कानपुर शहर में एक ऐसी परंपरा टूट गई, जो करीब 84 वर्षों से लगातार निभाई जा रही थी. वजह सुनकर लोग हैरान हैं. बताया जा रहा है कि भैंसे के बिदकने की आशंका और उसकी जिम्मेदारी तय न हो पाने के कारण यह परंपरा इस साल निभाई नहीं जा सकी.
दरअसल, कानपुर में होली के सातवें दिन एक खास मेला आयोजित किया जाता है, जिसमें रंगों से भरे ड्रम एक बड़े भैंसे के ठेले पर रखकर पूरे इलाके में निकाले जाते थे. लोग उस ठेले से रंग लेकर होली खेलते और शहर का माहौल उल्लास से भर जाता था. लेकिन इस बार भैंसा मालिक ने साफ कह दिया कि यदि रंग का पानी पड़ने से भैंसा बिदक गया और भीड़ में किसी को नुकसान पहुंचा दिया तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? जब आयोजन समिति से लिखित गारंटी देने को कहा गया तो कोई आगे नहीं आया. नतीजा यह हुआ कि 84 साल पुरानी परंपरा इस बार टूट गई.
रंगों के साथ जुड़ी थी आजादी की याद
कानपुर में यह परंपरा केवल एक मेला या रंग खेलने का तरीका नहीं थी, बल्कि इसका इतिहास भी बेहद दिलचस्प है. इसकी शुरुआत अंग्रेजों के शासनकाल में हुई थी, जब देश में आजादी का आंदोलन तेज हो रहा था और शहरों में भी ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ विरोध की आवाजें उठ रही थीं. साल 1942 के आसपास की बात बताई जाती है, जब उस समय के ब्रिटिश अधिकारियों ने कानपुर में आदेश जारी किया कि होली केवल एक दिन ही खेली जाएगी. अंग्रेजों का तर्क था कि कई दिनों तक चलने वाले उत्सव से कानून व्यवस्था बिगड़ सकती है. लेकिन शहर के लोगों को यह आदेश बिल्कुल भी मंजूर नहीं हुआ. स्वतंत्रता आंदोलन की भावना से भरे युवाओं और क्रांतिकारियों ने इस फैसले का खुलकर विरोध किया. उन्होंने ऐलान कर दिया कि होली एक दिन नहीं, बल्कि कई दिनों तक मनाई जाएगी.
विरोध करने वालों को अंग्रेजों ने भेजा जेल
जब लोगों ने अंग्रेजी हुकूमत के आदेश को मानने से इनकार किया तो प्रशासन ने सख्ती दिखाते हुए कई लोगों को गिरफ्तार कर लिया. इनमें स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े कई कार्यकर्ता और स्थानीय लोग शामिल थे. गिरफ्तारी की खबर फैलते ही शहर में गुस्सा फैल गया. लोगों ने इसका विरोध करते हुए एक बड़ा फैसला लिया उन्होंने होली ही नहीं मनाने का ऐलान कर दिया. शहर के बाजार बंद कर दिए गए और लोगों ने कहा कि जब तक गिरफ्तार किए गए लोगों को रिहा नहीं किया जाएगा, तब तक वे होली का त्योहार नहीं मनाएंगे. शहर के लोगों के इस सामूहिक विरोध का असर हुआ. कई दिनों तक शहर में तनावपूर्ण स्थिति बनी रही. आखिरकार अंग्रेज प्रशासन को झुकना पड़ा और गिरफ्तार किए गए सभी लोगों को रिहा करना पड़ा. जब ये लोग जेल से बाहर आए तो शहर में एक अलग ही माहौल बन गया. लोगों ने तय किया कि जिस दिन ये क्रांतिकारी रिहा हुए हैं, उसी दिन वे होली मनाएंगे और इसे एक खास उत्सव के रूप में याद रखा जाएगा. बताया जाता है कि उस दिन अनुराधा नक्षत्र पड़ रहा था. उसी दिन लोगों ने भव्य तरीके से होली का मेला आयोजित किया और अंग्रेजों को यह संदेश दिया कि उनकी परंपराओं और उत्सवों को कोई रोक नहीं सकता.
भैंस के ठेले पर निकलता था रंगों का जुलूस
उस ऐतिहासिक दिन से एक अनोखी परंपरा शुरू हुई. शहर के लोगों ने एक बड़े भैंसे के ठेले पर रंगों से भरे बड़े-बड़े ड्रम रखे और उसे पूरे शहर में घुमाया. ठेले में भरे रंगों से लोग एक-दूसरे पर रंग डालते और पूरे शहर में होली का उल्लास फैल जाता. यह जुलूस धीरे-धीरे एक परंपरा बन गया. तब से कानपुर में होली केवल एक दिन नहीं, बल्कि कई दिनों तक मनाई जाती रही. होली के सातवें दिन, जब अनुराधा नक्षत्र पड़ता है, तब विशेष रूप से इस मेले का आयोजन किया जाता है. हर साल हजारों लोग इस रंग मेले का इंतजार करते थे और भैंसे के ठेले पर रखे रंगों से होली खेलते थे.
84 साल तक लगातार निभाई गई परंपरा
समय बदलता गया, लेकिन यह परंपरा नहीं बदली. आजादी के बाद भी यह मेला हर साल उसी उत्साह के साथ आयोजित होता रहा. शहर के बुजुर्ग बताते हैं कि कई पीढ़ियों ने इस मेले को देखा है. बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक इस दिन का बेसब्री से इंतजार करते थे. भैंसे के ठेले पर रखे रंगों के ड्रम, ढोल-नगाड़े, गीत-संगीत और भीड़ का उत्साह—यह सब मिलकर मेले को खास बना देते थे. इस साल भी आयोजन समिति ने पहले की तरह तैयारियां शुरू की थीं. भैंसे के ठेले के लिए एक मालिक से बात भी तय हो गई थी. बताया जाता है कि करीब 31 हजार रुपये में ठेला तय हुआ था. लेकिन भैंसा मालिक ने एक शर्त रख दी. उसने कहा कि होली के रंग और पानी अगर भैंसे पर पड़ गए तो वह बिदक सकता है. अगर हजारों लोगों की भीड़ में वह उग्र हो गया और किसी को चोट पहुंचा दी तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? भैंसा मालिक ने साफ कहा कि अगर आयोजन समिति लिखित में गारंटी दे दे कि किसी दुर्घटना की जिम्मेदारी वही लेगी, तभी वह भैंसा लेकर आएगा.
कोई नहीं बना जिम्मेदारी लेने को तैयार
जब यह बात आयोजन समिति के सामने आई तो चर्चा शुरू हुई. लेकिन किसी ने भी लिखित गारंटी देने की जिम्मेदारी लेने की हिम्मत नहीं दिखाई. आखिरकार भैंसा मालिक ने भैंसा लाने से इनकार कर दिया. यही वह क्षण था जब 84 वर्षों से चली आ रही परंपरा टूट गई. हालांकि मेला पूरी तरह रद्द नहीं किया गया. आयोजन समिति ने किसी तरह व्यवस्था करते हुए रंगों का ठेला ट्रैक्टर पर निकालने का फैसला किया. ट्रैक्टर पर रंगों के ड्रम रखकर जुलूस निकाला गया और लोगों ने उसी तरह होली खेली, लेकिन भैंसे के ठेले की कमी सबको महसूस हुई. आयोजन समिति के संरक्षक मूलचंद्र सेठ ने बताया कि भैंसा ठेला इस बार उपलब्ध नहीं हो पाया, इसलिए ट्रैक्टर का सहारा लेना पड़ा. उन्होंने कहा कि हालांकि मेले में ऊंट और घोड़े जरूर शामिल हुए, लेकिन भैंसे के ठेले की परंपरा इस बार निभाई नहीं जा सकी.