बजे तक तो तहखाने की साफ सफाई होकर देव विग्रहों की पूजा भोग और आरती के बाद शयन भी करा दिया गया.
अयोध्या मामले में कैसे सब कुछ फटाफट अंदाज में हुआ?
फैजाबाद की जिला अदालत में 30 जनवरी 1986 को विवादित इमारत का ताला खोलने की उमेश चंद्र पांडेय की अर्जी आई. एक फरवरी को सुनवाई के बाद तक खोलने का आदेश फैजाबाद के जिला जज कृष्ण मोहन पांडेय ने शाम 4.40 बजे जारी किया. आदेश सुनाए जाने के 45 मिनट के भीतर शाम 5.20 पर तत्कालीन फैजाबाद के जिला मजिस्ट्रेट की अगुआई में विवादित इमारत का ताला खोल दिया गया.
PM नेहरू ने नाराजगी भी जताई
ये तालाबंदी नेहरू सरकार के समय 23 दिसंबर 1949 को को गई थी, जब विवादित स्थल में रामलला के 'प्रकट' होने की बात वहां पहरा दे रहे पुलिस के सिपाही अब्दुल बरकत ने पुलिस एफआईआर में बताई. इसके बाद प्रधानमंत्री नेहरू ने नाराजगी भी जताई और मूर्तियों को बाहर निकालने को भी कहा. लेकिन फैजाबाद के तत्कालीन कमिश्नर केके नायर ने देश भर में सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ने की आशंका से ऐसा करने से साफ इनकार कर दिया.
नायर का कहना था कि सरकार को मूर्तियां हटाने से पहले उनको कमिश्नर पद से हटाना होगा. और मूर्तियां हटाने के बाद बिगड़ने वाली स्थिति और सांप्रदायिक हिंसा की जिम्मेदारी भी लेनी होगी.