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चीन का 8 साल पुराना रिकॉर्ड वाराणसी में तोड़ा गया, जानिए क्या हुआ ऐसा खास

वाराणसी के सुजाबाद डोमरी में एक घंटे में 2,51,446 पौधे लगाकर काशी ने चीन का 8 साल पुराना विश्व रिकॉर्ड तोड़ दिया. 350 बीघा क्षेत्र अब एक आधुनिक ‘शहरी वन’ के रूप में विकसित हो रहा है. पूरे वन को 60 सेक्टरों में बांटा गया है और हर सेक्टर का नाम काशी के प्रसिद्ध गंगा घाटों पर रखा गया है. गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स टीम की मौजूदगी में आधिकारिक घोषणा हुई.

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उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ. (File Photo: PTI)
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ. (File Photo: PTI)

काशी में एक ऐसा कारनामा कर दिखाया, जिसने दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया. वाराणसी में सुबह से उमड़ा जनसैलाब जब हरियाली के संकल्प के साथ जुटा, तो किसी को अंदाजा नहीं था कि कुछ ही घंटों में इतिहास लिखा जाएगा. महज एक घंटे में 2,51,446 पौधे रोपकर वाराणसी ने चीन का आठ साल पुराना विश्व रिकॉर्ड तोड़ दिया और अपना नाम गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज करा लिया. मौके पर मौजूद गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स के जज ऋषिनाथ ने आधिकारिक घोषणा करते हुए महापौर अशोक कुमार तिवारी और नगर आयुक्त हिमांशु नागपाल को प्रमाणपत्र सौंपा.

कैसे टूटा चीन का रिकॉर्ड?

10 मार्च 2018 को चीन की हेनान प्रांतीय समिति और हेनान शिफांगे ग्रीनिंग इंजीनियरिंग कंपनी ने एक घंटे में 1,53,981 पौधे लगाकर रिकॉर्ड बनाया था. यह उपलब्धि लंबे समय तक अटूट रही. लेकिन रविवार को काशीवासियों के सामूहिक प्रयास ने इस आंकड़े को काफी पीछे छोड़ दिया. ड्रोन कैमरों, डिजिटल काउंटिंग सिस्टम और स्वतंत्र पर्यवेक्षकों की मौजूदगी में हर गतिविधि की बारीकी से निगरानी की गई. पौधरोपण की प्रक्रिया को सेक्टरवार विभाजित किया गया था, ताकि गिनती में कोई त्रुटि न हो. अंतिम पुष्टि के बाद जैसे ही नया आंकड़ा घोषित हुआ, पूरा परिसर तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा.

350 बीघा में उगा ‘मिनी काशी’

न्यूज एजेंसी के मुताबिक सुजाबाद डोमरी का 350 बीघा क्षेत्र अब एक आधुनिक ‘शहरी वन’ के रूप में विकसित हो रहा है. इसकी सबसे खास बात इसकी रचनात्मक संरचना है. पूरे वन को 60 सेक्टरों में बांटा गया है और हर सेक्टर का नाम काशी के प्रसिद्ध गंगा घाटों जैसे दशाश्वमेध, मणिकर्णिका, केदार, ललिता, चौसट्टी, शीतला और मान मंदिर घाट पर रखा गया है.

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कौन-कौन से पौधे लगाए गए?

प्रत्येक सेक्टर में औसतन 4,000 से अधिक पौधे रोपे गए. कुल मिलाकर 27 देशी प्रजातियों को प्राथमिकता दी गई. इनमें शीशम, अर्जुन, सागौन और बांस जैसे दीर्घजीवी वृक्ष शामिल हैं. साथ ही आम, अमरूद, पपीता जैसे फलदार पौधे और अश्वगंधा, शतावरी व गिलोय जैसी औषधीय प्रजातियां भी लगाई गईं. इस मिश्रित रोपण का उद्देश्य केवल हरियाली बढ़ाना नहीं, बल्कि जैव विविधता को सुदृढ़ करना भी है. विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह का संतुलित वन शहरी प्रदूषण कम करने में प्रभावी भूमिका निभाएगा.

जनभागीदारी का महाकुंभ

अधिकारियों का कहना है कि इस ऐतिहासिक उपलब्धि के पीछे महीनों की तैयारी और हजारों हाथों की मेहनत है. कार्यक्रम में स्कूल-कॉलेजों के छात्र-छात्राएं, स्वयंसेवी संगठन, एनसीसी कैडेट्स, एनएसएस स्वयंसेवक और स्थानीय नागरिक बड़ी संख्या में शामिल हुए. भारतीय सेना की 39 जीटीसी, 34 जीटीसी, 39 जीआर और 137 सीएफटीएफ (टीए) के जवानों ने अनुशासन के साथ पौधरोपण किया. एनडीआरएफ, सीआरपीएफ, सिविल डिफेंस और पीएसी की टुकड़ियों ने भी सक्रिय भागीदारी निभाई. नमामि गंगे, वन विभाग, कृषि विभाग, डूडा और नगर निगम की टीमों ने तकनीकी प्रबंधन संभाला. सिंचाई, गड्ढों की तैयारी, पौधों की सुरक्षा हर पहलू पर सूक्ष्म योजना बनाई गई थी.

मियावाकी तकनीक का कमाल

इस शहरी वन को तेजी से विकसित करने के लिए जापानी वनस्पति शास्त्री अकीरा मियावाकी द्वारा विकसित ‘मियावाकी तकनीक’ अपनाई गई है. इस तकनीक में कम जगह में घने और विविधतापूर्ण पौधों को एक साथ लगाया जाता है, जिससे वे सामान्य की तुलना में 8-10 गुना तेजी से बढ़ते हैं. प्रशासन ने 10,827 मीटर लंबी पाइपलाइन बिछाई है. 10 बोरवेल और 360 रेन गन सिस्टम के जरिए सिंचाई की आधुनिक व्यवस्था की गई है. लक्ष्य है कि दो से तीन वर्षों में यह क्षेत्र सघन ‘ऑक्सीजन बैंक’ बन जाए.

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पर्यावरण के साथ अर्थशास्त्र

अधिकारियों ने बताया कि यह परियोजना केवल पर्यावरणीय पहल नहीं, बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है. मध्य प्रदेश की एमबीके संस्था के साथ हुए समझौते के तहत तीसरे वर्ष से नगर निगम को दो करोड़ रुपये वार्षिक आय का अनुमान है, जो सातवें वर्ष तक सात करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है. फलदार वृक्षों और औषधीय पौधों से होने वाली आय स्थानीय विकास कार्यों में सहायक होगी. इस तरह यह मॉडल आत्मनिर्भर शहरी वन की मिसाल पेश करता है. वाराणसी के महापौर अशोक कुमार तिवारी ने कहा, यह उपलब्धि साबित करती है कि काशी अपनी प्राचीन परंपराओं को संजोते हुए आधुनिक चुनौतियों का समाधान भी प्रस्तुत कर सकती है. ढाई लाख पौधों की यह सौगात काशी के माथे पर हरित तिलक है.

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